संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1138, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११०९
किया हुआ शुभाशुभ कर्म ही सुख-दुःखके रूपमें प्राप्त होता है, ऐसा मेरा निश्चय है। अरक्षित वस्तु भी दैव (प्रारब्धकर्म)-से सुरक्षित होकर बच जाती है और सुरक्षित भी दैवसे हत होकर नष्ट हो जाती है। वनमें त्यागा हुआ अनाथ बालक भी जीवित रहता है और घरमें बड़े प्रयत्नसे पाला-पोसा जानेवाला शिशु भी मृत्युको प्राप्त हो जाता है।
ऐसा निश्चय करके राजाने ज्योतिषियोंके सलाह देनेपर भी उस विषकन्याका परित्याग नहीं किया। पिताने उसका नाम शर्मिष्ठा रख दिया। इसी समय क्रोधमें भरे हुए राजाके शत्रुओंने उनके राज्यको सब ओरसे सताना आरम्भ किया। तब राजा भी चतुरंगिणी सेनाके साथ बाहर निकले और उन्होंने शत्रुओंके साथ घोर युद्ध किया जो यमराजके लोककी जनसंख्या बढ़ानेवाला था। दसवें दिन राजा वृकको शत्रुओंने सब ओरसे घेरकर मार डाला। इनके मारे जानेपर शेष सैनिक भयसे पीड़ित हो अपने नगरको भाग गये।
इसी समय समस्त पुरवासियोंने शोकपरायण हो उस दुष्टा विषकन्याको लक्ष्य करके कठोर वचनोंमें कहा—इसी पापिनके दोषसे राजाकी मृत्यु हुई है। अतः इसे शीघ्र ही बाँध लिया जाय और जबतक इस नगरका क्षय न हो जाय तबतक ही इसे यहाँसे बाहर निकाल दिया जाय।
पुरवासियोंकी ये नाना प्रकारकी बातें सुनकर विषकन्याको बड़ा वैराग्य हुआ। उसने अपनी निन्दा की और भय तथा शोकमें डूबी हुई वह रातमें निकलकर वनमें चली गयी। वहाँ प्राणत्याग करनेका निश्चय करके वह आगे बढ़ती जा रही थी कि हाटकेश्वरक्षेत्रमें जा पहुँची। उस महान् क्षेत्रमें विषकन्याने देखा, वह बहुतेरे तपस्वीजनोंसे भरा हुआ है, चित्तमें अत्यन्त आह्लाद उत्पन्न करता है। इतनेमें ही उसे अपने पूर्वजन्मकी बातका स्मरण हो आया—'अहो! पूर्वकालमें जब मैं चाण्डाल-जातिकी स्त्री थी, यहीं मैंने एक गायकी प्यास बुझायी थी। उसीके प्रभावसे मैं राजाके पवित्र भवनमें उत्पन्न हुई। अतः अब मुझे यहीं रहना चाहिये। पूर्वजन्ममें गौके लिये किये हुए जलदानके माहात्म्यका विचार करके उसने निर्मल जलसे भरे हुए एक सरोवरका निर्माण किया, जो कि समुद्रके समान विस्तृत और मनोहर कमल-वनसे सुशोभित था। वहाँ बहुतसे हंस, वक और चक्रवाक आदि पक्षी सब ओर रहने लगे। तत्पश्चात् राजकन्याने उस सरोवरके समीप कैलासशिखरके समान ऊँचा एक सुन्दर मन्दिर बनवाया जो देखनेमें बड़ा ही मनोहर था। उसीमें भक्तिभावसे भगवती पार्वतीकी स्थापना करके शास्त्रोक्त व्रतका आश्रय ले राजकुमारी शर्मिष्ठाने देवीके आगे बड़ी भारी तपस्या की। केवल वायु पीकर पार्वतीके नामका जप करती हुई उसने अपने चित्तको निरन्तर उन्हींके चिन्तनमें लगा दिया था। इस प्रकार देवीकी आराधनामें उसका दीर्घकाल व्यतीत हो गया। किंतु उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति नहीं हुई। उसका सिर सफेद बालोंसे भर गया, मुखपर झुर्रियाँ पड़ गयीं, तो भी शिववल्लभा पार्वतीदेवी सन्तुष्ट नहीं हुईं। यह देखकर जब वह अत्यन्त व्याकुल हो गयी, तब एक ही क्षणमें दुग्ध, कुन्द और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एक वृषभ प्रकट हुआ। उसकी पीठपर भगवान् शंकरके साथ पार्वतीदेवी विराजमान थीं। उनकी चार भुजाएँ थीं, मुखपर प्रसन्नता छा रही थी और उनका दिव्य रूप अलौकिक था। उनके वस्त्र और आभूषण सभी श्वेतवर्णके थे, मस्तकपर अर्धचन्द्राकार मुकुट शोभा पा रहा था। इन चिन्होंसे गिरिराजकुमारी पार्वतीदेवीको पहचानकर विषकन्याने बारंबार प्रणाम करके इस प्रकार उनकी स्तुति की।
विषकन्या बोली— देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। सबमें निवास करनेवाली देवि! आपको नमस्कार है। समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, जरा-मरणसे रहित तथा सत्यस्वरूपा पार्वती! आपको नमस्कार है। देवि! इन्द्र आदि देवता भी आपके स्वरूपका यथार्थतः वर्णन करना