संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११९३ ---|---
सब कौरव, पाण्डव और यादव प्रसन्नतापूर्वक शिवलिंगोंकी स्थापना करके कृतकृत्य हो गये। उन्होंने चिरकालतक उस तीर्थमें रहकर चमत्कारपुरके ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान देकर धनाढ्य बना दिया। इसके बाद वे सब लोग अपने-अपने स्थानको चले गये। जो पुरुष भक्तिभावसे उन शिवलिंगोंकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
स्कन्दस्वामी और देवयजनकी महिमा तथा तीनों सूर्य-विग्रहोंके दर्शनका माहात्म्य
सूतजी कहते हैं—प्राचीन कल्पमें जब देवताओंने हाटकेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की, तब भगवान् शिवने ब्रह्माजीके लिये यह क्षेत्र प्रदान किया था। उस समय वहाँके ब्राह्मणोंकी कलिकाल आदि दोषोंसे रक्षा करनेके लिये महादेवजीने अपने पुत्र कार्तिकेयको ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे वहाँ रहनेकी आज्ञा दी। पिताकी आज्ञासे कार्तिकेयजीने वहाँ निवास किया। जो कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रके योगमें स्वामिकार्तिकेयजीका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंतक धनाढ्य एवं वेदवेत्ता ब्राह्मण होता है। उस तीर्थमें कार्तिकेयजीका मन्दिर बहुत ही ऊँचा और मनोहर है; उस मन्दिरकी चर्चा सुनकर स्वर्गके देवता भी कौतूहलवश वहाँ उतर आये और उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस पवित्रतम नगर एवं मन्दिरका दर्शन किया तथा उस मन्दिरके उत्तर एवं पूर्व दिशामें विधिपूर्वक यज्ञकर्मका अनुष्ठान किया। यज्ञ-होम करके सब देवताओंने वहाँके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दी और उस स्थानका उत्तम फल पाकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। तबसे उस स्थानका नाम देवयजन हुआ। अन्य स्थानोंपर सौ यज्ञ करके मनुष्य जिस फलको पाता है, उसीको वहाँ दक्षिणासहित एक ही यज्ञ करके पा लेता है।
उस तीर्थमें तीन सूर्यविग्रह हैं—प्रथमका नाम मुण्डीर, दूसरेका कालप्रिय तथा तीसरेका मूलस्थान है, जो सब रोगोंका नाश करनेवाले हैं। भगवान् सूर्य प्रातःकाल मुण्डीरमें, मध्याह्नके समय कालप्रियमें तथा सन्ध्याके समय मूलस्थानमें जाते हैं। उस समय जो मनुष्य इन तीनों सूर्यविग्रहोंमेंसे एकका भी भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह निःसन्देह मोक्षको प्राप्त होता है।
समुद्रके निकट विटंकपुर नामक एक उत्तम स्थान है, जो समुद्रकी उत्ताल तरंगोंसे आवृत होनेके कारण ऊँची चहारदीवारीसे सुशोभित प्रतीत होता है। उस नगरमें एक ब्राह्मण था, जो पूर्वकर्मके फलसे युवावस्थामें ही कोढ़ी हो गया था। उसकी पत्नी अच्छे कुलमें उत्पन्न, सती-साध्वी एवं सुशीला थी। वह अपने कोढ़ी पतिको ही कामदेवके समान सुन्दर देखती थी। पतिके अच्छे होनेके लिये ब्राह्मणी भाँति-भाँतिकी बहुमूल्य एवं हितकर ओषधियाँ ले आती और उसके घावोंपर लेप करती थी। एक समय उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके घरमें कोई उत्तम अतिथि आया, जो कि बहुत थका-माँदा था। घरपर आये हुए उस ब्राह्मणको देखकर उसकी सती स्त्रीने भक्तिपूर्वक अनेक उपचारोंसे उसे सन्तुष्ट किया। जब वह स्नान, भोजन और आचमन करके शय्यापर विश्राम करने लगा, तब उससे गृहस्थ ब्राह्मणने पूछा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और इस समय कहाँ जाते हैं?'
पथिक बोला—द्विजश्रेष्ठ! मैं कान्तिपुरका रहनेवाला हूँ, मुझे भी तुम्हारी ही भाँति कुष्ठरोगने दबा लिया था। तब मैंने सुना कि इस पृथ्वीपर समस्त रोगोंका नाश करनेवाले तीन सूर्यविग्रह हैं। सुनकर उन्हींका दर्शन करनेके लिये मैं हाटकेश्वरक्षेत्रमें गया और मुण्डीर स्वामीके पास पहुँचकर वहीं ठहर गया। उस स्थानपर सूर्यदेवका विधिपूर्वक पूजन करनेसे मेरा सब रोग जाता रहा और शरीर परम सुन्दर