संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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| १११२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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| कि आपलोगोंका आश्रय किसी प्रकार छोड़ना नहीं चाहते तथापि अब हमें अपने नगरको जाना चाहिये। अतः आप और बलभद्रजी हमें विदा दें।'<br><br>भगवान् श्रीकृष्णने कहा—आपलोगोंको यहाँ रहते हुए न तो वर्ष बीता है, न मास बीता है और न पक्ष ही व्यतीत हुआ है। फिर इतने ही दिनोंमें घर जानेकी उत्कण्ठा कैसे उदित हो गयी? हमारी तो यही इच्छा है कि कौरव, पाण्डव तथा हम सब लोग मिलकर विविध प्रकारसे मनोरंजन करते हुए सदा यहीं टिके रहें। यदि आपका हमलोगोंपर स्नेह हो, तो ऐसा ही करें।<br><br>भीष्मजी बोले—श्रीकृष्ण! आपने जो बात कही है वह सर्वथा योग्य है, परंतु आपके निकट आते हुए हमलोगोंने आनर्त देशमें अत्यन्त अद्भुत हाटकेश्वरक्षेत्रका दर्शन किया था। वहाँ सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी महात्मा राजाओंके द्वारा स्थापित किये हुए अनेकानेक शिवलिंगोंको देखा था। अतः हमारे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ है कि हमलोग भी वहाँ जाकर अपने-अपने नामसे पृथक्-पृथक् शिवलिंगकी स्थापना करें। इसलिये प्रभो! आप अपने चित्तको दृढ़ करके आज्ञा दीजिये कि हमलोग जायँ। आपके दर्शनकी लालसासे हम फिर यहाँ आते-जाते रहेंगे।<br><br>श्रीभगवान्ने कहा—मैं उस परम पवित्र पापनाशक क्षेत्रको जानता हूँ। मेरे सामने अनेकों तापसों तथा दूसरे-दूसरे तीर्थयात्रियोंने भी उसके माहात्म्यकी सदा ही चर्चा की है। अतः आपके साथ हमलोग भी उस क्षेत्रको देखनेकी अभिलाषासे वहाँ शिवलिंगस्थापनाके लिये चलेंगे।<br><br>सूतजी बोले—इस बातको सुनकर कौरव और पाण्डव बड़े हर्षको प्राप्त हुए। फिर सब लोगोंने एक ही साथ हाटकेश्वरक्षेत्रको प्रस्थान किये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने क्षेत्रसे कुछ दूर ही सेनाका पड़ाव डाला और मुख्य-मुख्य कौरव, पाण्डव तथा यादव चमत्कारपुरमें गये। वहाँ जा उस क्षेत्रके समस्त ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें | भाँति-भाँतिके भूषण और वस्त्र देते हुए उन सबने कहा—'द्विजवरो! हम सब लोग यहाँ अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार पृथक्-पृथक् शिवलिंगस्थापना और मन्दिरनिर्माणका कार्य करना चाहते हैं। इसलिये आप लोग शीघ्र आज्ञा दें, जिससे कार्य प्रारम्भ किया जाय। आप ही लोग सब कर्मोंमें होता होंगे। बाहरका दूसरा कोई ब्राह्मण नहीं रहेगा।'<br><br>उनका यह वचन सुनकर उन ब्राह्मणोंने आपसमें विचार करके यह निश्चय किया कि 'इनको हम अवश्य भूमि देंगे, जिससे हमें धनकी भी प्राप्ति होगी और इस स्थानकी भी शोभा बढ़ जायगी।' ऐसा विचार करके कौरवों, यादवों तथा पाण्डवोंसे वे इस प्रकार बोले—'यह क्षेत्र अत्यन्त छोटा है और अन्य राजाओंके मन्दिरोंसे भरा हुआ है; इसलिये हमें कुछ कहते नहीं बनता। आपलोगोंमें जो प्रधान-प्रधान व्यक्ति हों, वे ही यहाँ पृथक्-पृथक् अत्यन्त मनोहर मन्दिरोंका निर्माण करें।' उनका यह कथन सुनकर धृतराष्ट्र आदि प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंने वहाँ सुन्दर मन्दिरोंका निर्माण किया।<br><br>राजा धृतराष्ट्रने अपने सौ पुत्रोंके साथ एक सौ एक शिवलिंग स्थापित किये। समस्त पाण्डवोंने अपने-अपने नामसे पाँच शिवलिंगोंकी स्थापना की। तत्पश्चात् गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी तथा भानुमतीने चार पार्वतीमूर्तियोंकी स्थापना की। तदनन्तर विदुर, शल्य, युयुत्सु, कलिंग, बाह्लीक, कर्ण, वृषसेन, शकुनि, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामाने भी पृथक्-पृथक् सुन्दर मन्दिर बनवाकर बड़ी भक्तिसे एक-एक उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णने एक ऊँचे शिखरवाले मनोहर मन्दिरका निर्माण कराकर उसमें उत्तम शिवलिंगको स्थापित किया। तत्पश्चात् सात्वत, साम्ब, बलभद्र, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध आदि मुख्य-मुख्य यादवोंने भी शिवलिंग स्थापित किये। रुक्मिणीके दस पुत्र चारुदेष्ण आदिने भी श्रद्धापूर्वक दस शिवलिंगोंकी स्थापना की। इस प्रकार वे |