संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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है। फिर अन्नसे प्रजाका जीवन चलता है, इसलिये तुम्हीं जगत्के धाता और विधाता हो। तुम्हारे सन्तुष्ट रहनेपर सम्पूर्ण जगत् सुरक्षित रहता है और तुम्हारे कुपित होनेपर इसका नाश हो जायगा। अग्निष्टोम आदि सम्पूर्ण यज्ञ तुममें ही प्रतिष्ठित हैं और सम्पूर्ण भूत-प्राणी तुम्हारे ही आश्रयसे जीवित रहते हैं। अग्निदेव ! तुम समस्त भूतोंके भीतर सदा विचरते हो, क्योंकि उदरस्थित अन्न और जलका पाचन तुम्हीं करते हो। अतः सम्पूर्ण देवताओंपर कृपा करो और अपने क्रोधका कारण बताओ। तुम क्यों सबको त्यागकर चले गये थे?'
सूतजी कहते हैं—ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर अग्निदेवने क्रोध त्याग दिया और प्रेमसे कहा—'कमलोद्भव ! इन्द्रने वृष्टि रोक दी, जिससे अन्न आदि ओषधियोंका सर्वनाश हो गया। अतः उन्हींपर क्रोध करके मैं संसारको छोड़कर अदृश्य हो गया था।' यह सुनकर ब्रह्माजीने कहा—'इन्द्र ! अग्निदेव ठीक ही कहते हैं, तुम संसारमें वर्षा क्यों नहीं करते?'
इन्द्रने कहा—पितामह ! अपने बड़े भाईका उल्लंघन करके शन्तनु समूची पृथ्वीका राजा बन बैठा है। इसीलिये मैंने उसके राज्यमें वर्षा रोक दी है। अब आप ही प्रमाण हैं, कहिये मैं क्या करूँ?
ब्रह्माजी बोले—इस उल्लंघनका फल तो उस राजाने पा लिया। अब मेरे कहनेसे तुम शीघ्र ही वर्षा करो, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् अकाल और क्षुधाद्वारा नष्ट होनेसे बच जाय।
तब इन्द्रने शीघ्रतापूर्वक पृथ्वीपर वर्षा करनेके लिये पुष्करावर्तक नामवाले मेघोंको आज्ञा दी। आज्ञा पाते ही उन्होंने बिजली चमकाते और गर्जते हुए क्षणभरमें पृथ्वीको जलसे परिपूर्ण कर दिया। तत्पश्चात् देवताओंसहित ब्रह्माजीने अग्निसे कहा—'पावक ! तुम अग्निहोत्रमें ब्राह्मणोंके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हो जाओ और मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'
अग्नि बोले—यह पवित्र जलाशय भूतलपर अग्नितीर्थ कहलाये। जो प्रातःकाल उठकर श्रद्धापूर्वक इसमें स्नान करनेके पश्चात् अग्निसूक्तका जप करके आदरके साथ आपका दर्शन करे, उसको आप मेरे अनुरोधसे पूर्णतः सन्तुष्ट करें।
ब्रह्माजीने कहा—अग्ने ! जो वेदवेत्ता द्विज प्रातःकाल उठकर यहाँ स्नान और अग्निसूक्तका जप करनेके पश्चात् मेरा दर्शन करेगा, उसे अग्निष्टोम यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा।
अग्निदेव बोले—लोकेश्वर ! बारह वर्षोंतक मुझे कभी तृप्ति नहीं प्राप्त हुई। मर्त्यलोक भूखसे पीड़ित था; अतः मुझे कहीं कुछ नहीं मिला। इसलिये पुनः यहाँ अन्नमय यज्ञ हो।
ब्रह्माजी बोले—हुताशन! यहाँ जो कोई ब्राह्मण निवास करते हैं, वे वसुधाराकी आहुतिसे तुम्हें रात-दिन भक्तिपूर्वक तृप्त करते रहेंगे। इससे तुम पूर्णतः पुष्ट हो जाओगे और उनके भी मनोवांछित मनोरथ पूर्ण होंगे। संक्रान्तिके समय जो वसुधारा प्रदान करनेवाले ब्राह्मण तुम्हारे मुखमें आहुति डालेंगे, उनके जीवभरके अज्ञानजनित पाप नष्ट हो जायँगे। तुम्हारे सन्तुष्ट होनेपर आगे चलकर उशीनर देशमें शिवि नामसे सुविख्यात राजा होंगे, जो श्रद्धापूर्वक द्वादशवार्षिक (बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला) यज्ञ करके वसुधारा देकर तुम्हें वर्षों तृप्त करते रहेंगे। इससे तुम्हें उत्तम पुष्टि प्राप्त होगी। भूतलपर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सब मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे। आजसे लेकर शान्तिक या पौष्टिक जो भी कर्म होगा, वसुधारासे युक्त होगा और तुम्हें परम तृप्ति प्रदान करनेवाला होगा।
अग्निदेवसे ऐसा कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी इन्द्र, विष्णु और शिव आदि देवताओंके साथ ब्रह्मलोकको गये। वहाँसे सब देवता अपने-अपने धामको चले गये। अग्निदेव ब्राह्मणोंके अग्निहोत्र गृहमें प्रकट हुए और विधिपूर्वक प्राप्त वसुधारा होम ग्रहण करने लगे। इस प्रकार हाटकेश्वरक्षेत्रमें परम उत्तम अग्नितीर्थ प्रसिद्ध हुआ, जहाँ प्रातः स्नान करके मनुष्य दिनभरके पापसे मुक्त हो जाता है।
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