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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
१९२०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आराधना करनेपर शीघ्र सन्तुष्ट होती हैं। इसलिये उसी क्षेत्रमें जाकर तुम श्रद्धापूर्वक देवीकी आराधना करो। ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पवित्र व्रतमें तत्पर रहो। नियमपूर्वक रहते हुए नियमित भोजन एवं त्रिकाल स्नान करो।

वसिष्ठजीके बताये अनुसार राजा अजने हाटकेश्वरक्षेत्रमें देवीकी आराधना की। गन्ध, पुष्प और अनुलेपन आदि उपचारोंके द्वारा निरन्तर पूजामें तत्पर हुए राजापर देवी चण्डिका प्रसन्न हुईं और बोलीं—'वत्स ! मैं तुम्हारे इस व्रत और पूजाविधानसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे माँगो। मैं उसे शीघ्र पूर्ण करूँगी।'

राजाने कहा—देवि! मैंने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे इस व्रत और तपस्याका आश्रय लिया है। जिससे सब लोगोंको सुख मिले, ऐसी कृपा कीजिये। मुझे बहुत-से ऐसे ज्ञानयुक्त विचित्र-विचित्र अस्त्र दीजिये, जो स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचर सकें। जो इस भूतलपर स्थित और मेरे पासकी भी सब वस्तुओंको भी स्वतः जान लें। लोकमें परस्त्रीसंगम आदि जो अपराध हों, उन सबको स्वयं जानकर अपराधके अनुसार जो स्वतः दण्ड दे दें, जिससे लोकमें संकरता न फैलने पावे। इसके सिवा मुझे भाँति-भाँतिके मन्त्र दीजिये, जिनसे मैं सबकी रोग-व्याधियोंको शीघ्र निवारण कर सकूँ। जिससे मेरे राज्यमें रहनेवाले सब मनुष्य सुखी, नीरोग, पुष्ट, निर्भय तथा शोकरहित हो जायँ।

देवी बोलीं—राजन् ! तुमने यह एक ऐसा बड़ा अद्भुत कर्म प्रारम्भ किया है, जिसे अबतक न तो किसीने किया है और न आगे कोई करेगा। तथापि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगी। मैं तुम्हें समस्त ज्ञानयुक्त शस्त्र देती हूँ और वैसे ही प्रभावशाली मन्त्र देती हूँ। इन मन्त्रोंसे बड़े-बड़े भयंकर रोग भी तुम्हारे द्वारा रोक दिये जायँगे, परंतु मेरे मन्त्रोंसहित उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको तुम सदा सुरक्षित रखना। यदि वे तुम्हारी दृष्टिसे कहीं दूर निकल जायँगे तो मनुष्योंको बहुत अधिक पीड़ा देंगे। राजन् ! तुम जब स्वर्गलोकको जाओ तब इन समस्त मन्त्रों और अस्त्र-शस्त्रोंको यहाँ मेरे सम्मुख जलमें स्थापित कर देना, जिससे सब व्यवहार पूर्ववत् नीतिके अनुकूल चल सके।

'बहुत अच्छा' कहकर राजाने देवीकी आज्ञा शिरोधार्य की। फिर तो उनके सामने वे ज्ञान-वैभवसे युक्त नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र प्रकट हुए, जिनके लिये उन्होंने देवीसे प्रार्थना की थी। साथ ही, व्याधिनाशक मन्त्र भी उनके ज्ञानमें आ गये, जिनके द्वारा सब रोग स्वेच्छानुसार ग्रहण किये और छोड़े जाते हैं तथा जिनके द्वारा दृष्टिमें आये हुए सब मनुष्योंका सुखपूर्वक पालन होता है।

तत्पश्चात् राजाने देवीके प्रसादको ग्रहण करके अपनी पत्नी इन्दुमति और पुत्र दशरथको छोड़कर शेष समस्त पदार्थों और हाथी-घोड़े आदि उपकरणोंको ब्राह्मणोंकी सेवामें दान कर दिया। रोग-व्याधियोंको मन्त्रोंके द्वारा दूर करके वे डंडा लेकर अजापालनकी तरह स्वयं प्रजापालन करने लगे। उनके राज्यमें कोई छिपकर भी अपराध नहीं कर पाता था। यदि कोई प्रमादवश पृथ्वीपर पाप करता तो उसे तत्काल ही तदनुकूल दण्ड मिल जाता था। राजाके वे दिव्यास्त्र किसीके दृष्टिमें न आकर भी वध अथवा बन्धन आदि दण्ड तत्काल देते थे। अन्य राजाओंके राज्यमें तो जो मनुष्य गुप्त पाप करते थे, उन्हींके पापोंका यमराज दण्ड देते थे; परंतु राजा अजके राज्यमें उन दिव्यास्त्रोंके भयसे डरा हुआ कोई भी मनुष्य पाप नहीं करता था। अतः वे सभी पापमुक्त एवं पवित्र शरीरवाले हो गये। रोगोंका नियन्त्रण हो जानेके कारण सब मनुष्योंको उत्तम सुख प्राप्त होता था। इस प्रकार संसारसे जब पापका भय निवृत्त हो गया, तब यमलोकके सभी नरक सूने हो गये। कोई भी पुरुष नरकमें नहीं

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११२१

जाता था। सत्ययुगमें लोगोंका जैसा व्यवहार था, वैसा ही त्रेतामें भी हुआ।

एक समय भगवान् शंकर व्याघ्रका शरीर धारण करके बार-बार गर्जना करते हुए जहाँ राजा अज थे, वहीं उपस्थित हो गये। विकराल शरीर धारण करनेवाले उस व्याघ्रको देखकर राजाने भगवतीके दिये हुए सूर्यके समान तेजस्वी अस्त्रका प्रहार किया। क्रमशः देवीसे प्राप्त हुए अन्यान्य अस्त्रोंका भी प्रयोग किया, परंतु उन सभी अस्त्रोंको भगवान् शंकरने धीरे-धीरे अपने मुखमें ग्रहण कर लिया। तब अस्त्रोंके अभावसे राजाने व्याघ्ररूपधारी भगवान् शिवसे द्वन्द्वयुद्ध किया। उनके शरीरका स्पर्श होते ही भगवान् शिवने व्याघ्रशरीर त्याग दिया और भस्मांगराग-विभूषित, चन्द्रार्धमुकुटमण्डित दिव्यरूप धारण कर लिया। उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही थी। उन्होंने खट्वांग तथा सर्पमय आभूषण धारण कर रखे थे। भगवान् शिवको इस रूपमें प्रत्यक्ष देखकर रानीसहित राजा अजने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् उनकी स्तुति करके वे विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़े हो गये और आनन्दाश्रु बहाते हुए हर्षगद्गद वाणीमें बोले—'प्रभो! मैंने अज्ञानवश जो आपका तिरस्कार किया और आपके ऊपर अस्त्र चलाया, वह सब अपराध कृपया क्षमा करें।'

भगवान् शिव बोले—बेटा! तुम्हारा अलौकिक कर्म देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ, अतएव उस तिरस्कारको मैंने अपनी स्वाभाविक क्षमासे ही क्षमा कर दिया है। राजन्! तुमने जैसा राज्य किया, जिस प्रकार प्रजाकी रक्षा की, वैसी राज्यव्यवस्था अबतक न तो किसीने की थी और न कोई आगे करेगा ही। अतः तुम अभी अपनी इन रानीके साथ इसी शरीरसे पाताललोकमें चलो।

राजाने कहा—भगवन्! मैं अयोध्या नामक महापुरीमें अपने पुत्र दशरथको राजसिंहासनपर बिठाकर उसे मन्त्रियोंके अधीन सौंपकर आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। जिन्होंने सन्तुष्ट होकर मुझे अस्त्र-शस्त्र तथा यन्त्रसमुदाय दिये थे, उन महादेवीने यह आज्ञा की थी कि 'जब तुम दुस्त्यज मर्त्यलोकका त्याग करने लगो, तब मेरे कुण्डमें इन सबको डाल देना।' अतः आप उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको मुझे पुनः लौटा दें, जिससे मैं देवीके ऋणसे उऋण हो जाऊँ।

उनके ऐसा कहनेपर भगवान् त्रिपुरारिने राजाको वे दिव्य अस्त्र-शस्त्र लौटा दिये और आज्ञा देते हुए कहा—राजन्! तुम्हारा पुत्र स्वयं ही राजा हो जायगा। वह वीरता, उदारता और शम आदि गुणोंसे सम्पन्न हो तुम्हारे वंशको धारण करनेमें समर्थ होगा। तुम आज ही मेरे साथ इस देवीकुण्डके पवित्र जलमें प्रवेश करके मेरे धामको चलो। आज माघ शुक्ला चतुर्दशीका दिन है। दूसरा कोई भी जो पुरुष इस तिथिको देवीकी भक्तिपूर्वक पूजा करके इस जलमें गोता लगाकर प्राण त्याग करेगा, वह पाताललोकमें, जहाँ हाटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध मेरा दिव्य विग्रह है, वहाँ पहुँच जायगा। नृपश्रेष्ठ! जो इस तीर्थमें केवल स्नानमात्र करेगा, उसके एक सौ आठ रोगोंमेंसे एक भी न होगा।

ऐसा कहकर भगवान् शिवने रानी तथा उन अस्त्र-शस्त्रोंके सहित राजाको साथ लेकर उस देवीकुण्डके जलमें प्रवेश किया और वहाँसे उन्हें अपने धाममें पहुँचा दिया। उसी मानवशरीरसे राजा अज अपनी रानीके साथ आज भी अजर-अमर होकर वहाँ पातालमें रहते हैं और हाटकेश्वर भगवान्‌की श्रद्धापूर्वक आराधना करते हैं।

