संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११११
कामनाका चिन्तन करते हुए उनकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह उस कामनाको निःसन्देह प्राप्त कर लेता है और जो पुरुष निष्कामभावसे चमत्कारीदेवीका पूजन करता है, वह निश्चय ही देवीके प्रसादसे सुखस्वरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है। उन परमेश्वरीकी आराधना करके पूर्वकालमें बहुतसे राजा, ब्राह्मण तथा योगीजन सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। जो एक वर्षतक प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक चमत्कारीदेवीकी परिक्रमा करता है, वह पशु-पक्षियोंकी योनिमें नहीं जाता है।
स्वामिकार्तिकेयने तारकासुरका वध करके अपनी शक्तिको उसी चमत्कार नामक श्रेष्ठ नगरमें स्थापित किया, जिससे रक्तशृङ्ग पर्वत अत्यन्त दृढ़ हो जाय। उसके बाद उन्होंने प्रसन्न होकर अम्बावृद्धा, आम्रा, माहित्था और चमत्कारी—इन चार देवियोंसे कहा—'आप सब लोग मिलकर इस श्रेष्ठ पर्वतको सुस्थिर बनाये रखें जिससे यह प्रलयकालमें भी अपने स्थानसे विचलित न हो। यह उत्तम नगर सदा मेरे नामसे प्रसिद्ध हो और यहाँके सब ब्राह्मण सदा आप चारों देवियोंको पूजा देंगे।' स्वामिकार्तिकेयजीकी इस बातसे प्रसन्न होकर उन देवियोंने 'बहुत अच्छा' कहकर अपने त्रिशूलका अग्रभाग लगाकर उस पर्वतको सब ओरसे सुदृढ़ कर दिया। जो मनुष्य चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिमें भक्तिभावसे स्वामिकार्तिकेयजीका पूजन करता है, उसे मयूरवाहन स्कन्दजी सन्तोष प्रदान करते हैं। इस प्रकार परम बुद्धिमान् स्कन्दने रक्तशृंग तथा चमत्कार नगरकी रक्षाके लिये वहाँ अपनी शक्ति स्थापित की है।
पूर्वकालमें बलभद्रजीके भानुमती नामसे प्रसिद्ध एक पुत्री थी, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा रूप और उदारता आदि गुणोंसे विभूषित थी। बलभद्रजीने श्रीकृष्णसे सलाह लेकर उस कन्याका विवाह परम बुद्धिमान् राजा दुर्योधनके साथ निश्चित किया। तदनन्तर हस्तिनापुरसे भीष्म, द्रोण आदि कौरवदलके लोग बारात लेकर शीघ्रतापूर्वक द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थित हुए। पाँचों पाण्डव भी परिवारसहित दुर्योधनके साथ द्वारकापुरीको चले। क्रमशः यात्रा करते हुए वे समस्त कौरव तथा पाण्डव धन-धान्यसे सम्पन्न आनर्त देशमें आ पहुँचे, जहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला त्रिभुवनविख्यात हाटकेश्वरक्षेत्र है। वहाँ कौरवोंके पितामह भीष्मजीने राजा धृतराष्ट्रसे कहा—'वत्स! यह भगवान् हाटकेश्वरका उत्तम क्षेत्र है जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। बहुत दिन हुए मैंने इसका दर्शन किया था। अतः हमलोग आजसे पाँच दिनोंतक यहाँ निवास करें और शुद्ध चित्तवाले मुनियोंके जो-जो पुण्यदायक मन्दिर और तीर्थ यहाँ हैं, उन सबका दर्शन करें।'
भीष्मजीके ऐसा कहनेपर राजा धृतराष्ट्रने अपने सौ पुत्रोंके साथ शीघ्रतापूर्वक उस उत्तम क्षेत्रमें गये। वहाँ कोई उपद्रव न होने पाये, इस विचारसे राजाने अपनी सेनाको तो वहाँ जानेसे रोक दिया और स्वयं पाँचों पाण्डवों तथा सौ पुत्रोंसहित भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शकुनि, कर्ण तथा अन्य राजाओंके साथ उस क्षेत्रमें भ्रमण किया। उन सभी क्षत्रियोंने वहाँ रहकर श्रद्धापूत हृदयसे सम्पूर्ण धर्मकार्योंका अनुष्ठान किया। तदनन्तर वे सब लोग वहाँके देवस्थानों, तीर्थों, ब्राह्मणों तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी जनोंकी प्रशंसा करते हुए धृतराष्ट्रके साथ अपनी छावनीपर लौट आये। वहाँसे कौरव तथा पाण्डव द्वारकापुरीको गये। वहाँ पहुँचकर हर्षमें भरे हुए उन सब लोगोंने राजकुमारी भानुमतीके साथ महाराज दुर्योधनका विवाह कराया। उस समय नाना प्रकारके बाजे बजे, वेदमन्त्रोंका उच्चारण हुआ, मनोहर गीत गाये गये तथा सहस्रों वन्दीजनोंने स्तुतिपाठ किया। इस प्रकार आठ दिनोंतक यदुवंशियों और कौरवोंने मिलकर बड़ा भारी उत्सव मनाया। नवें दिन भीष्म आदि कौरवों तथा पाण्डवोंने स्नेहपूर्वक कमलनयन श्रीकृष्णसे कहा—'पुण्डरीकाक्ष! हमलोग आपके और बलरामजीके स्नेहपाशमें इतने बँधे हुए हैं