भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1146

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १११७

ब्रह्मकुण्ड तथा गोमुखतीर्थकी उत्पत्तिकथा एवं महिमा

सूतजी कहते हैं—महात्मा मार्कण्डेयजीने जिस समय ब्रह्माजीका स्थापन किया था, उसी समय वहाँ पवित्र जलसे युक्त एक कुण्डका भी निर्माण किया और उसके माहात्म्यके विषयमें इस प्रकार कहा—'कार्तिक मासमें चन्द्रनक्षत्र कृत्तिकाके योगमें जो यहाँ भलीभाँति भीष्मव्रतका पालन करेगा, वह उत्तम ब्रह्मलोकमें जायगा।' ऐसा कहते हुए मार्कण्डेयजीके उस वचनको किसी पशुपाल (चरवाहे)-ने सुना और श्रद्धासे प्रेरित होकर उसने कार्तिक मासमें भीष्मपंचक-व्रतका विधिपूर्वक पालन किया। जब कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा आयी तब उसमें स्नान करके ब्रह्माजीकी पूजा की। उसके बाद पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुका भी विधिपूर्वक पूजन किया। तदनन्तर काल आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी और वह इसी नगरमें ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुआ। उस समय उसे अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण बना हुआ था। एक दिन उसने लोगोंके पूछनेपर बताया कि किसी समय महामुनि मार्कण्डेयके मुखसे मैंने ब्रह्मकुण्डका माहात्म्य सुना और कार्तिक मासमें उस शुभदायक कुण्डके जलमें विधिपूर्वक स्नान किया था। उसीके प्रभावसे इस जन्ममें मैं ब्रह्मर्षि चन्द्रात्रेयके वंशमें उत्पन्न हुआ हूँ और पूर्वजन्मकी सब बातोंको भी स्मरण करता हूँ। कार्तिक पूर्णिमाको कृत्तिकानक्षत्रका योग होनेपर यहाँका महत्त्व बढ़ जाता है, इस बातको मैं अनुभव कर चुका हूँ। इसीलिये सदा उत्तम भीष्मपंचक-व्रतका पालन करता हूँ।

इस प्रकार उसकी बात सुनकर अन्य सब श्रेष्ठ ब्राह्मण भी श्रद्धापूर्वक भीष्मपंचक-व्रतका पालन करने लगे। तभीसे उत्तर दिशामें वह कुण्ड इस पृथ्वीपर ब्रह्मकुण्डके नामसे विख्यात हुआ। जो ब्राह्मण सदा उसमें स्नान करता है, वह प्रत्येक जन्ममें श्रेष्ठ ब्राह्मण ही होता है।

वहीं एक गोमुख नामसे प्रसिद्ध अतिशय शोभायमान तीर्थ है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें चमत्कारपुरके भीतर गौओंका पालन करनेवाला एक ब्राह्मण था, जो कुष्ठरोगसे पीड़ित हो अत्यन्त दुर्बल हो गया था। किसी समय उसी मार्गसे उसकी गौओंका झुंड आ निकला। वे सभी गौएँ प्याससे कष्ट पा रही थीं। उस दिन ज्येष्ठ मासकी एकादशी तिथिमें चित्रा नक्षत्रका योग था और मध्याह्नकाल हो गया था। यद्यपि वहाँ घास बहुत उगी थी, फिर भी गरमी और प्यासके कष्टसे किसी भी धेनुने उस घासकी ओर देखातक नहीं। उनमेंसे एक गौने दूरसे ही घासके उस पुंजको देखा और अत्यन्त हर्षमें भरकर तुरंत ही वहाँ जा दाँतोंसे उखाड़कर खींचा। इतनेमें ही उस घासके नीचेसे जलकी धारा निकल आयी। उस प्याससे कष्ट पाती हुई गायने घासको खा धीरे-धीरे दुग्धके समान स्वच्छ एवं मधुर प्रतीत होनेवाले उस जलको जी भरकर पीया। जब वह वेगपूर्वक जल पी रही थी, उसी समय पृथ्वीपर वहाँ जलसे भरे हुए अनेक लंबे-चौड़े गड्ढे प्रकट हो गये। तदनन्तर दूसरी सैकड़ों गौओंने भी उस अत्यन्त निर्मल अमृतरसके समान मधुर जलका पान किया। जैसे-जैसे गौएँ आकर जल पीती थीं, वैसे-ही-वैसे उनके मुखके स्पर्शसे वे गड्ढे बढ़ते जाते थे। इस प्रकार जब सभी गौओंने पानी पीकर प्यासको बुझा लिया, तब वह प्यासा गोपालक ब्राह्मण जलमें घुसा। अपने अंगोंको धोकर और जल पीकर ज्यों ही वह जलसे बाहर निकला त्यों ही अपने शरीरको उसने सूर्यके समान तेजस्वी देखा। इससे उसको बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने घर जाकर सब लोगोंके सामने वहाँका सब वृत्तान्त कह सुनाया। तब वहाँके सब लोग, विशेषतः रोगी मनुष्य, उस दिव्य जलके पास गये और सबने एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान किया। स्नान करते ही सब लोग तत्काल