भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1135, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1135
१९०६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ऐसा निश्चय करके राजा नल सुखसे सोयी हुई दमयन्तीको छोड़कर घोर वनमें चले गये। प्रातःकाल उठकर दमयन्ती जब इधर-उधर देखने लगी तो उसने अपने पास नलको नहीं पाया। तब वह दुःखसे आतुर हो वनमें करुणस्वरसे विलाप करने लगी और धीरे-धीरे कुण्डिनपुरकी राह लेकर अपने पिताके राजमहलमें जा पहुँची। नल भी उस वनको छोड़कर दूसरे बड़े भारी वनमें चले गये और घूमते-घूमते हाटकेश्वरक्षेत्रमें जा पहुँचे। इसी बीचमें महानवमीका दिन आ गया। तदनन्तर नलने वहाँ चर्ममुण्डधारिणी दुर्गाकी मृन्मयी मूर्ति बनाकर उसका पूजन किया और फल-मूलोंका भोग लगाकर देवीको तृप्त किया। तत्पश्चात् वे देवीके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये तथा बड़ी श्रद्धाके साथ स्तुति करने लगे—

**नल बोले—**चर्ममुण्ड धारण करनेवाली श्रेष्ठ देवि! तुम सर्वत्र व्यापक हो, तुम्हारी जय हो। सर्वेश्वर तथा सम्पूर्ण राजाओंके द्वारा वन्दित दक्षकुमारी! तुम प्रत्येक कार्यमें दक्ष हो, शुभे! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि! अचिन्त्ये! नवमी और अष्टमीको प्रिय माननेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। त्रिलोचने! त्रिलोचनप्रिये! देवपूजिते! देवि! तुम्हारी जय हो। भयंकर रूप धारण करनेवाली तथा सुन्दर रूपवाली महाविद्ये! महाबले! तुम्हारी जय हो। महोदये! महाकाये! महाव्रते! देवि! तुम्हारी जय हो। नित्यरूपे! जगद्धात्रि! तुम्हारी जय हो। विकराली महाकालिके! तुम्हारी जय हो। सुन्दरि! देवेश्वरि! पाशहस्ते! महाहस्ते! तुम्हें नमस्कार है। मनोहर देहलतासे युक्त तथा प्रिय गीतवाद्यसे प्रसन्न होनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। अनन्ता, चिन्तनीया तथा भगवान् शिवके आधे शरीरमें निवास करनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। तुम्हीं रति, तुम्हीं धृति, तुम्हीं तुष्टि, तुम्हीं गौरी तथा तुम्हीं देवताओंकी स्वामिनी शची हो। तुम्हीं लक्ष्मी, सावित्री और गायत्री हो। देवि! तीनों लोकोंमें स्त्रीरूपमें जो कुछ भी दिखायी देता है, वह सब तुम्हारे ही अंशसे प्रकट हुआ है। इस विषयमें मुझे कोई सन्देह नहीं है। इस सत्यके प्रभावसे तुम इस मूर्तिमें निवास करो। देव-दानववन्दिते! इस भक्तिसे सन्तुष्ट होकर तुम अपना सांनिध्य यहाँ स्थापित करो।

**सूतजी कहते हैं—**राजा नलके इस प्रकार स्तुति करनेपर भक्तवत्सला चतुर्भुजा देवीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—'वत्स! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट हूँ। अतः तुम मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'

**राजा नल बोले—**देवि! मैंने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय अपनी पत्नी दमयन्तीको हिंसक जन्तुओंसे भरे निर्जन वनमें त्याग दिया था। वह आपकी कृपासे अखण्ड शीलसे युक्त और निर्दोष रूपमें मुझे फिर प्राप्त हो, ऐसा यत्न कीजिये। जो आपके आगे इस स्तोत्रद्वारा स्तुति करे, उसे उसी दिन आप मनोवांछित वस्तु प्रदान करें।

**सूतजी कहते हैं—**तब दुर्गादेवी 'तथास्तु' कहकर अन्तर्धान हो गयीं तथा राजाओंमें श्रेष्ठ नलने उन सभी कामनाओंको प्राप्त कर लिया। चर्ममुण्डाके समीप ही राजा नलके द्वारा स्थापित देवाधिदेव भगवान् महेश्वर विराजमान हैं, जिनका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। माघमासके शुक्लपक्षकी षष्ठीको जो मानव भक्तिपूर्वक नलेश्वरका दर्शन करता है, वह सब रोगोंसे मुक्त हो परम पदको प्राप्त होता है। उन्हीं भगवान् शिवके आगे एक निर्मल जलसे भरा हुआ कुण्ड है। जो रविवारके प्रातःकाल उस कुण्डमें स्नान करता है, वह कुष्ठरोगसे छूटकर पुनः नूतन शरीर प्राप्त कर लेता है।


$\sim\sim\sim\circ\sim\sim\sim$