संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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हो गया। इस समय मैं वहींसे लौटकर आ रहा हूँ। द्विजश्रेष्ठ! तुम भी उस तीर्थमें जाकर वहाँके तीनों सूर्यविग्रहोंके दर्शन करो, जिससे कुष्ठरोगका नाश हो जाय। आज मुझे तुम्हारे घरमें अपने ही घरका-सा आराम मिला है। अब मैं अपने नगरको जाऊँगा।
पथिककी यह बात सुनकर गृहस्थ ब्राह्मणने अपनी पत्नीके मुखकी ओर देखा। वह बोली—'प्राणनाथ! इन्होंने बहुत अच्छी सलाह दी है, अतः जहाँ वे तीनों सूर्यविग्रह हैं, उस स्थानपर शीघ्र ही चलिये। प्रभो! मैं भी आपके साथ सेवामें संलग्न रहकर चलूँगी।' तदनन्तर उस ब्राह्मणने अपनी स्त्रीके साथ मुण्डीर स्वामीके निकट प्रस्थान किया और बड़े क्लेशसे किसी तरह वह हाटकेश्वरक्षेत्रमें पहुँचा तथा अपनी पत्नीसे बोला—'प्रिये! मैं रोग और भूखसे बहुत कष्ट पा रहा हूँ, अतः मुण्डीर स्वामीके समीपतक चलनेमें असमर्थ हूँ। इसलिये यहींपर अपना शरीर त्याग दूँगा। तुम कोई अच्छा साथ ढूँढ़कर घर लौट जाओ।'
स्त्री बोली—प्राणवल्लभ! आपके भोजन किये बिना मैंने कभी भोजन नहीं किया है। एकान्तमें भी जबतक आप जगे हैं, मैंने कभी नींद नहीं ली है। अतः आज इस महाक्षेत्रमें आकर जब आप परलोक जानेके लिये उद्यत हैं, तब आपको त्यागकर मैं घर कैसे लौट सकती हूँ? आपके बिना बन्धु-बान्धवों, गुरुजनों तथा अन्य सुहृदोंको कैसे मुँह दिखाऊँगी? इसलिये नाथ! मैं आपके साथ ही अग्निमें प्रवेश करूँगी। यह बात मैं शपथ खाकर कहती हूँ। महामते! जितने उपवास आपने किये हैं, उतने ही मुझे भी हुए हैं। इस दशामें आपको छोड़कर मैं घर कैसे जा सकती हूँ।
अपनी पत्नीका ऐसा निश्चय जानकर ब्राह्मणने चिता तैयार करवायी और अपनेको जला डालनेके लिये वह पत्नीके साथ ही चितापर बैठा। फिर मन-ही-मन भगवान् सूर्यका ध्यान करके उसने ज्यों ही आग अपने हाथमें ली, त्यों ही तीन महातेजस्वी पुरुष उसके सामने उपस्थित हो गये। वे ही भगवान् सूर्यके तीनों विग्रह थे। उनका दर्शन करके ब्राह्मण उसी क्षण कोढ़के रोगसे मुक्त तथा सुन्दर कान्तिसे सुशोभित तरुण हो गया। इस प्रकार उस क्षेत्रके तीनों सूर्य बहुत प्रसिद्ध हैं। उनके दर्शनसे भी सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती है।
चन्द्रदेवके मन्दिरके निर्माणका महत्त्व, अम्बावृद्धाके दर्शनकी महत्ता, शन्तनुके राज्यमें अवर्षण, अग्नितीर्थका प्राकट्य और अग्निको ब्रह्माका वरदान
सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रमें परम शुभदायक चन्द्रमाका भी मन्दिर है, जिसके दर्शनसे ही मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। चन्द्रग्रहणके समय अथवा सोमवारके दिन जो वहाँ चन्द्रदेवका दर्शन करता है, वह पापी हो तो भी नरकको नहीं देखता। यह समस्त संसार सोममय है, अतः सोमके प्रतिष्ठित होनेसे सम्पूर्ण त्रिलोकी ही प्रतिष्ठित हो जाती है। ये अन्न आदि सब ओषधियाँ, ये खेतोंमें लहरानेवाले सस्य, जिनके आश्रयसे समस्त जीव जीवन धारण करते हैं, सब सोममय ही हैं। ब्रह्मा आदि देवता क्रमशः सोमको पाकर परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं, अतः सोम श्रेष्ठ माने गये हैं। अग्निष्टोम आदि यज्ञ भी सोममें ही प्रतिष्ठित हैं। इस कारण सोम सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। वे देवता और दैत्य दोनोंके पूज्य हैं। जिस प्रकार पृथ्वीपर अन्य देवेश्वरोंके मन्दिर बनाये जाते हैं, वैसे ही निशानाथ चन्द्रमाका भी मन्दिर बनवाना चाहिये। जिन मनुष्योंने भूतलपर निशानाथ चन्द्रदेवका मन्दिर बनाया है, वे पुण्यराशिका संचय करके मोक्षपदको प्राप्त हो चुके हैं।