संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * । ११०५
अभिलाषा भी की; परंतु राजकाज तथा भोगमें आसक्त होनेके कारण मैं इसका दर्शन नहीं कर सका। आज जब यह तीर्थ स्वयं ही मुझे प्राप्त हो गया है तो अब मैं इसे छोड़कर नहीं जा सकता। सौभाग्यकी बात है, जो महात्मा दुर्वासाने मुझे वैसा शाप दिया। अन्यथा इस उत्तम क्षेत्रकी प्राप्ति मुझे कैसे होती?
ऐसा कहकर राजाने नन्दिनीको विदा कर दिया और स्वयं दिन-रात उस शिवलिंगका ध्यान करते हुए वे वहीं रहने लगे। उन्होंने भगवान् शिवके लिये कैलासशिखरके समान गगनचुम्बी मन्दिर बनवाया और उन्हींके आगे बैठकर बड़ी भारी तपस्या की। तदनन्तर शंकरजीके प्रभावसे थोड़े ही दिनोंमें परम दुर्लभ सिद्धि प्राप्त कर ली, जो याज्ञिकजनोंके लिये भी दुर्लभ है। जो मनुष्य मार्गशीर्ष मासमें वहाँ भक्तिपूर्वक गीत और नृत्य आदिका आयोजन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। द्विजवरो! इस प्रकार मैंने तुम्हें कलशेश्वरजीके माहात्म्यका वर्णन सुनाया, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है।
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अगस्त्यकुण्ड, कपिलानदी, वैष्णवीशिला, सिद्धक्षेत्र आदिकी महिमा, नलद्वारा चर्ममुण्डाकी स्तुति तथा नलेश्वरकी महिमा
**सूतजी बोले—**महर्षियो ! उसीके समीप पूर्वभागमें अगस्त्यकुण्ड है, जहाँ परम पुण्यदायिनी और सब पातकोंका नाश करनेवाली बावली है। जो मनुष्य वहाँ फाल्गुनमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवासपूर्वक स्नान करता है, उसे अपनी इच्छाके अनुकूल वस्तुकी प्राप्ति होती है।
अगस्त्यवापीके दक्षिण भागमें कपिला नदी है, जहाँ कपिलमुनिने सांख्यशास्त्रकी सिद्धि प्राप्त की थी। कपिलाके पूर्व भागमें सिद्धक्षेत्र बताया गया है, जहाँ पूर्वकालमें लाखों मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। जो मनुष्य जिस कामनाको लेकर वहाँ तपस्या करता है, वह छः महीनेके भीतर अवश्य ही उसे प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मणो! सिद्धक्षेत्रके निम्नभागमें एक शुभकारक वैष्णवीशिला है, जो घूमती रहती है। उसकी आकृति चौकोर है और वह सब पातकोंका नाश करनेवाली है। वह महानदीके जलसे धुली हुई और मनुष्योंको मोक्ष देनेवाली है। उस शिलाके आगे गंगा-यमुना-सरस्वती-संगमरूपा त्रिवेणी बहती हैं, जो भोग और मोक्ष देनेवाली हैं। उसके उत्तरभागमें रुद्रकोटितीर्थ है, जो दाक्षिणात्य महात्माओंद्वारा पूजित है। उसे रुद्रावर्त भी कहते हैं। जो पुरुष रुद्रावर्त क्षेत्रमें श्राद्ध करता है, वह सौ यज्ञोंका फल पाता है। जो वहाँ उपवासपूर्वक रात्रिमें जागरण करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा स्वर्गमें जाता है।
वहीं पूर्वकालमें महात्मा राजा नलने चर्ममुण्डा देवीकी स्थापना की थी। जो मनुष्य महानवमीके दिन भक्तिपूर्वक चर्ममुण्डा देवीका पूजन करता है, वह मनोवांछित पदार्थोंको प्राप्त करके सनातन पद पा लेता है। पहलेकी बात है। वीरसेनके पुत्र नल इस भूमण्डलके राजा थे, जो समस्त सद्गुणोंसे युक्त थे। विदर्भदेशकी राजकुमारी दमयन्ती उनकी पतिव्रता पत्नी थी। एक समय राजा नलने कलियुगसे आविष्ट होकर अपने भाई पुष्करके साथ जूआ खेला। उसमें वे अपना सारा राज्य हार गये। तदनन्तर नल अपनी स्त्रीको साथ लेकर गहन वनके भीतर चले गये। वहाँ उन्होंने यह सोचा 'यदि दमयन्ती राजा भीमके घर चली जाय तो वनवासके कष्टसे मुक्त हो सकती है। इसलिये रातमें इसको सोती छोड़कर मैं दूर चला जाऊँगा जिससे यह साध्वी दमयन्ती मुझसे विलग होकर कुण्डिनपुरको चली जायगी।'