संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1144, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १११५
हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो निशानाथ चन्द्रमाका मन्दिर है, उसे महाराज अम्बरीषने बनवाया था। उसीके उत्तर भागमें चन्द्रमाका एक दूसरा मन्दिर भी है, जो महाराज धुन्धुमारके द्वारा स्थापित किया गया है। उसके प्रभावसे वे दोनों राजा जन्म-मृत्युरहित परम सिद्धिको प्राप्त हुए। इसी प्रकार प्रभासक्षेत्रमें महाराज इक्ष्वाकुने श्रद्धापूर्वक चन्द्रमाके तीसरे मन्दिरकी प्रतिष्ठा की है। पृथ्वीपर इन तीन मन्दिरोंको छोड़कर दूसरा कोई चन्द्रमाका मन्दिर नहीं है। चन्द्रमाका यह उत्तम माहात्म्य बताया गया, जो पढ़ने और सुननेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
जिस समय महाराज चमत्कारने इस चमत्कारपुरका निर्माण किया था। उसी समय उस नगरकी रक्षाके लिये ब्राह्मणोंकी सम्मतिसे उन्होंने देवियोंकी भी स्थापना की थी। उन दिनों राजा चमत्कारके दो कन्याएँ थीं। जिनमें एकका नाम था—अम्बा और दूसरीका वृद्धा। उन दोनोंका पाणिग्रहण काशिराजने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार देवता, ब्राह्मण और अग्निके समीप किया। एक समय काशीनरेशका यवनोंके साथ घोर युद्ध हुआ। जिसमें भयानक यवनोंके द्वारा प्रतापी काशिराज भृत्य, सेना तथा वाहनोंसहित मारे गये। अम्बा और वृद्धा यह दुःखद वैधव्य पाकर मनोवांछित फल देनेवाले हाटकेश्वरक्षेत्रमें गयीं और देवीके आराधनमें संलग्न हो शुभदायक तप करने लगीं। इसी समय प्रतापी नरेश चमत्कारने उनके लिये कैलास-शिखरके समान ऊँचा मन्दिर बनवाया। तबसे लेकर उस महान् अभ्युदयशाली क्षेत्रमें वे दोनों अम्बा-वृद्धाके नामसे प्रसिद्ध हुईं। वे दोनों देवियाँ सदा नगररक्षाके कार्यमें तत्पर रहती हैं। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर उन दोनोंका मुख देखता है, उसको एक वर्षतक किसी प्रकारका दोष नहीं प्राप्त होता। जो वर्षके आदि अथवा अन्तमें उन दोनोंकी प्रसन्नताके लिये पूजा करता है, उसे भूतलपर किसी प्रकारका छिद्र नहीं प्राप्त होता। जो पुरुष यात्राके समय उन दोनोंके लिये पूजन करता है, वह मनोवांछित फल पाकर शीघ्र अपने घर लौटता है। जो महानवमीके दिन श्रद्धापूर्वक अम्बा-वृद्धाकी प्रसन्नताके लिये पूजा करता है, वह अकण्टक होकर रहता है।
पूर्वकालमें प्रतीप नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े ही शूरवीर तथा ब्रह्मज्ञानी थे। उनका जन्म चन्द्रवंशमें हुआ था। राजा प्रतीपके दो पुत्र हुए, जो समस्त शुभलक्षणोंसे सुशोभित थे। उनमें पहलेका नाम देवापि और दूसरेका शान्तनु था। कुछ कालके बाद नृपश्रेष्ठ प्रतीप जब ब्रह्मलीन हो गये, तब देवापिने राज्यका त्याग करके तपस्याके लिये वनको प्रस्थान किया। तब उनके छोटे भाई शान्तनुको सब मन्त्रियोंने पिता-पितामहोंके राज्यपर बिठाया। राजा शान्तनुके राज्य करते समय इन्द्रने बारह वर्षोंतक वृष्टि रोक दी। इससे सब लोग बड़ी कठिनाईमें पड़ गये और भूखसे पीड़ित रहने लगे। यदि दैवयोगसे किसीके पास कहीं थोड़ा भी कच्चा या पका अन्न दिखायी देता तो उसे दूसरे बलवान् लोग बलपूर्वक छीन लेते थे। सारे वृक्ष और जलाशय सूख गये। गंगा आदि नदियोंमें भी बहुत थोड़ा जल रह गया। इस प्रकार वर्षा बंद होनेपर धर्मका मार्ग नष्ट हो गया। सम्पूर्ण जगत् हड्डियोंसे भर गया। कोई भी यज्ञ, स्वाध्याय तथा व्रतका पालन नहीं करता था। तब अग्निदेव इन्द्रपर क्रोध करके भूमण्डलवासियोंके लिये अदृश्य हो गये। इसी समय ब्रह्मा और विष्णुको आगे करके सब देवता अग्निकी खोज करनेके लिये पृथ्वीपर घूमने लगे। इधर अग्निदेव हाटकेश्वरक्षेत्रमें ब्रह्माजीके स्थानसे ईशानकोणमें स्थित गम्भीर जलाशयके भीतर प्रवेश कर गये। देवता उन्हें खोजते हुए वहाँ आ पहुँचे। देवताओंको आया देख अग्निदेव उस स्थानसे निकले। तब महात्मा ब्रह्माजीने पूछा—'अग्ने ! तुम देवताओंको देखकर क्यों अन्यत्र चले जाते हो ? तुम्हीं सबके आदि हो और तुम्हीं इन सबके मुखरूपसे जगत्में प्रतिष्ठित हो। तुममें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यको प्राप्त होती है, सूर्यसे वृष्टि होती है और वृष्टिसे अन्न उत्पन्न होता