भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1137

११०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्थापित किया और वहीं देवाधिदेव नृसिंहदेवकी स्थापना की। इस प्रकार पाँच देवताओंकी स्थापना करके उन्होंने चमत्कारपुरके सब ब्राह्मणोंको बुलवाया और उन्हें बहुत धन दिया। फिर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके कहा—'मैंने सब रोगोंका नाश करनेवाले भगवान् सूर्यको यहाँ स्थापित किया है और इनकी सेवा आपलोगोंको सौंपी है। अतः आपको सदैव इनका चिन्तन करना चाहिये।

ब्राह्मण बोले—पाण्डुनन्दन! आप यह सब छोड़कर अपने घरको पधारिये। हम सब लोग आपके श्रेयको बढ़ानेवाला पूजनकर्म करते रहेंगे।

तब अर्जुनने प्रसन्नचित्त हो उन्हें पुनः बहुत धन दिया और उनसे पूछकर विदा ले प्रणामपूर्वक अपने नगरको प्रस्थान किया।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुमसे नरादित्यके प्रादुर्भावकी कथा सुनायी। यह सुननेवालोंके पापोंका नाश करनेवाली है।

पूर्वकालमें 'वृक' नामसे प्रसिद्ध एक चन्द्रवंशी राजा हुए थे। वे बड़े ही ब्राह्मणभक्त, शरणागतवत्सल और सर्वलोकहितकारी थे। उनकी पत्नी भी बड़ी पतिव्रता और समस्त सद्गुणोंसे सुशोभित थीं। उन दोनोंको चौथेपनमें एक कन्या हुई। राजाने विद्वान ज्योतिषियोंको बुलाकर पूछा—'मेरी यह कन्या कैसी होगी?'

ज्योतिषी ब्राह्मण बोले—राजन्! सूर्यके चित्रा नक्षत्रपर रहते समय सोमवार और चतुर्दशीके योगमें जो जन्म ग्रहण करती है, वह विषकन्या होती है। ऐसी कन्याका जो पाणिग्रहण करता है, वह पुरुष छः महीनेके भीतर अवश्य मृत्युको प्राप्त होता है। वह जिस घरमें जन्म लेती है, वह कुबेरका ही महल क्यों न हो, उसे छः महीनेके भीतर धनसे रहित कर देती है। अतः आपकी यह पुत्री वास्तवमें विषकन्या है। यह पितृकुल और श्वशुरकुल दोनोंका नाश कर देगी। इस कारण आप इसे त्यागकर सुखी हो जाइये। यदि हमारे कहे हुए हितकर वचनपर आपको श्रद्धा हो तो आप ऐसा ही कीजिये।

राजाने कहा—ब्राह्मणो! मैं इस कन्याको त्याग दूँ या घरमें रखूँ, दोनों ही दशाओंमें मेरे पूर्वशरीरसे किया हुआ कर्म ही फलीभूत होगा। पहलेका शुभ कर्म हो या अशुभ कर्म उसे मिटाया नहीं जा सकता। अतः मैं अपने कर्मको ही आगे रखकर इस कन्याका त्याग नहीं करूँगा। जो जिस-जिस शरीरसे जैसा-जैसा कर्म करता है वह उसी-उसी शरीरसे पुनः सबके फलको भोगता है। अपनी इन्द्रियोंसे पूर्वजन्ममें जो कर्म किया गया है, वह मिट नहीं सकता। उसका फल भोगना ही पड़ेगा और बिना किये हुए किसी कर्मका फल अपने सामने आ नहीं सकता। अतः मेरे सामने जो भी परिणाम आवे, मुझे कोई भय नहीं है। देहधारी जीवके लिये गर्भमें ही आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—इन पाँच वस्तुओंकी सृष्टि कर दी जाती है। जैसे वृक्षों और लताओंमें फल और फूल अपने समयपर आते ही हैं—समयका उल्लंघन नहीं करते, उसी प्रकार पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म भी अपने समयका उल्लंघन नहीं करता। नियत समयपर उसका भोग करना ही पड़ता है। कोई भी पुरुष पूर्वशरीरद्वारा किये हुए कर्मको अपने बल और बुद्धिसे पलट देनेमें समर्थ नहीं है। जो शीघ्रतापूर्वक दौड़ता है, उसके पीछे उसका कर्म भी दौड़ता है। कर्म साथ ही सोता और खड़े होनेपर साथ ही खड़ा होता है। जिसको जहाँ भी सुख या दुःख भोगना है, वह रस्सीसे बँधा हुआ-सा बलपूर्वक वहाँ खिंचकर पहुँच जाता है। जैसे तेल समाप्त हो जानेपर दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार कर्मोंका नाश हो जानेपर जीव मोक्षको प्राप्त हो जाता है। ऋतुकालमें पुरुषके द्वारा गर्भमें स्थापित किये हुए अचेतन वीर्यके एक बिन्दुका आश्रय लेकर जीव अपने कर्मके साथ वृद्धिको प्राप्त होता है। जिस उदरमें कितने ही अन्न-पान डाले जायें, नष्ट हो जाते हैं, भक्ष्य पदार्थ पच जाता है; वहीं पड़ा हुआ वह गर्भ क्यों नहीं नष्ट हो जाता। इसलिये लोकमें देहधारियोंका