इस प्रकार हाटकेश्वरक्षेत्रमें माहेश्वरी देवीका प्रादुर्भाव हुआ है, जिसे राजा अजने श्रद्धापूर्ण हृदयसे स्थापित किया था।

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११२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

राजवापीके प्रसंगमें राजा दशरथका प्रभाव, शनैश्चरग्रहकी पराजय, इन्द्रके साथ राजाकी मैत्री और उनके यहाँ श्रीराम आदिके प्राकट्यकी कथा

सूतजी कहते हैं—राजा अजके पाताललोकमें गमन करनेके पश्चात् उनके पुत्र दशरथ राजा हुए। मन्त्रियोंने उनको आगे रखा और सदा सम्मान दिया। ये वे ही राजा दशरथ थे, जो प्रतिदिन इन्द्रलोकमें जाते और इन्द्रके साथ क्रीडा करते थे। इन्होंने रोहिणीका भेदन करनेवाले शनैश्चरग्रहको परास्त किया था तथा इनके घरमें साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर रावणका विनाश करनेके लिये अवतार लिया था। राजा दशरथने भी हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाकर आराधनाद्वारा भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट किया और सुन्दर मन्दिर निर्माण करके वहीं उनको स्थापित किया। वहाँ राजा दशरथकी वापी प्रसिद्ध है, जिसे उन्होंने स्वयं तैयार कराया था। उसे लोकमें 'राजवापी' कहते हैं। जो लोग पंचमीको तथा विशेषतः पितृपक्षमें वहाँ श्राद्ध करते हैं वे सत्पुरुषोंके प्रिय होते हैं।

किसी समय ज्योतिषके विद्वानोंने राजासे यह कहा कि 'शनैश्चर ग्रह रोहिणीका भेदन करेगा और यदि ऐसा हुआ तो संसारमें बारह वर्षोंतक घोर अनावृष्टि होगी, सर्वत्र अकाल पड़ जायगा। उस समय सम्पूर्ण भूमण्डल मनुष्योंसे शून्य हो जायगा।' उनकी यह बात सुनकर राजा दशरथके मनमें शनैश्चरके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। राजाको इन्द्रने एक कामग विमान दे रखा था। उसीपर बैठकर दशरथने शनैश्चरपर आक्रमण किया और अपने महान् धनुषको खींचकर उसपर तीखे बाणका सन्धान किया तथा नीचे मुख किये स्थित हुए शनैश्चरके सामने खड़े होकर कहा—'शनैश्चर! मेरे कहनेसे तुम रोहिणीका मार्ग त्याग दो, अन्यथा इस मन्त्रप्रेरित दिव्यास्त्रसे मारकर मैं तुम्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।'

उनकी यह भयङ्कर बात सुनकर शनैश्चर देवको बड़ा विस्मय हुआ और वे बोले—महाभाग! तुम कौन हो जो मेरा मार्ग रोकते हो? यह मार्ग तो किसीके द्वारा गम्य नहीं है, देवता और असुर भी यहाँ नहीं आ सकते, फिर तुम कैसे चले आये?

राजाने कहा—मैं सूर्यवंशमें उत्पन्न महाराज अजका पुत्र दशरथ नामक राजा हूँ और क्रोधपूर्वक तुम्हें रोहिणीके मार्गसे हटानेके लिये आया हूँ।

शनैश्चर बोले—राजन्! तुम्हारे साथ तो मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर क्यों तुम अतिशय क्रोधमें आकर मेरा मार्ग रोकना चाहते हो?

राजाने कहा—अभी-अभी ज्योतिषियोंने मुझे बताया है कि तुम (शनैश्चर) रोहिणीचक्रका भेदन करनेवाले हो और यदि तुमने उसका भेदन कर दिया तो इन्द्र वर्षा रोक देंगे। वृष्टि रुक जानेसे पृथ्वीपर अन्न नहीं पैदा होगा और अन्नके अभावसे भूतलके समस्त प्राणी नाशको प्राप्त हो जायँगे। जब सब प्राणियोंका नाश हो जायगा, तब यज्ञ कौन करेगा? फलतः अग्निष्टोम आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ पृथ्वीसे उठ जायँगी और ऐसा होनेपर प्रलय मच जायगा। सूर्यनन्दन! इसीलिये मैंने तुम्हारी राह रोकी है।

शनिदेव बोले—बेटा! अपने घरको लौट जाओ। इच्छा हो तो मुझसे भी तुम कोई वर माँगो; मैं तुम्हारे पराक्रमसे सन्तुष्ट हूँ। मैं अपनी दृष्टिसे जिसे देख लूँ, वह भस्म हो जाता है। इसीलिये अपनी दृष्टि सदा नीची किये रहता हूँ। तुमने प्रजावर्गके हितके लिये मेरे भयको त्याग दिया है, अतः तुम्हारे लिये मैं रोहिणीका भेदन नहीं करूँगा।

राजाने कहा—शनिदेव! आपका दिन प्राप्त होनेपर जो मनुष्य अपनी शरीरमें तेल लगाता है, उसको अपना दूसरा दिन आनेतक आप कभी

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११२३ ---|---
पीड़ा न दें। जो आपके सन्तोषके लिये यथाशक्ति लोहा और तिल आदि दान करता है, उसकी एक वर्षतक आप प्रत्येक कष्ट और संकटसे रक्षा करें। सूर्यनन्दन! जब आप कुण्डलीमें पीडाकारक स्थानमें स्थित हों, उस समय जो भक्तिपूर्वक आपके दिवसमें तिल, लोह आदि दान करके विधिवत् शान्तिकर्म और पूजा करे, उसकी साढ़े सात वर्षोंतक आप सदा रक्षा करते रहें, यही मेरे लिये आप वरदान दें।<br>सूतजी कहते हैं—तब शनैश्चरदेवने 'तथास्तु' कहकर राजाकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वे मौन हो गये। तभीसे राजा दशरथकी बात मानकर शनैश्चरदेव कभी रोहिणीमण्डलका भेदन नहीं करते हैं। इस समाचारको सुनकर इन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए और राजा दशरथसे मिलकर आदरपूर्वक बोले—'राजन्! तुमने यह बड़ा अद्भुत पराक्रम किया है, दूसरा कोई तो इस बातकी कल्पना भी अपने मनमें नहीं ला सकता। अतः इस पुरुषार्थसे मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो कोई अभिलाषा हो उसके अनुसार मुझसे वर माँगो।'<br>राजा बोले—सुरश्रेष्ठ! आपके साथ सदा मेरी मैत्री बनी रहे। यही प्रार्थना करता हूँ।<br>इन्द्रने कहा—राजेन्द्र! ऐसा ही होगा। तुम्हारे साथ मेरी सदैव शाश्वत मैत्री बनी रहेगी। ठीक वैसी ही, जैसी वसु देवताकी मैत्री है। तुम सदैव सन्ध्याके समय मेरे पास आते रहना, जिससेसदैव आपसका मैत्रीभाव बढ़ता रहे।<br>ऐसा कहकर देवराज इन्द्र स्वर्गलोकमें चले गये। राजा दशरथ भी शनैश्चरके भयसे सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करके हर्षपूर्वक अयोध्यापुरीके भीतर अपने भवनमें लौट आये। तबसे प्रायः नित्य ही सायंकालकी उपासना करके राजा दशरथ इन्द्रलोकको चले जाते थे। वहाँपर देवर्षियोंके मुखसे विचित्र अर्थवाली कथाएँ सुनकर और स्वयं भी कहकर अपने घर लौट आते थे। एक समय इन्द्रसे प्रेरित होकर महाराज दशरथने महर्षि वसिष्ठके द्वारा पुत्रके लिये पुत्रेष्टि नामक यज्ञ कराया। तदनन्तर बड़ी रानी कौशल्याने परम धर्मात्मा पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको जन्म दिया। राजाकी सबसे छोटी रानी कैकेयीने भरत नामक पुत्र उत्पन्न किया और मझली रानी सुमित्राने दो महाबली पुत्रोंको जन्म दिया। जिनके नाम लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे। इनके सिवा सुमित्रासे एक सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई, जिसे पुत्रहीन राजा लोमपादको दत्तक पुत्रीके रूपमें दे दिया गया। इस प्रकार पितरोंसे उऋण होकर कृतकृत्य हो राजा दशरथने स्वर्गलोककी यात्रा की। उनके बाद श्रीरामचन्द्रजी चक्रवर्ती राजा हुए, जिन्होंने देवताओंके लिये कण्टकरूप दुर्धर्ष रावणका वध किया और हाटकेश्वरक्षेत्रमें रामेश्वर एवं लक्ष्मणेश्वरकी स्थापना करके मूर्तिमती सीतादेवीको भी प्रतिष्ठित किया था।
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श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणका त्याग, लक्ष्मणका परमधाम-गमन, श्रीरामका किष्किन्धा, लंका एवं हाटकेश्वरतीर्थमें जाना और रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर एवं सीता आदिकी प्रतिमा स्थापित करना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! कमलनयन भगवान् श्रीरामचन्द्रजी लोकापवादके कारण सीताजीका परित्याग करके अयोध्याका राज्य करने लगे। उन्होंने दूसरी किसी स्त्रीको पत्नीरूपमें किसी तरह भी स्वीकार नहीं किया। यज्ञकार्यकीसिद्धिके लिये भी पत्नीके स्थानपर सीतादेवीकी स्वर्णमयी प्रतिमाको ही बिठाया। श्रीरामने ग्यारह हजार वर्षोंतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए निष्कण्टक राज्य किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीके भवनमें एक देवदूत आया और बोला—'भगवन् !

