भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1136, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1136
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १९०७ ---|---

गालवको सूर्यदेवकी आराधनासे पुत्रकी प्राप्ति, अर्जुनके द्वारा विभिन्न देवोंकी स्थापना तथा विषकन्या शर्मिष्ठाद्वारा स्थापित शर्मिष्ठा-तीर्थका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—नलेश्वरसे थोड़ी ही दूरपर देवताओंके स्वामी सूर्य साम्बादित्यके नामसे प्रसिद्ध हैं, जिनका दर्शन करके मनुष्य सम्पूर्ण हृदयस्थित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो माघ शुक्ला सप्तमी तथा रविवारके योगमें भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है वह नरकोंको नहीं देखता। प्राचीन कालमें गालव नामवाले एक ब्राह्मण हो गये हैं, जो सदा ही वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर तथा उत्तम स्वभाव और सदाचारसे युक्त थे। उनकी अवस्था ढल गयी तो भी उनके कोई पुत्र नहीं हुआ। इसका उनके मनमें बड़ा दुःख था। तब उन्होंने घरका सारा काम-काज छोड़कर इसी क्षेत्रमें एकाग्रतापूर्वक निवास करते हुए भक्तिभावके साथ सूर्यदेवकी आराधना की। जितेन्द्रिय होकर निराहार रहते हुए उन्होंने पंचरात्रोक्त विधिसे सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान किया और इसी नियमसे प्रतिदिन उनकी आराधना करते रहे। पंद्रहवाँ वर्ष आनेपर भगवान् सूर्य गालवको दर्शन देते हुए बोले—‘विप्रवर! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।’

गालव बोले—सुरश्रेष्ठ! मेरे कोई पुत्र नहीं है। अतः मुझे मेरे वंशकी वृद्धि करनेवाला पुत्र दीजिये।

भगवान् सूर्यने कहा—विप्रवर! तुम्हें वंशकी वृद्धि करनेवाला पुत्र प्राप्त होगा और वह तेजस्वी, यशस्वी, शास्त्रज्ञ तथा वेदोंका पारंगत पण्डित होगा। तुमने साम्बादित्यके समीप जहाँ मुझे अर्घ्य देकर पूजन किया है, यहाँ दूसरा कोई भी जो पुरुष रविवार और सप्तमीके योगमें श्रद्धापूर्वक मेरे इस विग्रहकी पूजा करेगा, उसे वंशवर्द्धक पुत्रकी प्राप्ति होगी। ऐसा कहकर भगवान् सूर्य मौन एवं अन्तर्धान हो गये और गालवजी भी प्रसन्नचित्त हो अपने घरको चले गये। थोड़े ही दिनोंमें उनके यहाँ भगवान् सूर्यके कथनानुसार एक सर्वशुभलक्षणसम्पन्न पुत्र उत्पन्न हुआ। भगवान् सूर्यने वटवृक्षका आश्रय लेकर दर्शन एवं वरदान दिया था। इसलिये गालवने अपने पुत्रका नाम वटेश्वर रखा। वटेश्वरके पुत्रों तथा पौत्रोंको देख लेनेपर महर्षि गालव भारी तपस्या करके सूर्यदेवको प्राप्त हुए। वटेश्वरने भी अपने पिताके द्वारा स्थापित भगवान् सूर्यनारायणके लिये एक परम मनोहर मन्दिर बनवाया।

द्विजवरो! पूर्वकालमें महात्मा विदुरने भी उस क्षेत्रमें भगवान् श्रीसूर्यनारायण, सदाशिव तथा श्रीविष्णुका स्थापन किया है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इन तीनों देवताओंका पूजन करेगा, वह उस परम धामको प्राप्त होगा, जो बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भी अत्यन्त दुर्लभ है।

वहींपर अर्जुनके द्वारा स्थापित किये हुए सर्वमनोरथदायक भगवान् विनायक विराजमान हैं, जो समस्त विघ्नोंका नाश करते हैं। जो मनुष्य चतुर्थीको नक्तव्रत (केवल रातमें भोजन करनेका संकल्प) करके भक्तिभावसे गणेशजीकी पूजा करता है, वह समस्त विघ्नोंसे मुक्त हो मनोवांछित फलको पाता है। वहींपर उत्तम प्रभावसे युक्त भगवान् नर और नारायण भी हैं। जो उन दोनोंका भक्तिपूर्वक द्वादशी तिथिको दर्शन और पूजन करता है, वह जरा-मरणसे रहित परम पदको प्राप्त होता है।

एक समय कुन्तीनन्दन अर्जुन तीर्थयात्रा प्रारम्भ करके हाटकेश्वरक्षेत्रमें आये। वहाँ तीर्थसमुदायसे भरे हुए उस पावन क्षेत्रका दर्शन करके उन्होंने मनोहर मन्दिरमें भगवान् सूर्यको स्थापित किया और उन्हींके आगे नर और नारायणकी भी स्थापना की। फिर उत्तम श्रद्धासे युक्त हो वहाँ गोवर्द्धनको