भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1133, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1133

११०४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सूतजी कहते हैं— महर्षियो! नन्दिनी अपनी सखियोंसे इस प्रकार बातचीत करके उस व्याघ्रके पास चल दी और जहाँ वह व्याघ्र खड़ा था, वहाँ जा पहुँची।

वहाँ पहुँचकर नन्दिनी बोली—महाव्याघ्र! मैं अपने सत्य और शपथपर स्थित रहकर तुम्हारे पास आ गयी हूँ। अब तुम मेरे मांससे यथेष्ट तृप्तिलाभ करो। सत्यका आश्रय ले प्राणोंका भय छोड़कर पुनः अपने पास आयी हुई नन्दिनीको देखकर वह दुष्टात्मा व्याघ्र भी बड़े भारी वैराग्यको प्राप्त हो गया।

व्याघ्र बोला— सत्यवादिनि! तुम्हारा स्वागत है। सत्यपर स्थित रहनेवाले प्राणियोंका कभी अमंगल नहीं होता। भद्रे! तुमने शपथ खाकर कहा था, मैं आऊँगी, इससे मेरे मनमें यह कौतूहल हो रहा था कि क्या यह सचमुच ऐसा करेगी? परंतु तुमने अपने सत्यकी रक्षा की। महाभागे! मुझ दुरात्मा पापीको उपदेश देकर अनुगृहीत करो, जिससे इहलोक और परलोकमें मेरा कल्याण हो। मेरा ऐसा विश्वास है कि तुम्हें अपने सत्याचरणके प्रभावसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। अतः संक्षेपसे धर्मका सारसर्वस्व मुझे बताओ, जिससे मुझे सत्संगका पूरा-पूरा फल प्राप्त हो।'

नन्दिनी बोली— सत्ययुगमें तपकी, त्रेतामें ध्यानकी, द्वापरमें यज्ञकी और दानकी तथा कलियुगमें एकमात्र दानकी प्रशंसा करते हैं। जो सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंको अभय दान देते हैं, उनका वह दान सब दानोंमें श्रेष्ठ है। उससे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है।^*

व्याघ्र बोला— शुभे! यह अभय दान तो उन प्राणियोंके लिये उपयुक्त हो सकता है, जिनकी जीविका अहिंसासे—अन्न आदिका आहार करके चलती है। हम-जैसे जीवोंका जीवननिर्वाह तो हिंसाके बिना हो ही नहीं सकता। अतः जीवोंकी हिंसा करनेवाले मुझ अधमके लिये भी जो सुखदायक और उत्तम धर्माचरणमें सहायक हो, वैसा उपदेश दो।

नन्दिनीने कहा— यहाँ वनमें एक महान् शिवलिंग है, जिसे पूर्वकालमें बाणासुरने स्थापित किया था। उसीके प्रभावसे आज मैं तुम्हारे संकटसे मुक्त हुई हूँ। तुम प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर उसीकी परिक्रमा और उसीको प्रणाम किया करो। इससे तुम्हें मनोवांछित सिद्धि प्राप्त होगी।

ऐसा कहकर नन्दिनीने व्याघ्रको वनके भीतर ले जाकर उस शिवलिंगका दर्शन कराया। वह उसका दर्शन करके तत्काल ही व्याघ्रकी योनिसे मुक्त हो पूर्ववत् राजा कलशके रूपमें परिणत हो गया। पूर्वकालमें दुर्वासाके दिये हुए शापका और अपने वैभवसम्पन्न राज्यका उन्हें स्मरण हो आया। तब उन श्रेष्ठ राजाने नन्दिनीसे कहा—'भद्रे! मैं हैहयवंशमें उत्पन्न कलश नामक राजा हूँ। पूर्वकालमें मुनिवर दुर्वासाने कुछ कारणवश मुझे शाप दे दिया। जब पुनः मैंने उन्हें प्रसन्न किया तब वे बोले—'नन्दिनी धेनु जब तुम्हें वनमें शिवलिंगका दर्शन करायेगी, तब तुम्हारी मुक्ति हो जायगी। निश्चय तुम नन्दिनी हो, यह बात मुझे अपने शापका अन्त देखकर ज्ञात हुई है। श्रेष्ठ धेनु! यह तो बताओ, यह कौन-सा देश है, जिससे मैं अपने घरका मार्ग ढूँढ़कर पुनः वहाँ जाऊँ।'

नन्दिनी बोली— राजन्! यह सब पापोंका नाश करनेवाला चमत्कारपुर नामक क्षेत्र है, जो सर्वतीर्थमय है और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है।

राजाने कहा— नन्दिनि! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम जाओ और अपने बालकसे मिलो। गौओंके झुंडमें जाकर अपनी सखियों तथा सुहृदोंका दर्शन करो। मैंने पूर्वकालमें ब्राह्मणोंके मुखसे इस क्षेत्रकी महिमा सुनी थी और इसे सदा देखनेकी


^* तपः कृते प्रशंसन्ति त्रेतायां ध्यानमेव च। द्वापरे यज्ञदाने च दानमेकं कलौ युगे॥
सर्वेषामेव दानानां नास्ति दानमतः परम्। चराचराणां भूतानामभयं यः प्रयच्छति॥
(स्क० पु०, ना० ५१। ६७-६८)

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