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मुझे इन्द्रने भेजा है, अतः आप मुझसे एकान्तमें मिलिये।' तब भगवान् श्रीरामने एकान्तमें जाकर लक्ष्मणजीसे कहा—'लक्ष्मण! मैं जबतक इस देवदूतके साथ बैठकर वार्तालाप करूँ, तबतक कोई यहाँ न आवे। यदि कोई आवेगा तो उसे मृत्यु-दण्ड दिया जायगा। अतः तुम राजद्वारपर उपस्थित रहकर इस बातकी ओर दृष्टि रखो कि कोई आ न जाय और किसीके लिये वधका प्रसंग न उपस्थित हो जाय।'

लक्ष्मणने 'बहुत अच्छा' कहकर आज्ञा स्वीकार की और वे स्वयं राजद्वारपर खड़े होकर पहरा देने लगे। उधर देवदूतने श्रीरामके साथ वार्तालाप प्रारम्भ किया। इन्द्र तथा अन्य स्वर्गवासियोंका सन्देश सुनाते हुए उसने इस प्रकार कहा—'महाभाग! आपने रावणका विनाश करनेके लिये ही भूतलपर अवतार धारण किया था। वह दुष्ट मारा गया, त्रिभुवनका कण्टक दूर हुआ। आपने इस समय देवताओंका सब कार्य पूर्ण कर दिया। अब यदि आपकी रुचि हो तो मर्त्यलोक त्यागकर दिव्यलोकमें पधारिये।'

इसी समय मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वहाँ आये और लक्ष्मणजीसे पूछने लगे—'श्रीरघुनाथजी कहाँ हैं?' लक्ष्मण बोले—'विप्रवर! मुझपर दया करके थोड़ी देर यहीं ठहर जाइये। महाराज किसी देवकार्यसे एकान्तमें बातचीतमें लगे हुए हैं।'

दुर्वासा बोले—यदि अभी मुझे राजा श्रीरामचन्द्रजी दर्शन नहीं देंगे तो मैं समस्त रघुकुलको शाप देकर भस्म कर डालूँगा।

यह सुनकर लक्ष्मणजीने मन-ही-मन दुःखी होकर कुछ विचार किया और स्वयं श्रीरामचन्द्रजीके समीप जाकर हाथ जोड़ साष्टांग प्रणाम करके कहा—'देव! मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा दर्शनके लिये राजद्वारपर खड़े हैं। उनके लिये क्या आज्ञा है?' लक्ष्मणजीका वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने देवदूतसे कहा—'तुम देवराजके पास जाकर यह कह देना कि मैं एक वर्षके अंदर ही आपके समीप आ जाऊँगा।' दूतसे ऐसा कहकर भगवान्ने लक्ष्मणसे कहा—'वत्स! दुर्वासा मुनिको शीघ्र भीतर ले आओ।' तत्पश्चात् मुनिके आते ही श्रीरामने मुनिको अर्घ्य दे प्रणाम किया और हर्षयुक्त वाणीमें कहा—'मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है, मैं धन्य और अनुगृहीत हूँ, जो कि आप मेरे घर पधारे हैं।'

दुर्वासाने कहा—रघुनन्दन! मैं उपवास-पूर्वक चातुर्मास्य व्रत करके आज भोजन करनेके लिये आपके घर आया हूँ, अतः मुझे शीघ्र भोजन दीजिये।

तब श्रीरामचन्द्रजीने मिष्ठान्न आदिसे मुनिको यथेष्ट भोजन कराकर तृप्त किया। इस प्रकार भोजन करके आशीर्वाद दे दुर्वासा मुनि चले गये। तब लक्ष्मणने भगवान् श्रीरामसे कहा—'प्रभो! अब मुझे मृत्युदण्ड मिलना चाहिये।' यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके दुःखी हो गये। तब लक्ष्मणने कहा—'प्रभो! अपने वचनको बिना किसी हिचकके सत्य कर दिखाना, यही राजाओंका परम धर्म है।' लक्ष्मणकी बात सुनकर श्रीरामके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उन्होंने धर्मशास्त्रके जाननेवाले मन्त्रियोंसे बहुत देरतक सलाह ली और अन्तमें लक्ष्मणजीसे कहा—'सुमित्रानन्दन! आज मैंने तुम्हें त्याग दिया। तुम शीघ्र दूसरे देशको चले जाओ। साधुपुरुषोंका त्याग अथवा वध दोनों बराबर है।'

तत्पश्चात् लक्ष्मणजी अपने घरमें माता, पत्नी, पुत्र या सुहृद् किसीके साथ सम्मति न करके सरयूके तटपर चले गये। वहाँ सरयूजलमें स्नान करके तटपर एकान्त स्थानमें बैठ गये और पद्मासन लगाकर उन्होंने अपने आत्माको परमात्मामें लीन करके ब्रह्मरन्ध्रसे अपने तेजोमय प्राणका परित्याग कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीने जब यह समाचार सुना, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे। वे मन्त्रियों और सुहृज्जनोंको साथ लेकर स्वयं उस स्थानपर गये और करुणस्वरमें 'हा वत्स!' कहकर फूट-फूटकर रोने लगे।

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११२५

उस समय लक्ष्मणजीका कलेवर अदृश्य हो गया और फूलोंकी वर्षाके साथ आकाशवाणी हुई—'महाभाग राम! आप शोक न करें। ब्रह्मज्ञानसे संयुक्त लक्ष्मणजी सर्वसंन्यास करके परम धामको पधार गये हैं।'

आकाशवाणीकी यह बात सुनकर मन्त्रियोंने कहा—महाराज! ये लक्ष्मण परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। अतः अब अपने घरको लौटिये। राजकार्यकी चिन्ता कीजिये और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे पूछकर अपने स्नेहके अनुरूप उनका पारलौकिक कृत्य (श्राद्ध-पिण्डदान आदि) कीजिये।

श्रीरामचन्द्रजी बोले—मैं लक्ष्मणके बिना अब घरको नहीं लौटूँगा। यदि आपलोगोंकी रुचि हो तो मेरे प्रिय पुत्र कुशको राजसिंहासनपर बिठाइये।

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने परम धाम पधारनेका विचार किया। उस समय उन्हें अपने मित्र विभीषणका स्मरण हो आया। वे सोचने लगे—'मैंने विभीषणको, जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता रहेगी तबतकके लिये लंकाका अक्षय राज्य दिया है। परंतु इस पृथ्वीपर पुनः वरदानसे पुष्ट हुए अतिशय क्रूर राक्षसोंका संयोग हो सकता है। अतः मैं विभीषणके समीप जाकर उसे शिक्षा दूँगा, जिससे वे देवताओंसे द्वेष न करें। इसी प्रकार महाभाग सुग्रीव नामक वानर भी मेरे परम मित्र हैं। जाम्बवान्, बालिपुत्र अंगद, पवनसुत हनुमान्, कुमुद तथा तार आदि अन्य वानर भी मेरे परम सुहृद् हैं। इन सब लोगोंसे बातचीत करके विदा लेकर मैं परम धामको जाऊँगा।' ऐसा निश्चय करके भगवान् श्रीरामने पुष्पक विमानको बुलाया और उसपर चढ़कर किष्किन्धापुरीको प्रस्थान किया। किष्किन्धानिवासी वानर पुष्पक विमानका प्रकाश देखकर श्रीरामचन्द्रजीका आगमन जान शीघ्र उनके सामने गये और दूरसे ही धरतीपर घुटने टेककर प्रणाम करके इधर-उधर बार-बार जय-जयकार करने लगे। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीको साथ लेकर सबने सुन्दर ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित महापुरी किष्किन्धामें प्रवेश किया। इसके बाद विमानसे उतरकर श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही सुग्रीवके भवनमें गये। वहाँ वानरोंने अर्घ्य आदिसे श्रीरघुनाथजीका पूजन किया और उनसे पूछा—'रघुनन्दन! घरपर कुशल तो है न? सदा आपके साथ रहनेवाले छोटे भैया लक्ष्मणजी कहाँ हैं? प्राणोंके समान प्रिया सीतादेवीजी कहाँ हैं?'

वानरोंका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार सीता और लक्ष्मणजीका परित्याग हुआ था, वह सब समाचार कह सुनाया। यह सुनकर सुग्रीव आदि सब वानर अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर फूट-फूटकर रोने लगे और श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार बोले—'राजन्! हमलोगोंसे आपका जो कार्य यहाँ सिद्ध होनेवाला हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये। इस भूतलपर हम सभी वानर धन्य हैं, जिनके प्रति ऐसा स्नेह रखकर आप स्वयं हमारे घर पधारे हैं।'

श्रीराम बोले—सुग्रीव! तुम्हारे यहाँ एक रात रहकर मैं जहाँ लंकामें विभीषण हैं, वहाँ जाऊँगा। अपने प्रधान मन्त्रीसहित तुम्हें भी मेरे साथ विभीषणके घरतक चलना चाहिये।

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार समस्त श्रेष्ठ वानरोंने भक्तिपूर्वक सेवित हो श्रीरघुनाथजीने किष्किन्धापुरीमें रातभर निवास किया। फिर प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो रघुनाथजी पुष्पक विमानको बुलाकर दस वानरोंके साथ उसपर आरूढ़ हुए। उन दसों वानरोंके नाम इस प्रकार हैं—सुग्रीव, सुषेण, तार, कुमुद, अंगद, कुन्दु, हनुमान्, गवाक्ष, नल तथा जाम्बवान्। तदनन्तर उस उत्तम विमानके द्वारा वे लंकापुरीकी ओर प्रस्थित हुए और जहाँ पहले राक्षसोंसे युद्ध हुआ था, उन प्रदेशोंको दिखाते हुए तत्काल ही महापुरी लंकामें जा पहुँचे। पुष्पकका प्रकाश देखते ही विभीषणजीको यह ज्ञात हो गया कि श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं। अतः वे प्रसन्नतापूर्वक अपने समस्त मन्त्रियों, सेवकों

१९२६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

और पुत्रोंके साथ उनके सामने आये और दूरसे ही जय-जयकार करते हुए उन्होंने धरतीपर लेटकर साष्टांग प्रणाम किया। विमानसे उतरकर श्रीरघुनाथजीने विभीषणको आदरपूर्वक हृदयसे लगाया और उन्हींके साथ लंकापुरीमें प्रवेश किया। फिर विभीषणके महलमें पहुँचकर वानरों-द्वारा सब ओरसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी शुभ सिंहासनपर विराजमान हुए। तत्पश्चात् विभीषणने अपना राज्य, पुत्र, कलत्र आदि समस्त वैभव श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें समर्पित कर दिया और सामने हाथ जोड़ खड़े हो इस प्रकार कहा—'प्रभो! आज्ञा दीजिये, मैं कौन-सी सेवा करूँ। भगवन्! आप अकस्मात् कैसे आ गये? आपके साथ लक्ष्मण और जानकीजी क्यों नहीं आयीं?'

तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे सब समाचार बताया और उनके हितके लिये इस प्रकार कहा—राक्षसराज! इस समय मैं राज्य त्यागकर अपने परम धामको, जहाँ लक्ष्मणजी गये हैं, शीघ्र जाऊँगा। उनके बिना अब इस मर्त्यलोकमें दो घड़ी भी ठहरनेका मेरे मनमें उत्साह नहीं है। इस समय मैं तुम्हें शिक्षा देनेके लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। तुम शान्तचित्त होकर मेरी बात सुनो। यह राज्यलक्ष्मी स्वल्पबुद्धिवाले पुरुषोंके मनमें मदिराकी भाँति मद उत्पन्न कर देती है। अतः तुम्हें अपने हृदयमें इस मदको स्थान नहीं देना चाहिये। इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंका तुम्हें आदर और पूजन करना चाहिये, जिससे तुम्हारा राज्य सदा सुस्थिर रहे और मेरा वचन भी सत्य हो। इसीलिये मैं यहाँ आया हूँ। यदि कोई मनुष्य किसी प्रकार यहाँ आ जाय तो समस्त निशाचरोंको प्रसन्न होकर उसका सत्कार ही करना चाहिये। विभीषण! तुम्हें अपने समस्त निशाचरोंको मना कर देना चाहिये कि वे मेरे सेतुका उल्लंघन करके भारतवर्षकी भूमिमें न जायें।

विभीषणने कहा—प्रभो! ऐसा ही करूँगा, निःसन्देह आपकी आज्ञाका पालन किया जायगा। परंतु जब आप मर्त्यलोकको छोड़कर पधार जाते हैं, तब मैं भी यहाँ जीवित न रहूँगा। अतः मुझे भी वहीं अपने साथ ले चलिये।

श्रीरामने कहा—राक्षसराज! मैंने तुम्हें अविनाशी राज्य दिया है। अतः किसी प्रकार मुझे मिथ्यावादी न करो। मैं यहाँ सेतुमें कीर्तिके लिये तीन शिवलिंगोंकी स्थापना करूँगा। उन तीनोंकी तुम्हें सदैव पूजा करनी चाहिये।

विभीषणसे इस प्रकार कहकर वानरोंसहित श्रीराम दस रात्रिपर्यन्त वहीं लंकामें टिके रहे। ग्यारहवें दिन विमानपर बैठकर उन्होंने अपनी पुरीको प्रस्थान किया और विभीषण एवं वानरोंके साथ मार्गमें उतरकर आपने सेतुके आदि, मध्य और अन्तमें श्रद्धापूर्वक तीन रामेश्वरोंकी स्थापना की। तत्पश्चात् जब वे अपने घरकी ओर चले, उस समय विभीषणने बार-बार प्रणाम करके कहा—'भगवन्! इस सेतुमार्गसे कौतुकवश तथा श्रद्धासे बहुतेरे मनुष्य रामेश्वरजीका दर्शन करनेके लिये आवेंगे, राक्षसोंकी जाति अत्यन्त क्रूर मानी गयी है, मनुष्यको आते देखकर उनके मनमें उसे खा जानेकी इच्छा पैदा हो जाती है। अतः यदि कोई राक्षस किसी मनुष्यको खा लेगा तो निश्चय ही मेरे द्वारा आपकी आज्ञाका उल्लंघन हो जायगा। इसलिये आप कोई ऐसा उपाय सोचें, जिससे मुझे आज्ञाभंगका दोष न लगे।'

विभीषणका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीरामने कहा—'बहुत अच्छा।' तत्पश्चात् उन्होंने अपना धनुष चढ़ाया और अपने तीखे बाणोंसे सेतुके दस योजन विस्तृत मध्यभागको खण्डित कर दिया। इस प्रकार सेतुमार्गसे लंकामें जाना असम्भव करके उन्होंने वानरों और राक्षसोंके साथ अयोध्यापुरीको प्रस्थान किया।

इस प्रकार अपने नगरको प्रस्थान करते समय मार्गमें आकाशके पथसे जाता हुआ पुष्पक विमान सहसा अचल हो गया। यह देख श्रीरामचन्द्रजीने हनुमान्जीसे कहा—'वायुनन्दन! तुम भूमिपर जाकर पता लगाओ कि क्या कारण है, जिससे पुष्पक विमान आकाशमें रुक गया?' हनुमान्जी

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११२७ ---|---

'बहुत अच्छा' कहकर शीघ्र ही धरतीपर उतरे और पुनः लौटकर भगवान्‌को प्रणाम करके बोले—'भगवन्‌! यहाँ नीचे परम कल्याणमय हाटकेश्वरक्षेत्र है। वहाँ संसारकी सृष्टि करनेवाले साक्षात् ब्रह्माजी विराजमान हैं। यही कारण है कि पुष्पक विमान उन्हें लाँघकर आगे नहीं बढ़ता है।' हनुमान्‌जीकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने विमानको उस क्षेत्रमें उतरनेकी आज्ञा दी। तदनन्तर वे स्वयं विमानसे उतरे और समस्त वानरों तथा राक्षसोंके साथ उस क्षेत्रमें सब ओर घूम-घूमकर तीर्थोंका दर्शन करने लगे। वहाँपर उन्होंने अपने पितामह राजा अजके द्वारा स्थापित की हुई चामुण्डादेवीके दर्शन किये और समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले कुण्डमें स्नान करके अपने पिता राजा दशरथद्वारा स्थापित अपने स्वरूपभूत चार भुजाधारी श्रीविष्णु भगवान्‌का दर्शन किया। वहाँ राजवापीमें स्नान करके शुद्ध हो देवताओं और पितरोंका तर्पण कर उन्होंने मन-ही-मन यह विचार किया कि 'इस परम पुण्यदायक क्षेत्रमें मैं भी शिवलिंगकी स्थापना करूँ, जैसे कि पिताजीने श्रीविष्णु भगवान्‌की स्थापना की है। इसके सिवा मेरे प्रिय भाई लक्ष्मण दिव्य लोकमें चले गये हैं, अतः उनके नामसे भी एक शिवलिंगकी स्थापना करूँ। साथ ही अपनी सीतादेवीकी तथा लक्ष्मणकी भी प्रस्तरमयी प्रतिमा इस पवित्र क्षेत्रमें स्थापित करूँ।'

ऐसा विचार करके श्रीरामचन्द्रजीने पाँच मन्दिर बनवाये और उन सबमें पूर्वोक्त विग्रहोंको स्थापित किया। तत्पश्चात् सब वानरों तथा राक्षसोंने भी अपने-अपने नामसे पृथक्-पृथक् शिवलिंगोंको स्थापित किया। उसके बाद श्रेष्ठ पुष्पकविमानपर बैठकर सब-के-सब अयोध्यापुरीको गये।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार उस कल्याणमय तीर्थमें रामेश्वर और लक्ष्मणेश्वर आदिकी स्थापना की, वह सब प्रसंग मैंने आपलोगोंसे कह सुनाया। जो प्रातःकाल उठकर रामेश्वर और लक्ष्मणेश्वरका दर्शन करता है, वह इस तीर्थमें सम्पूर्ण रामायणके श्रवणसे होनेवाले फलको पाता है। जो अष्टमी और चतुर्दशीको रामेश्वरजीके आगे रामचरितका पाठ करता है, वह अश्वमेध यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।


चित्रशर्मा तथा अन्यान्य ब्राह्मणोंके द्वारा भगवान् शंकरको सन्तुष्ट करके हाटकेश्वर आदि सभी क्षेत्रोंके देवताओंकी चमत्कारपुरमें स्थापना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! पूर्वकालमें चमत्कारपुरके भीतर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, जिनका जन्म वत्सकुलमें हुआ था। उनका नाम चित्रशर्मा था। चित्रशर्मा बड़े यशस्वी थे। एक दिन उनके मनमें यह बात पैदा हुई कि 'मैं पातालसे हाटकेश्वरजीको यहाँ लाकर भक्तिपूर्वक दिन-रात उनका पूजन करूँ।' ऐसा निश्चय करके वे नियमपूर्वक रहते और नियमित भोजन करते हुए बड़ी निष्ठाके साथ तपस्या करने लगे। दीर्घकालतक तपस्या करनेके पश्चात् भगवान् शंकर प्रसन्न हुए और आदरपूर्वक बोले—'विप्रवर! तुम्हारा जो मनोरथ हो, उसके अनुसार वर माँगो।'

चित्रशर्मा बोले—देव! आप पातालसे हाटकेश्वरलिंगके रूपमें यहाँ पधारें।

भगवान् शिव बोले—द्विजश्रेष्ठ! मेरा लिंगमय विग्रह सर्वत्र अचल होता है, तुम हाटक (सुवर्ण)-के द्वारा निर्मित दूसरे शिवलिंगकी स्थापना करो। वही संसारमें हाटकेश्वरके नामसे विख्यात होगा। जो शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको सोमवारके दिन श्रद्धापूर्वक भक्तियुक्त चित्तसे उस लिंगकी पूजा करेगा, उसे आदिहाटकेश्वरकी पूजासे होनेवाले कल्याणमय फलकी प्राप्ति होगी। ऐसा कहकर

