संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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रोगों और पापोंसे मुक्त हो गये। तबसे वह जल गोमुख तीर्थके नामसे विख्यात हुआ; क्योंकि वह गौओंके मुखसे प्रकट हुआ था।
ऋषि बोले—सूतनन्दन! उस स्थानसे जो वैसा माहात्म्यपूर्ण जल प्रकट हुआ, इसका क्या कारण है?
सूतजीने कहा—महर्षियो! यहाँ पूर्वकालमें महाराज अम्बरीषने तप किया था। तपस्याका कारण यह था कि राजाको वृद्धावस्थामें एक पुत्र हुआ। उसका नाम सुवर्चा था। पूर्वजन्मके कर्मके फलसे बाल्यावस्थामें ही राजकुमार सुवर्चा कोढ़ी हो गये। इससे राजाको बड़ा दुःख हुआ। तब वे सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हाटकेश्वरक्षेत्रमें गये और पुत्रके रोगका निवारण करनेके लिये उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् विष्णुने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और आदरपूर्वक कहा—'वत्स! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे माँगो।'
राजाने कहा—केशव! मेरा पुत्र बाल्यावस्थामें ही कुष्ठरोगसे पीड़ित हो गया है। आप इसके रोगका निवारण करें।
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने एकाग्रमनसे पातालगंगाका स्मरण किया। भगवान्के स्मरण करनेपर पातालगंगा एक छोटा-सा विवर बनाकर तत्काल ऊपर आ गयीं। तब श्रीहरिने राजासे कहा—'तुम्हारा पुत्र इस उत्तम गंगाजलमें स्नान करे।' यह आज्ञा पाकर अम्बरीषने अपने पुत्रको श्रीहरिके सामने ही पातालगंगाके जलमें नहलाया। वहाँ स्नान करनेमात्रसे ही वह बालक उसी क्षण कुष्ठरोगसे मुक्त हो बालसूर्यके समान तेजस्वी हो गया। तब उसने भगवान्को नमस्कार किया। इस बातको कोई जानता नहीं था, इसलिये वह सर्वपापहारी जल वहाँ गुप्त ही रहा। वही पुनः गोमुखद्वारा पृथ्वीपर प्रकट हुआ। आज भी उस जलके स्पर्शसे वहाँका धरातल अत्यन्त पवित्र है। जो पुरुष रविवारको सूर्योदयके समय वहाँ स्नान करता है, उसके गलगण्ड (घेघा) आदि सब रोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं। पापजनित बड़ी भयंकर व्याधियाँ भी निवृत्त हो जाती हैं। फोड़े और चेचक आदिके उपद्रव भी शान्त हो जाते हैं। जो मनुष्य निष्कामभावसे भक्तिपूर्वक इस तीर्थमें स्नान करता है, वह देवदेव चक्रपाणि श्रीहरिके लोकमें जाता है। जिस दिन भगवान् विष्णुने वहाँ गंगाको प्रकट किया था, उस दिन सूर्य वृषराशिपर स्थित थे और चन्द्रमा चित्रानक्षत्रकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा भगवान् विष्णुकी एकादशी तिथि भी विद्यमान थी। फिर गायके मुखसे जिस दिन घासोंका समूह उखाड़ा गया और गंगा भूतलपर प्रकट हुईं, उस दिन भी पूर्वोक्त योग ही था। अतः वही वहाँके लिये उत्तम पर्व है।
परशुरामद्वारा लोहयष्टिकी स्थापना और उसकी महिमा, देवीकुण्डका माहात्म्य, देवीकी कृपासे अजको दिव्यास्त्रोंकी प्राप्ति तथा पातालगमन
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! जिस समय परशुरामजीने रामकुण्डमें जाकर अपने पितरोंका तर्पण किया और यज्ञमें सारी पृथ्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देकर वे क्रोधरहित हो गये, उस समय समुद्र-स्नानके लिये हर्षपूर्वक प्रस्थित हुए। उस यात्राके समय भी उन्होंने अपने हाथमें सूर्यके समान तेजस्वी कुठार ले रखा था। तब समस्त ऋषि-मुनियोंने परशुरामजीसे कहा—'महाभाग राम! आप पुण्यकार्य करनेके लिये जाते समय भी जो हाथमें शस्त्र धारण करते हैं, यह उचित नहीं जान पड़ता। जबतक आपके हाथमें कुठार रहेगा, तबतक आपका क्रोध शान्त नहीं होगा। इसलिये इसे त्याग दीजिये।'
मुनियोंकी यह बात सुनकर परशुरामजीने हाथ जोड़कर विनीतभावसे कहा—विप्रवरो!