संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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नहीं जानते। फिर मुझ-जैसी मनुष्यकन्या आपके विषयमें क्या कह सकती है? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशस्वरूप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, देवता, असुर और मनुष्य आदि प्राणियोंसहित जिनके श्रीअंगोंसे प्रकट हुआ है, जिनका जन्म देनेमें ब्रह्मा, नाश करनेमें महेश्वर और पालन करनेमें विष्णु भी समर्थ नहीं हैं, उन सर्वेश्वरीदेवीकी मैं कैसे स्तुति कर सकूँगी। जिनमें अणिमा आदि आठ गुणोंवाला ऐश्वर्य स्वभावतः विद्यमान है तथा जिनका ऐश्वर्य लोकमें सबसे बढ़कर और सबके लिये अत्यन्त स्पृहणीय है। जिनके अनेक स्वरूपोंका ध्यानपरायण मुनिगण निरन्तर भक्तिपूर्वक ध्यान करते और उस ध्यानके प्रभावसे सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त होते हैं। मोक्षप्राप्तिके लिये दृढ़ निश्चय रखनेवाले योगी पुरुष अपने हृदयमें जिनके स्वरूपका चिन्तन करके भावरूप पुष्पोंके द्वारा उसकी अर्चना करते हैं, उन महामहेश्वरीदेवीका स्तवन मैं मानवी होकर कैसे कर सकती हूँ?<br><br>पार्वतीदेवीने कहा—पुत्रि! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मनोवांछित वर माँगो।<br><br>विषकन्या बोली—देवि! मैंने पतिकी प्राप्तिके लिये तपस्याका यह उद्योग किया था, किंतु अब तो मैं बूढ़ी हो गयी। अतः पति लेकर क्या करूँगी। अब तो इतनी ही प्रार्थना है कि आप | संसारकी समस्त नारी-जातिके हितके लिये इस आश्रममें सदा निवास करें।<br><br>देवीने कहा—भद्रे! आजसे मैं तुम्हारे इस श्रेष्ठ एवं शुभ आश्रममें निवास करूँगी। इससे तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। माघशुक्ला तृतीयाको जो स्त्री अथवा पुरुष यहाँ स्नान करेंगे, उन्हें मेरे प्रसादसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होगी। स्त्री हो या पुरुष, इस सरोवरमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो जायँगे। भद्रे! जो कन्या यहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करेगी, उसे निःसन्देह श्रेष्ठ पतिकी प्राप्ति होगी। जो मनुष्य यहाँपर फलोंका दान करेंगे, उनके सभी मनोरथ सफल होंगे।<br><br>ऐसा कहकर पार्वतीदेवीने उस विषकन्याका अपने हाथसे स्पर्श किया। उसी क्षण वह वृद्धावस्थासे मुक्त होकर दिव्यरूपसे सुशोभित हो गयी। तदनन्तर उस विषकन्याको अपनी सेविका बनाकर पार्वतीदेवी उसे कैलासपर्वतपर ले गयीं। तभीसे उस तीर्थको शर्मिष्ठातीर्थ कहते हैं, जो सब पातकोंका नाश करनेके लिये तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। माघमासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको सब उपाय करके मनुष्य उस तड़ागमें स्नान करे। यह परम पवित्र, आयुवर्द्धक, सर्वपापनाशक तथा मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला स्त्रीतीर्थ है, जिसका वर्णन मैंने आपलोगोंसे किया है।
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चमत्कारीदेवीकी महिमा, कार्तिकेयजीके द्वारा शक्तिस्थापना तथा भानुमती-दुर्योधनके विवाहमें सम्मिलित कौरव, पाण्डव एवं यादवोंद्वारा शिवलिंगस्थापन
| सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! पूर्वकालमें महाराज चमत्कारके द्वारा जिनकी श्रद्धापूर्वक स्थापना की गयी थी, वे चमत्कारीदेवी वहीं विद्यमान हैं। कौमारव्रत धारण करनेवाली उन्हीं देवीने लाखों मायामय रूप धारण करनेवाले महिषासुरका वध किया था। महात्मा राजा चमत्कारने जब चमत्कारपुरका निर्माण किया, उस समय नगरकी | तथा उस नगरमें निवास करनेवाले समस्त ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये भक्तिभावित चित्तसे चमत्कारीदेवीको स्थापित किया था। जो महानवमीके दिन चमत्कारीदेवीका विधिपूर्वक पूजन करता है, उसे एक वर्षतक कहीं भूत, प्रेत, पिशाच, शत्रुगण, रोग, चोर तथा दुष्टोंसे भय नहीं होता। शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें पवित्र होकर जो मनुष्य जिस-जिस |