११२८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। चित्रशर्माने भी मनोहर मन्दिरका निर्माण करके भक्तिभावसे शास्त्रोक्त विधिके अनुसार उसमें स्वर्णमय लिंग स्थापित किया और उसीकी पूजा प्रारम्भ की। वहाँ उस लिंगकी तीनों लोकोंमें ख्याति फैल गयी। दूर-दूरसे लोग आकर उस उत्तम लिंगकी पूजा करने लगे। यह देखकर दूसरे ब्राह्मणोंने यह विचार किया कि 'हमलोग भी भगवान् सदाशिवको आराधनाद्वारा सन्तुष्ट करें। शूलपाणि शिवके अड़सठ क्षेत्र बताये गये हैं, जहाँ ये परमेश्वर तीनों कालमें निवास करते हैं। हम सब लोग प्रयत्न करें तो उन सभी क्षेत्रोंका समूह यहाँ आ जायगा।' तदनन्तर जितने श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, उन सबने दुष्कर तपस्या प्रारम्भ की। सहस्रों वर्ष आराधना करनेपर भी जब उन्हें कोई फल नहीं प्राप्त हुआ तब वे सभी ब्राह्मण क्षुब्ध हो उठे और बोले—'हम बाल्यावस्थासे ही भगवान् शंकरजीकी आराधना करते हुए वृद्ध हो गये, परंतु हमें अबतक परमेश्वर शिवका दर्शन नहीं हुआ, इसलिये अब हम सब लोगोंको अग्निमें प्रवेश कर जाना चाहिये।' ऐसा निश्चय करके उन सबने अग्नि प्रज्वलित की और एकाग्रचित्त होकर वे पुत्रोंके साथ ज्यों ही उसमें प्रवेश करने लगे त्यों ही भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया और हँसकर कहा—'द्विजवरो! ऐसा दुःसाहस न करो। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो उसे माँगो।'

ब्राह्मण बोले—सुरश्रेष्ठ ! आपके जो अड़सठ क्षेत्र परम धन्य कहे जाते हैं और आदिशिवलिंगोंकी स्थितिके कारण जिन्हें परम पूजनीय माना जाता है, वे सभी क्षेत्र यहाँ प्रतिष्ठित हों।

यह सुनकर भगवान् शंकरने सोचा 'मेरे मनमें भी सदा यह कार्य करनेका विचार होता है कि मैं अपने सभी क्षेत्रोंको किसी एक स्थानपर एकत्र करूँ, क्योंकि कलिकाल बड़ा भयंकर होगा। उस समय पृथ्वीपर प्रायः जितने तीर्थ और क्षेत्र हैं, सब नष्ट हो जायेंगे।' ऐसा विचारकर भगवान् शंकरने उन सभी ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रवरो! तुमलोग मन्दिर बनवाओ और उसमें अपने-अपने गोत्रको आगे रखकर उत्तम शिवलिंग स्थापित करो, जिससे उन शिवलिंगोंमें मैं संक्रमण कर सकूँ।' तब उन सभी ब्राह्मणोंने हर्षमें भरकर मनोहर भूमिभागोंको देखकर वहाँ कैलासशिखरके समान उच्च और दिव्य अड़सठ मन्दिर बनवाये तथा उन मन्दिरोंमें भाँति-भाँतिके उत्तम शिवलिंगोंकी स्थापना की और विभिन्न क्षेत्रोंमें जो-जो नाम प्रसिद्ध हैं उनके वही-वही नाम रखे।

इस प्रकार समस्त क्षेत्र और शिवमन्दिर वहाँ सदैव निवास करते हैं।


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अड़सठ क्षेत्रों और उनमें भी प्रधान आठ क्षेत्रोंके नाम तथा उनके कीर्तनका महत्त्व

पार्वतीजीने भगवान् शंकरसे पूछा—प्रभो! आप किन-किन तीर्थोंमें किन-किन नामोंसे कीर्तन करनेयोग्य हैं? यह सब पूर्णरूपसे बतावें।<br><br>भगवान् शिवने कहा—देवि! १ काशीमें महादेव (विश्वनाथ), २ प्रयागमें महेश्वर, ३ नैमिषारण्यमें देवदेव, ४ गयामें प्रपितामह (ब्रह्मा), ५ कुरुक्षेत्रमें स्थाणु, ६ प्रभासमें शशिशेखर, ७ पुष्करमें अजागन्धि, ८ विश्वेश्वरमें विश्व, ९ अट्टहासमें महानाद, १० महेन्द्रमें महाव्रत,११ उज्जयिनीमें महाकाल, १२ मरुकोटमें महोत्कट, १३ शंकुकर्णमें महातेज, १४ गोकर्णमें महाबल, १५ रुद्रकोटिमें महायोग, १६ स्थलेश्वरमें महालिंग, १७ हर्षितमें हर्ष, १८ वृषभध्वजमें वृषभ, १९ केदारमें ईशान, २० मध्यमकेश्वरमें शर्व, २१ सुपर्णमें सहस्रांशु, २२ कार्तिकेस्वरमें सुसूक्ष्म, २३ वस्त्रापथमें भव, २४ कनखलमें उग्र, २५ भद्रकर्णमें शिव, २६ दण्डकमें दण्डिन्, २७ त्रिदण्डामें ऊर्ध्वरेत, २८ कृमिजांगलमें चण्डीश,
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११२९ ---|---

२९ एकाग्रमें कृत्तिवास, ३० छागलेयमें कपर्दी, ३१ कालिंजरमें नीलकण्ठ, ३२ मण्डलेश्वरमें श्रीकण्ठ, ३३ काश्मीरमें विजय, ३४ मरुकेश्वरमें जयन्त, ३५ हरिश्चन्द्रमें हर, ३६ पुरश्चन्द्रमें शंकर, ३७ वामेश्वरमें जटि, ३८ कुक्कुटेश्वरमें सौम्य, ३९ भस्मगात्रमें भूतेश्वर, ४० अमरकण्टकमें ॐकार, ४१ त्रिसन्ध्यामें त्र्यम्बक, ४२ विरजामें त्रिलोचन, ४३ अर्केश्वरमें दीप्त, ४४ नेपालमें पशुपति, ४५ दुष्कर्णमें यमलिंग, ४६ करवीरमें कपाली, ४७ जलेश्वरमें त्रिशूली, ४८ श्रीशैलमें त्रिपुरान्तक, ४९ अयोध्यामें नागेश्वर, ५० पातालमें हाटकेश्वर, ५१ कारोणमें नकुलीश, ५२ देविकामें उमापति, ५३ भैरवमें भैरवाकार, ५४ पूर्वसागरमें अमर, ५५ सप्तगोदावरीतीर्थमें भीम, ५६ निर्मलेश्वरमें स्वयम्भू, ५७ कर्णिकारमें गणाध्यक्ष, ५८ कैलाशमें गणाधिप, ५९ गंगाद्वारमें हिमस्थान, ६० जललिंगमें जलप्रिय, ६१ वडवाग्निमें अनल, ६२ बदरिकाश्रममें भीम, ६३ श्रेष्ठस्थानमें कोटीश्वर, ६४ विन्ध्याचलमें वाराह, ६५ हेमकूटमें विरूपाक्ष, ६६ गन्धमादनमें भूर्भुव, ६७ लिंगेश्वरमें वरद तथा ६८ लंकामें नरान्तकका कीर्तन करना चाहिये।

देवि! इस प्रकार यहाँ अड़सठ क्षेत्रोंमें प्रसिद्ध नामोंका मैंने तुमसे वर्णन किया है। ये पढ़ने और सुननेवालोंके सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको विशेषतः शिवकी दीक्षा लेनेवाले पवित्रजनोंको तीनों कालोंमें इन सब नामोंका प्रयत्नपूर्वक कीर्तन करना चाहिये। जिस घरमें ये अड़सठ नाम लिखे हुए रखे रहते हैं, वहाँ भूत, प्रेत, रोग, व्याधि, सर्प, चोर तथा राजा आदिकी कभी कोई बाधा उपस्थित नहीं होती है।

देवि! इन सब तीर्थोंमें आठ बहुत उत्तम हैं। जिनमें स्नान करनेवाला मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त करता है। नैमिषारण्य, केदार, पुष्कर, कुरुजांगल, काशी, कुरुक्षेत्र, प्रभास तथा हाटकेश्वर—इन आठ तीर्थोंमें जिसने श्रद्धापूर्वक स्नान किया है, उसने सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया।

पार्वतीजीने पूछा—महादेव! कलिकालमें मनुष्य किसी प्रकार इन सब क्षेत्रोंमें स्नान करनेमें समर्थ न हो सकेंगे। अतः इन आठों तीर्थोंका भी जो सारभूत तीर्थ हो, उसका वर्णन कीजिये।

महादेवजी बोले—देवेश्वरि! इन आठोंमें भी सबसे उत्तम हाटकेश्वरक्षेत्र है, जहाँ मेरी आज्ञासे सब क्षेत्र निवास करते हैं। अन्य जितने तीर्थ हैं, वे भी कलिकाल आनेपर यहीं स्थित होते हैं। अतः मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सब प्रकारसे यत्न करके इसी क्षेत्रका सेवन करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे अड़सठ क्षेत्रोंका उनके नाम और देवताओंसहित वर्णन किया है, जैसा कि महादेवजीने पार्वतीजीसे किया था। जो श्रद्धापूर्वक इन सबके नामोंका पठन और कीर्तन करता है, वह उनमें स्नान करनेका पुण्य प्राप्त कर लेता है।

