भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1132
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११०३ ---|---

जंगलमें और भयानक रणभूमिमें भी प्रवेश कर जाता है। लोभ, प्रमाद और सबपर विश्वास—इन्हीं तीन दोषोंसे प्रत्येक प्राणी बँधता और मारा जाता है; इसलिये लोभ न करे, प्रमादमें न पड़े तथा हर एकपर विश्वास न करे१। पुत्र! तुम्हें सदा प्रयत्न करके गहन वनमें भ्रमण करते समय सम्पूर्ण हिंसक जीवोंसे अपने शरीरकी रक्षा करनी चाहिये। दुर्गम स्थानमें यदि तृण और घास आदि हो तो किसी प्रकार भी उसे चरना नहीं चाहिये। अपना यूथ छोड़कर कभी अकेले नहीं जाना चाहिये।

इस प्रकार अपने बछड़ेसे कहकर और उसे बार-बार चाटकर नन्दिनीने अपनी सखियोंके पास वनमें जाकर कहा—बहनो ! मेरी बात सुनो। आज मैं अपने झुंडसे थोड़ी दूरपर घूमती हुई एक घने एवं निर्जन वनमें चली गयी, वहाँ मुझे एक व्याघ्रने पकड़ लिया; परंतु अनेक प्रकारकी शपथोंद्वारा उसे विश्वास दिलाकर मैं तुम लोगोंसे मिलने और बच्चेको देखनेके लिये यहाँ आयी हूँ। इस समय बच्चेको देखा, बातचीत की और इसे कर्तव्यका उपदेश भी दिया। अब इसे तुम्हारे अधीन सौंपती हूँ, इसको अपना ही बच्चा समझना। जानकर या अनजानमें मैंने तुम लोगोंका जो कुछ भी अपराध किया हो वह सब कृपापूर्वक क्षमा करना। मेरा यह दूधपीता बच्चा आजसे अनाथ हो रहा है। इस दीन, दुःखी, दुर्बल और मातृशोकसे सन्तप्त बालकका तुम सब लोग मिलकर पालन करना। यदि यह विषम स्थानमें घूमता हो, दूसरे किसी झुंडमें जाता हो या न करने योग्य कार्योंमें संलग्न होता हो तो तुम सदा इसे रोकती रहना। अब मैं, जहाँ वह व्याघ्र मेरी प्रतीक्षामें खड़ा है, वहाँ जाऊँगी।

दूसरी गौएँ बोली—नन्दिनी! तुम किसी प्रकार भी वहाँ न जाओ। हँसीमें या स्त्रियोंके बीचमें, विवाहकालमें, प्राणसंकटके समय तथा सर्वस्वका अपहरण होते समय—इन पाँच समयोंमें कही हुई असत्य बातें पाप नहीं मानी गयी हैं। इसलिये तुम्हें वहाँ नहीं जाना चाहिये।

नन्दिनीने कहा—सखियो! दूसरोंके प्राण बचानेके लिये वैसा असत्य ठीक हो सकता है, परंतु अपने प्राणोंकी रक्षाके लिये साधुपुरुष असत्यभाषणकी प्रशंसा नहीं करते। यह सम्पूर्ण लोक सत्यपर प्रतिष्ठित है, धर्म भी सत्यके ही आधारपर स्थित है, समुद्र सत्यवचनसे ही कभी अपनी सीमाका उल्लंघन नहीं करता२। दैत्यराज बलि भगवान् विष्णुको भूमिदान करके स्वयं पातालमें चले गये हैं। अपने उस सत्य वचनपर स्थित होनेके कारण ही वे पुनः वहाँसे बाहर नहीं निकलते। जो किसी बातकी प्रतिज्ञा करके उसका ठीक-ठीक पालन नहीं करता, उस चोर और अपवित्र बुद्धिवाले पुरुषने कौन-सा पाप नहीं किया है।

सखियोंने कहा—नन्दिनी! तुम समस्त देवताओं और दैत्योंके लिये भी वन्दनीय हो, जो कि सत्यकी रक्षाके लिये दुस्त्यज प्राणोंका त्याग कर रही हो। कल्याणी! तुम तो स्वयं ही धर्मार्थ वचन बोलनेवाली हो, समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न हो और सदा सत्यमें स्थित रहती हो। हमलोग तुम्हें क्या शिक्षा देंगी। महाभागे! जाओ, बच्चेके लिये शोक न करो। तुमने हमारे लिये जो आज्ञा दी है, उसका हम सब पालन करेंगी; परंतु हम इस बातको जानती हैं कि सदा सत्यमें स्थित रहनेवाले प्राणियोंका आरम्भ किया हुआ कोई भी कार्य निष्फल नहीं होता।


१- लोभात्प्रमादाद्विश्म्भात् पुरुषो बध्यते त्रिभिः । तस्माल्लोभो न कर्तव्यो न प्रमादो न विश्वसेत् ॥
(स्क० पु०, ना० ५१। २५)
२- परेषां प्राणयात्रार्थं तत्कर्तुर्युज्यते शुभाः। आत्मप्राणहितार्थाय न साधूनां प्रशस्यते ॥
सत्ये प्रतिष्ठितो लोको धर्मः सत्ये प्रतिष्ठिति । उदधिः सत्यवाक्येन मर्यादां न विलंघयेत् ॥
(स्क० पु०, ना० ५१। ४४-४५)