भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1149, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1149
१९२०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आराधना करनेपर शीघ्र सन्तुष्ट होती हैं। इसलिये उसी क्षेत्रमें जाकर तुम श्रद्धापूर्वक देवीकी आराधना करो। ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पवित्र व्रतमें तत्पर रहो। नियमपूर्वक रहते हुए नियमित भोजन एवं त्रिकाल स्नान करो।

वसिष्ठजीके बताये अनुसार राजा अजने हाटकेश्वरक्षेत्रमें देवीकी आराधना की। गन्ध, पुष्प और अनुलेपन आदि उपचारोंके द्वारा निरन्तर पूजामें तत्पर हुए राजापर देवी चण्डिका प्रसन्न हुईं और बोलीं—'वत्स ! मैं तुम्हारे इस व्रत और पूजाविधानसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे माँगो। मैं उसे शीघ्र पूर्ण करूँगी।'

राजाने कहा—देवि! मैंने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे इस व्रत और तपस्याका आश्रय लिया है। जिससे सब लोगोंको सुख मिले, ऐसी कृपा कीजिये। मुझे बहुत-से ऐसे ज्ञानयुक्त विचित्र-विचित्र अस्त्र दीजिये, जो स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचर सकें। जो इस भूतलपर स्थित और मेरे पासकी भी सब वस्तुओंको भी स्वतः जान लें। लोकमें परस्त्रीसंगम आदि जो अपराध हों, उन सबको स्वयं जानकर अपराधके अनुसार जो स्वतः दण्ड दे दें, जिससे लोकमें संकरता न फैलने पावे। इसके सिवा मुझे भाँति-भाँतिके मन्त्र दीजिये, जिनसे मैं सबकी रोग-व्याधियोंको शीघ्र निवारण कर सकूँ। जिससे मेरे राज्यमें रहनेवाले सब मनुष्य सुखी, नीरोग, पुष्ट, निर्भय तथा शोकरहित हो जायँ।

देवी बोलीं—राजन् ! तुमने यह एक ऐसा बड़ा अद्भुत कर्म प्रारम्भ किया है, जिसे अबतक न तो किसीने किया है और न आगे कोई करेगा। तथापि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगी। मैं तुम्हें समस्त ज्ञानयुक्त शस्त्र देती हूँ और वैसे ही प्रभावशाली मन्त्र देती हूँ। इन मन्त्रोंसे बड़े-बड़े भयंकर रोग भी तुम्हारे द्वारा रोक दिये जायँगे, परंतु मेरे मन्त्रोंसहित उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको तुम सदा सुरक्षित रखना। यदि वे तुम्हारी दृष्टिसे कहीं दूर निकल जायँगे तो मनुष्योंको बहुत अधिक पीड़ा देंगे। राजन् ! तुम जब स्वर्गलोकको जाओ तब इन समस्त मन्त्रों और अस्त्र-शस्त्रोंको यहाँ मेरे सम्मुख जलमें स्थापित कर देना, जिससे सब व्यवहार पूर्ववत् नीतिके अनुकूल चल सके।

'बहुत अच्छा' कहकर राजाने देवीकी आज्ञा शिरोधार्य की। फिर तो उनके सामने वे ज्ञान-वैभवसे युक्त नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र प्रकट हुए, जिनके लिये उन्होंने देवीसे प्रार्थना की थी। साथ ही, व्याधिनाशक मन्त्र भी उनके ज्ञानमें आ गये, जिनके द्वारा सब रोग स्वेच्छानुसार ग्रहण किये और छोड़े जाते हैं तथा जिनके द्वारा दृष्टिमें आये हुए सब मनुष्योंका सुखपूर्वक पालन होता है।

तत्पश्चात् राजाने देवीके प्रसादको ग्रहण करके अपनी पत्नी इन्दुमति और पुत्र दशरथको छोड़कर शेष समस्त पदार्थों और हाथी-घोड़े आदि उपकरणोंको ब्राह्मणोंकी सेवामें दान कर दिया। रोग-व्याधियोंको मन्त्रोंके द्वारा दूर करके वे डंडा लेकर अजापालनकी तरह स्वयं प्रजापालन करने लगे। उनके राज्यमें कोई छिपकर भी अपराध नहीं कर पाता था। यदि कोई प्रमादवश पृथ्वीपर पाप करता तो उसे तत्काल ही तदनुकूल दण्ड मिल जाता था। राजाके वे दिव्यास्त्र किसीके दृष्टिमें न आकर भी वध अथवा बन्धन आदि दण्ड तत्काल देते थे। अन्य राजाओंके राज्यमें तो जो मनुष्य गुप्त पाप करते थे, उन्हींके पापोंका यमराज दण्ड देते थे; परंतु राजा अजके राज्यमें उन दिव्यास्त्रोंके भयसे डरा हुआ कोई भी मनुष्य पाप नहीं करता था। अतः वे सभी पापमुक्त एवं पवित्र शरीरवाले हो गये। रोगोंका नियन्त्रण हो जानेके कारण सब मनुष्योंको उत्तम सुख प्राप्त होता था। इस प्रकार संसारसे जब पापका भय निवृत्त हो गया, तब यमलोकके सभी नरक सूने हो गये। कोई भी पुरुष नरकमें नहीं

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