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भगवान् शिवके दिये हुए मन्त्रद्वारा नागरब्राह्मणोंपर आये हुए सर्पोंके उपद्रवका निवारण

सूतजी कहते हैं—कुछ कालके अनन्तर चमत्कारपुरमें मौद्गल्यवंशमें देवरात नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण हुए। उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम क्रथ रखा गया। क्रथ युवावस्थामें पहुँचनेपर बड़ा उद्दण्ड निकला, उसे अपने पुरुषार्थका सदैव बड़ा गर्व रहता था। एक समय वह वनमें घूमता हुआ श्रावण शुक्ला पंचमीको नागतीर्थमें गया। वहाँ उसने नागराजके अत्यन्त तेजस्वी पुत्र रुद्रमालको देखा, जो अपनी माताके साथ वहाँ आया था। क्रथने सर्पके उस छोटे-से

११३०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बच्चेको साधारण जलसर्प समझा और उसे डंडेसे मार डाला। मारे जाते समय उस सर्पबालकने बड़ा आर्तनाद किया—'हा माता! हा तात! मैं निरपराध मारा गया।' साँपके मुखसे मनुष्योंका-सा यह शब्द सुनकर क्रथ भयसे थर्रा उठा और शीघ्र ही घर भाग गया। तदनन्तर नागमाता जब जलाशयसे बाहर निकली, तब उसने तीरपर अपने पुत्रको मरा हुआ देखा। लाठीके प्रहारसे उसके सारे अंग फटकर लहूलुहान हो रहे थे। पुत्रकी ऐसी दशा देखकर माता मूर्च्छित हो गयी। फिर सचेत होनेपर शोकके कारण उसने बहुत देरतक विलाप किया। तदनन्तर नागिन उस मरे हुए पुत्रको लेकर नागराजके समीप गयी। वे भी अपने पुत्रको मरा हुआ देखकर शोकसे व्याकुल हो गये। उस समय नागराजके दुःखसे दुःखी हो समस्त नाग वहाँ एकत्र हो गये। सबने प्राचीन कथाओं और दृष्टान्तोंद्वारा नागराजको समझा-बुझाकर शान्त किया। तत्पश्चात् उन्होंने पुत्रका दाह-संस्कार किया, किंतु जलदानके समय समस्त नागों और सर्पोंसे कहा—'जबतक मेरे पुत्रका विनाश करनेवाले उस दुष्ट पुरुषको स्त्री, पुत्र एवं भृत्योंसहित नष्ट नहीं कर दिया जायगा, तबतक मैं अपने पुत्रको जलांजलि नहीं दूँगा।'

ऐसा कहकर नागराजने उस पापात्मा द्विजकी खोज करायी, जिसने डंडेसे उनके पुत्रका वध किया था। उसके बाद उन्होंने पार्श्ववर्ती नागोंसे कहा—'मेरे हितैषियो ! तुम हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाओ और मेरे पुत्रका नाश करनेवाले क्रथको स्त्री-पुत्र और कुटुम्बसहित शीघ्र नष्ट करके समस्त चमत्कारपुरको खा जाओ।' नागराजकी यह आज्ञा पाकर सर्पोंने पहले तो सोते समय देवरातके पुत्रको डँसा। फिर उसके समस्त परिवारको काट खाया। तदनन्तर अन्यान्य बाल, वृद्ध और कुमारोंको भी उन्होंने डँस लिया। चमत्कारपुरमें साँपोंके काटनेसे ब्राह्मणोंके घर-घर दारुण हाहाकार मच गया था। कितने ही मनुष्य घर-द्वार छोड़कर दूरस्थ जंगलोंमें भाग गये। इस प्रकार चमत्कारपुरको सर्पोंने मनुष्योंसे सूना कर दिया। तब नागराज शेषने पुत्रके मारे जानेका दुःख छोड़कर अपने पुत्रको जलदान दिया !

सर्पोंका ऐसा उत्पात होनेपर उनसे डरे हुए बहुत-से ब्राह्मण जो सब दिशाओंमें भाग गये थे, परस्पर मिलकर उस वनमें गये, जहाँ त्रिजात नामक ब्राह्मण तपस्या करता था। वह भगवान् शंकरसे वर पाकर भी बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न था। उसने अपनी जन्मभूमिके लोगोंको रोते देख स्वयं भी दुःखका अनुभव किया और उन्हें आश्वासन देते हुए कहा—'ब्राह्मणो ! आज मैं भगवान् शिवसे ऐसी प्रार्थना करूँगा, जिससे उन दुष्टचित्तवाले नागोंका संहार हो जाय।' ऐसा कहकर त्रिजातने परमेश्वर शिवसे प्रार्थना की—'देव ! इस समय मुझे वर दीजिये।' शिवजीने कहा—'शीघ्र माँगो।'

तब त्रिजातने कहा—भगवन् ! नागोंने हमारे समस्त नगरको निर्जन कर दिया है। अतः उन सबका विनाश हो।

भगवान् शिव बोले—ब्रह्मन् ! मैं तुम्हें एक सिद्ध मन्त्र बताऊँगा, जिसके उच्चारणमात्रसे सर्पोंका विष नष्ट हो जाता है। महाभाग ! तुम इन सम्पूर्ण ब्राह्मणोंके साथ वहाँ जाकर उच्च स्वरसे सब ओर इस मन्त्रको सुनाओ। इस मन्त्रको सुनकर जो नीच नाग पाताललोकमें नहीं चले जायँगे, वे विषरहित हो जायँगे। विप्रवर ! गर कहते हैं विषको, जहाँ गर नहीं है, वह नगर है। तुम मेरे प्रसादसे वहाँ 'नगर'-'नगर' का उच्चारण करो। इस शब्दको सुनकर भी जो अधम नाग वहाँ ठहरेंगे, वे सुखपूर्वक मारनेयोग्य हो जायँगे। आजसे वह स्थान इस पृथ्वीपर नगरके नामसे विख्यात होगा और तुम्हारी कीर्तिका विस्तार करेगा। दूसरा कोई भी शुद्ध वंशमें उत्पन्न हुआ जो नागर ब्राह्मण नगरनामक मन्त्रसे तीन बार जलको अभिमन्त्रित करके कालसर्पसे डसे हुए तथा मृत्युके वशमें पड़े हुए

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११३१


मनुष्यके मुखमें स्वयं डाल देगा, वह उसे जीवित कर देगा। अन्यत्र रहनेवाला भी जो कोई मनुष्य सोते समय इस तीन अक्षरवाले मन्त्रका सदा स्मरण करेगा, वह सर्पके विषसे मुक्त होगा। अजीर्ण और ज्वरसम्बन्धी रोग भी इस मन्त्रके प्रभावसे तुरंत नष्ट हो जायेंगे।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् त्रिजात भी मरनेसे बचे हुए ब्राह्मणोंके साथ चमत्कारपुरमें गया। वहाँ सबने 'नगरम्' 'नगरम्' का उच्चारण करते हुए उस क्षेत्रमें प्रवेश किया, जो घोर एवं क्रूर सर्पोंसे व्याप्त हो रहा था। भगवान् शिवसे प्राप्त हुए उस सिद्ध मन्त्रको सुनकर सब सर्प विष और तेजसे रहित होकर भाग चले। कुछ तो बिमौटमें छिप गये और कितने ही पाताललोकमें भाग गये। बचे-खुचे सर्पोंको वहाँके ब्राह्मणोंने डंडोंसे मार डाला। इस प्रकार सब सर्पोंको उजाड़कर पीडारहित हुए ब्राह्मणोंने त्रिजातको आगे रखकर स्थानीय सब आवश्यक कृत्योंको पूर्ण किया। ब्रह्मर्षियो! इस तरह देवाधिदेव भगवान् शिवकी दयासे कालान्तरमें वह नगर पुनः बसा और 'नगर' नामसे प्रसिद्ध हुआ।


## चमत्कारपुरमें पुनर्वास करनेवाले ब्राह्मणोंकी संख्या

**सूतजी कहते हैं—** ब्रह्मर्षियो! इस प्रकार उस स्थानका उद्धार करके त्रिजातने वहाँ देवाधिदेव भगवान् शिवके लिये एक मन्दिर बनवाया और उसमें त्रिजातेश्वर नामसे उनकी प्रतिष्ठा की। तत्पश्चात् वह श्रद्धापूर्वक दिन-रात भगवान् शिवकी आराधनामें संलग्न रहकर कुछ कालके अनन्तर शरीरसहित शिवलोकको चला गया। उपमन्यु, क्रौंच, कैशोर्य तथा त्रैवण—इन चार गोत्रोंके ब्राह्मण उस नगरमें फिर लौटकर नहीं गये। उन्हींके साथ शुक आदि गोत्र भी सर्पभयसे भाग गया था। वह भी वहाँ नहीं आया। शेष गोत्रोंके ब्राह्मण जो वहाँ रह गये थे, उनका परिचय देता हूँ। कौशिक गोत्रके छब्बीस, कश्यप गोत्रके सत्तासी, लक्ष्मण गोत्रके इक्कीस, भरद्वाज गोत्रके तीन, कुण्डन गोत्रके चौदह, रैतिक गोत्रवाले बीस, पराशर गोत्रके आठ, गर्ग गोत्रके बाईस, हारीत गोत्रके तेईस, और्वभार्गव गोत्रके पच्चीस, गौतम गोत्रके छब्बीस, दाल्भ्य गोत्रके बीस, माण्डव्य गोत्रके तेईस, बह्वृच गोत्रवाले भी तेईस, सांकत्य गोत्रके दस, आंगिरस गोत्रके पाँच, अत्रि तथा शुक्लात्रेय कुलके ब्राह्मण दस-दस, वत्स गोत्रके पाँच, कुत्सगोत्रके सोलह, शाण्डिल्यभार्गवके पाँच, मुद्गल गोत्रके बीस तथा बौधायन और कौशल गोत्रके तीस-तीस ब्राह्मण वहाँ आकर बसे थे। अथर्वकुलके पचपन, मौनसके सतहत्तर, यजुर्वेदी तीस, च्यवन गोत्रके सत्ताईस, अगस्त्य गोत्रके तैंतीस, जैमिनि कुलके दस, नैवृत पचपन, पाठीन सत्तर, गोभिल और काक्व पाँच-पाँच, औशनस और दाशार्ह तीन-तीन, लोकाख्य साठ, ऐणिश, बहत्तर, कापिष्ठल, शार्कर और दत्त—ये सतहत्तर, शार्कव सौ, दार्घ्य सतहत्तर, कात्यायन, अधिष्ठ और वैदिश—ये तीन-तीन, कृष्णात्रेय पाँच, दत्तात्रेय पाँच, नारायण, शौनकेय तथा जाबाल—ये सौ-सौ, गोपाल, जामदग्न्य, शालिहोत्र, कर्णिक, भागुरायण, मातृक तथा त्रैणव आदि—ये भी सौ-सौकी संख्यामें ही क्रमशः वहाँ लौट आये। इन्हीं ब्राह्मणोंके अड़तालीस^१ संस्कार होते हैं, जो पूर्वकालमें ब्रह्माजीके द्वारा बताये गये हैं।

