संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1148, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १११९
यह कुठार अक्षय है और भगवान् शंकरके तेजसे प्रकट हुए लोहका बना हुआ है। साक्षात् विश्वकर्माने इसका निर्माण किया है। ऐसे दिव्य शस्त्रको त्यागकर मैं क्षात्रधर्ममें तत्पर होकर भी कैसे दिग्दिगन्तमें जा सकता हूँ? मेरे छोड़े हुए इस कुठारको यदि दूसरा कोई ग्रहण कर लेगा, तो वह मेरेद्वारा वध्य होगा। अतः यदि इसे छोड़ भी दूँ, तो मेरे मनमें शान्ति नहीं रहेगी। मैं इसे तभी छोड़ सकता हूँ, जब आपलोग इसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करें।
ब्राह्मणोंने कहा—महाभाग! यदि तुम इस कुठारको हमें रक्षाके लिये सौंपते हो, तो इसका खण्ड-खण्ड करके दो। तभी हम यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करेंगे। उस दशामें कोई इसे लेगा भी नहीं।
मुनियोंकी यह बात सुनकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने उस कुठारको तोड़कर लोहेकी छड़ी बनवा दी और उसे उन ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक सौंप दिया।
ब्राह्मण बोले—राम! आपके कुठारकी बनी हुई इस लोहेकी छड़ीको हमलोग बड़े यत्नसे रखेंगे। जैसे कुमार कार्तिकेयकी शक्तिमयी कीर्ति यहाँ प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार आपकी लोहयष्टिमयी कीर्ति भी यहाँ प्रतिष्ठित हो गयी। जो राज्यभ्रष्ट राजा इस लोहदण्डकी आराधना करेगा, वह शीघ्र ही अपने राज्यको पाकर प्रतापी होगा। जो द्विज सदा विद्याके लिये इस लोहयष्टिकी पूजा करेगा, वह उत्तम विद्या पाकर सर्वज्ञताको प्राप्त होगा। जो पुत्रहीन पुरुष अथवा स्त्री आपके इस लोहदण्डकी पूजा करेंगे, वे पुत्रवान् होंगे। जो आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके इसकी पूजा करेगा, वह समस्त मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त करेगा।
ऐसा सुनकर परशुरामजीने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम करके तुरंत ही समुद्रकी ओर प्रस्थान किया और वे ब्राह्मण भी उस लोहयष्टिके लिये उत्तम मन्दिर बनवाकर उसमें उसकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी पूजा करने लगे। इससे उन्होंने अपने देवदुर्लभ मनोरथोंको भी प्राप्त कर लिया।
सूतजी कहते हैं—प्राचीनकालमें अज नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनका सत्पुरुषोंमें भी बड़ा सम्मान था। वे माता-पिताकी भाँति सब लोगोंका हित करनेवाले थे। उन्होंने पिता-पितामहका राज्य पाकर मन-ही-मन यह विचार किया कि 'मुझे ऐसा कर्म करना चाहिये, जिसे संसारके दूसरे राजाओंने अबतक न किया हो और जो भविष्यमें होनेवाले हैं, वे भी जिसे न कर सकें। राजाओंके लिये सर्वोत्तम धर्म यही है कि प्रजाका भलीभाँति पालन करे, जिससे प्रजावर्गके लोग सुखपूर्वक रह सकें। राजालोग लोभमें आकर जैसे-जैसे प्रजासे अधिक कर लेने लगते हैं, वैसे-वैसे प्रजाके हृदयमें क्षोभ उत्पन्न हो जाता है। राजा कर लिये बिना हाथी, घोड़े और पैदल आदि सेनाकी रक्षा नहीं कर सकते और यदि सेना न रहे तो नीच-से-नीच भी मनुष्य उन्हें दबा लेंगे। इसीलिये सब राजा प्रजाजनोंसे कर लेते हैं। अतः मुझे हाथी, घोड़े और पैदल आदिके बिना ही केवल तपस्याकी शक्तिसे अपने राज्यको निष्कण्टक बनाये रखना चाहिये।'
ऐसा सोचकर वे कर न लेकर सदा प्रजाको प्रसन्न रखने लगे। दूसरे राजाओंसे भी कर लेना उन्होंने बंद कर दिया और अपने पुरोहित मुनिवर वसिष्ठको आदरपूर्वक बुलाकर पूछा—'ब्रह्मन्! इस भूतलपर सबसे उत्तम तीर्थ कौन है, जहाँ थोड़े ही समयमें भगवान् शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। उसे शीघ्र बताइये। जिससे मैं वहाँ जाकर सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करूँ।'
वसिष्ठजी बोले—नृपश्रेष्ठ! हाटकेश्वरक्षेत्र मनीषियोंको शीघ्र ही उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला तथा सब पातकोंका नाशक है। वही सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ है। इसी प्रकार देवताओंमें भी भगवती चण्डिका ही ऐसी हैं, जो श्रद्धालु मनुष्योंद्वारा