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१. अड़तालीस संस्कारोंके नाम इस प्रकार बताये जाते हैं—१ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ विष्णुबलि, ५ जातकर्म, ६ नामकरण, ७ उपनिष्क्रामण, ८ अन्नप्राशन, ९ कर्णवेध, १० चौल, ११ अक्षरारम्भ, १२ उपनयन, १३ व्रत,

१९३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


इस प्रकार चौंसठ गोत्रोंके श्रेष्ठ ब्राह्मण महात्मा त्रिजातद्वारा वहाँ लाये गये। वे सब मिलकर लगभग पंद्रह सौ ब्राह्मण एकत्र हुए थे। सभी वहाँ समान भागके उपभोक्ता हुए। सबकी समान स्थिति मानी गयी। क्रमशः सबका वंश बढ़ने लगा और उनके सहस्रों पुत्र, पौत्र, नप्ता, दौहित्र तथा भागिनेयोंसे पुनः सारा नगर भर गया। जो मनुष्य सदा भक्तिभावसे इस चरित्रका पाठ करता है, इस पृथ्वीपर उसकी सन्तानका कभी नाश नहीं होता।


रैवत और क्षेमंकरीद्वारा रैवतेश्वर तथा कात्यायनीकी स्थापना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! पूर्वकालमें तक्षक नाग सौराष्ट्र देशके राजाके यहाँ पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ। वहाँ उसका नाम रैवत था। उन्हीं दिनों आनर्तदेशमें राजा प्रभंजन राज्य करते थे। उनका बहुत-से राजाओंके साथ वैर बँध गया था। इसलिये शत्रु उनका देश उजाड़ते और पशुओंको बलपूर्वक हर ले जाते थे। अतः उन शत्रुओंके साथ उनका सदैव युद्ध होता रहता था। उसी समय उनकी धर्मपत्नी प्रियंवदाने ऋतुस्नाता होकर गर्भधारण किया। समयानुसार कमलके समान नेत्रोंवाली एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जिसने रातके अन्धकारमें भी अपनी अंगकान्तिसे सूतिकागृहको प्रकाशित कर दिया था। राजा प्रभंजनने पुत्रकी ही भाँति उस कन्याके जन्मका उत्सव मनाया। सब ओर गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि छा रही थी। तेरहवें दिन भूपालने ब्राह्मणोंके आगे कन्याका नामकरण-संस्कार किया। उसका नाम क्षेमंकरी हुआ। वह 'यथा नाम तथा गुण' थी। धीरे-धीरे जब कन्या बड़ी हुई, तब वैवाहिक शुभ लग्नमें राजाने सौराष्ट्रनाथ रैवतके साथ उसका विवाह कर दिया। उन दोनों नवदम्पतिसे रेवती नामवाली एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका विवाह बलरामरूपमें अवतीर्ण हुए नागराज शेषके साथ हुआ था। राजा रैवत और क्षेमंकरीसे प्रौढ़ा अवस्था आ जानेपर भी कोई वंशप्रवर्तक पुत्र नहीं हुआ। इसके कारण उन दोनोंके मनमें बड़ा दुःख था। वे अपना सारा राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर पुत्रके लिये तप करनेके उद्देश्यसे तपोभूमिमें चले गये। वहाँ विन्ध्याचल पर्वतपर अपने लिये आश्रम बनाकर दोनों एकाग्रचित्तसे रहने लगे और कात्यायनी देवीकी स्थापना करके उनकी आराधनामें संलग्न हो गये। कात्यायनी देवी वही हैं, जिन्होंने कौमार-व्रत धारण करके महिषासुरका वध किया था। देवीने उन दोनोंकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर उन्हें एक वंशवर्द्धक पुत्र प्रदान किया, जो क्षेमजितके नामसे प्रसिद्ध हुआ। पुत्र पाकर सौराष्ट्रराज रैवत अपनी राजधानीको लौट आये और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका लालन-पालन किया। क्षेमजित जब युवावस्थाको प्राप्त हुआ, तब राजाने उसे अपने स्थानपर अभिषिक्त किया और स्वयं वे सब कुछ त्यागकर पत्नीके साथ हाटकेश्वरक्षेत्रमें चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान् शंकरका मनोहर मन्दिर बनवाया और एकाग्रचित्त होकर रैवतेश्वर नामवाले शिवलिंगकी स्थापना की, जो दर्शनमात्रसे समस्त देहधारियोंके पापोंको नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें राजा रैवतने जिन दुर्गादेवीका स्थापन किया था, उन्हींका


१४ समावर्तन, १५ विवाह, १६ उपाकर्म, १७ उत्सर्जन, १८ से २४ तक सात प्रकारके पाकयज्ञ—१ हुत, २ प्रहुत, ३ आहुत, ४ शूलगव, ५ बलिहरण, ६ प्रत्यवरोहण, ७ अष्टका होम, २५ से ३१ तक सात हविर्यज्ञसंस्था—१ अन्वाधान, २ अग्निहोत्र, ३ दर्शपौर्णमास, ४ चातुर्मास्य, ५ आग्रयणेष्टि, ६ निरूढ पशुबन्ध, ७ सौत्रामणि, ३२ से ३८ तक सात सोमयज्ञसंस्था—१ अग्निष्टोम, २ अत्यग्निष्टोम, ३ उक्थ्य, ४ षोडशी, ५ वाजपेय, ६ अतिरात्र, ७ आप्तोर्याम, ३९ वानप्रस्थ, ४० संन्यास, ४१ दया, ४२ अनसूया, ४३ शौच, ४४ अनायास, ४५ मंगल्य, ४६ अकार्पण्य, ४७ अस्पृहा, ४८ अन्त्येष्टि।

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *११३३

हाटकेश्वरक्षेत्रमें उनकी धर्मपत्नी क्षेमंकरीने श्रद्धापूर्वक मन्दिर बनवाया और उसमें कात्यायनी देवीकी प्रतिष्ठा की। तबसे महिषासुरमर्दिनी कात्यायनी वहाँ क्षेमंकरीके नामसे पुकारी जाती हैं। जो मनुष्य चैत्र शुक्ला अष्टमीको उनका दर्शन करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है।


दुर्वासाके शापसे चित्रसम दैत्यका महिष होना, महिषकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति तथा स्वर्ग-विजय, कात्यायनीके द्वारा महिषका वध

ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! कात्यायनीदेवीने महिषासुरका अन्त किस प्रकार किया था, यह बताइये।

सूतजी बोले—पूर्वकालमें हिरण्याक्षका पुत्र महिष नामक दैत्य हुआ था, जिसने भैंसेका रूप धारण करके ही समस्त त्रिलोकीका शासन किया था। पहले वह बड़ा ही सुन्दर तथा तेज और वीर्यसे सम्पन्न था। उस समय लोग उसे चित्रसम कहते थे। चित्रसमको बाल्यावस्थासे ही भैंसेकी सवारीका शौक हो गया था। वह घोड़े आदि सवारियोंको छोड़कर भैंसेपर ही चढ़कर चलता था। एक दिनकी बात है दानव चित्रसम भैंसेपर आरूढ़ होकर चला और गंगाजीके तटपर जाकर जल-पक्षियोंका शिकार करने लगा। वहाँ मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा उत्तम पद्मासन लगाकर गंगाके किनारे समाधि लगाये बैठे थे। दैत्यका चित्त जलपक्षियोंकी ओर लगा था। उसने मुनिको नहीं देखा और भैंसेको आगे बढ़ा दिया। मुनि उसके खुरोंके वेगसे कुचल गये, उनका सारा शरीर लहुलुहान हो गया। उन्होंने आँख खोलकर देखा, तो सामने एक दानव प्रणाम आदिसे रहित उद्धण्डभावसे खड़ा था। तब दुर्वासाने कुपित होकर कहा—'पापी! तुमने भैंसेके खुरोंसे मेरे शरीरको कुचल डाला और मेरी समाधि भंग कर दी, इसलिये तुम भी भैंसा हो जाओ और जबतक जिओ, प्रधानतः भैंसा बने रहो।' मुनिके इतना कहते ही वह बड़ा भारी भैंसा हो गया। तब उसने विनीत भावसे मुनिको प्रसन्न करते हुए कहा—'विप्रवर! मैं बालक हूँ, अनजानमें मुझसे आपका अपराध हो गया; उसे क्षमा करके मेरे शापका अन्त कर दीजिये।'

मुनिने कहा—मेरा वचन व्यर्थ नहीं हो सकता। दुर्मते! जबतक तुम्हारे प्राण रहेंगे, तबतक तो तुम इसी रूपमें रहोगे।

ऐसा कहकर दुर्वासा मुनि गंगाका किनारा छोड़कर अन्यत्र चल दिये। तब वह दैत्य भी शुक्राचार्यके पास जाकर बोला—'गुरुदेव! मुझे दुर्वासाने शाप देकर महिष बना दिया है। अब आप ही मुझे शरण दीजिये। मैं आपके प्रसादसे अपने पूर्वशरीरको पा जाऊँ और मेरी यह पशुयोनि नष्ट हो जाय। ऐसा उपाय कीजिये।'

शुक्राचार्यने कहा—एकमात्र भगवान् महेश्वरको छोड़कर दूसरा कोई भी ऐसा नहीं है, जो दुर्वासाके शापको पलट सके। इसलिये तुम शीघ्र ही हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाकर वहाँके परम उत्तम शिवलिंगकी आराधना करो।

शुक्राचार्यके ऐसा कहनेपर वह दानव शीघ्र ही हाटकेश्वरक्षेत्रमें गया। वहाँ उसने भक्तिभावसे महान् शिवलिंगकी स्थापना करके कैलासशिखरके समान ऊँचा मन्दिर बनवाया और कठिन तपस्यामें तत्पर हो महादेवजीकी आराधना करने लगा। इस प्रकार उसका दीर्घकाल व्यतीत हुआ। तब महादेवजीने सन्तुष्ट होकर उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'दानव! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।'

महिष बोला—मुझे दुर्वासाजीने शाप देकर भैंसा बना दिया है, आपके प्रसादसे मेरी यह पशुयोनि निवृत्त हो जाय। यही प्रार्थना है।

११३४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भगवान् शिव बोले—दुर्वासाके वचनको अन्यथा नहीं किया जा सकता, परंतु तुम्हारे सुखका एक उपाय मैं कर दूँगा, वह यह कि जितने भी दैव, मानव तथा आसुर भोग हैं, वे सब तुम्हें इस शरीरमें प्राप्त होंगे। भोगके लिये ही देवता और असुर मानव-शरीरकी इच्छा करते हैं। तुम्हारा यही शरीर उन सब भोगोंको प्राप्त करेगा।

महिष बोला—देवदेवेश्वर! यदि इस प्रकार सब भोगोंकी प्राप्ति मुझे हो सकती है, तब तो मेरा यही शरीर अवध्य हो जाय। एक स्त्रीके सिवा अन्य कोई भी प्राणी मुझे मार न सके। जो कोई भी मनुष्य मेरे इस तीर्थमें स्नान करे, उसे आपका दर्शन प्राप्त हो तथा उसके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जायँ।

भगवान् शिवने कहा—अगहनके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथिको तुम्हारे इस तीर्थमें स्नान करके जो मेरे उत्तम अर्चा-विग्रहका दर्शन करेगा, उसके भूत, प्रेत और पिशाच आदिसे प्राप्त होनेवाले सब प्रकारके दोष नष्ट हो जायँगे और क्षय आदि रोगोंकी भी निवृत्ति हो जायगी।

इतना कहकर देवेश्वर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तब महिष भी अपने स्थानको लौट गया और सब दानवोंको बुलाकर उनकी सभामें अमर्षयुक्त होकर बोला—'दानवो! देवताओंने श्रीविष्णुको आगे रखकर मेरे पिता, पितृव्य तथा अन्य पूर्वजोंका वध किया है। अतः मैं महायुद्धमें उन देवताओंका नाश करूँगा और उनके हाथसे त्रिलोकीका राज्य छीन लूँगा।'

तब उन दानवोंने कहा—आपने ठीक कहा है, हम आज ही चलकर युद्धमें देवताओंको मार भगावेंगे और स्वर्गमें दिव्य भोगोंका उपभोग करते हुए सुखसे रहेंगे।

ऐसा निश्चय करके दैत्योंने सेवक, सेना और सवारियोंके साथ मेरुशिखरपर प्रस्थान किया। इन्द्र आदि देवताओंने देखा, दैत्योंकी सेना शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित होकर सहसा युद्धके लिये आ पहुँची है। तब वे भी उसका सामना करनेके लिये नगरद्वारके बाहर निकल आये। दोनों दलोंमें गर्जन-तर्जनके साथ तीन वर्षोंतक घोर युद्ध हुआ। अन्तमें अपनी पराजय होती देख देवताओंने आपसमें यह विचार किया कि 'इस समय हम अमरावतीपुरी छोड़कर ब्रह्मलोकमें चले चलें, जहाँ दैत्योंका कोई भय नहीं है।' ऐसा निश्चय करके देवतालोग इन्द्रपुरी खाली करके रातमें ही अन्यत्र चले गये। प्रातःकाल उस पुरीको जनशून्य देखकर दैत्योंने हर्षपूर्वक उसके भीतर प्रवेश किया। तदनन्तर उन्होंने इन्द्रके स्थानपर महिषासुरको बिठाया और उसे प्रणाम करके अपनी विजयका बड़ा भारी उत्सव मनाया। महिषासुर तीनों लोकोंका राज्य करने लगा। वह त्रिलोकीमें जो कोई भी अति उत्तम सारभूत वस्तु—हाथी, घोड़े, रथ, अस्त्र-शस्त्र आदि देखता, सब स्वयं ले लेता था। इस प्रकार स्वेच्छाचारपूर्ण बर्ताव करनेवाले उस दैत्यका वध करनेके लिये सब देवता आपसमें मिलकर विचार करने लगे। इसी समय मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने महिषासुरके द्वारा जो त्रिलोकीका उत्पीड़न हो रहा था, उसका तथा उस दैत्यके उग्र अनाचारपूर्ण कठोर बर्तावका देवताओंसे विस्तारपूर्वक वर्णन किया। यह सब सुनकर देवताओंका कोप बहुत बढ़ गया। उसी अवसरपर कार्तिकेयजी भी वहाँ आये और उन्होंने पूछा—'मुने! देवताओंके कोपका क्या कारण है?' इसके उत्तरमें नारदजीने महिषासुरके अत्याचारका भयंकर चित्र उपस्थित किया। इससे कार्तिकेयजीको बड़ा क्रोध हुआ। उस क्रोधकी अवस्थामें प्रत्येक देवताके मुखसे तेज प्रकट हुआ और सब मिलकर वह एक कुमारी कन्याके रूपमें परिणत हो गया। वह दिव्यतेजोमयी सर्वलक्षणसम्पन्ना कन्या देवताओंके क्रोधमें कार्तिकेयका कोप मिलनेसे प्रकट हुई थी, इसलिये उसका नाम 'कात्यायनी' हुआ। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने उस कन्याको वज्र प्रदान किया,

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११३५ ---|---

स्कन्दने अपनी तीखी एवं भयंकर शक्ति दी, भगवान् विष्णुने धनुष, महादेवजीने त्रिशूल, सूर्यने तीखे बाण, चन्द्रमाने उत्तम ढाल, निर्ऋतिने खड्ग, अग्निने उल्मुक, वायुने तीखी छुरी, कुबेरने परिघ तथा प्रेतराज यमने असुरोंके वधके लिये अपना भयंकर दण्ड प्रदान किया। इन सब अस्त्रोंको देखकर कात्यायनी देवीने अपने बारह हाथ बना लिये और उन हाथोंमें देवताओंके वे सभी उत्तम अस्त्र-शस्त्र ग्रहण कर लिये। तत्पश्चात् कात्यायनीने कहा—‘देववरो! तुमने मेरी सृष्टि किसलिये की है, शीघ्र बताओ। मैं तुम्हारे सब कार्य सिद्ध करूँगी।’

देवता बोले—इस संसारमें इस समय बड़ा भयंकर महिष नामक दानव उत्पन्न हुआ है, जो समस्त प्राणियों तथा विशेषतः मनुष्योंके लिये अवध्य है। एकमात्र स्त्रीको छोड़कर दूसरा कोई उसे मार नहीं सकता। इसीलिये हमने तुम्हें उत्पन्न किया है। अब तुम श्रेष्ठ पर्वत विन्ध्याचलपर जाओ और वहाँ उग्र तपस्या करो, जिससे तुम्हारे तेजकी वृद्धि हो। जब हम तुम्हें तेजसे सम्पन्न जान लेंगे, तब तुम्हींको आगे करके उस दुष्टात्माके साथ युद्ध करेंगे। तदनन्तर तुम्हारे बाणसे दग्ध होकर वह मृत्युको प्राप्त होगा।

देवताओंकी यह बात सुनकर परमेश्वरी कात्यायनीने कहा—देवताओ! आपलोग शीघ्र मुझे कोई वाहन प्रदान करें। तब भगवती पार्वतीने कात्यायनीकी सवारीके लिये सिंह दिया। देवी कात्यायनी उसी सिंहपर आरूढ़ हो विन्ध्याचल पर्वतकी ओर प्रस्थित हुईं और उसके मनोहर शिखरपर पहुँचकर व्रत-उपवासमें संलग्न हो महादेवजीका ध्यान करती हुई इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्यामें संलग्न हो गयीं। ज्यों-ज्यों उनके तपकी वृद्धि होती, त्यों-ही-त्यों शरीरमें रूप और कान्ति भी बढ़ती जाती थी। उस समय दैत्येश्वर महिषके सेवक वहाँ आये और अद्भुत रूप धारण करनेवाली उस व्रतपरायणा देवीको देखकर लौट गये। वहाँ उन्होंने दुष्टात्मा महिषासुरसे इस प्रकार कहा—‘देव! हमने पृथ्वीपर भ्रमण करके एक अपूर्व कुमारी कन्या देखी है, जो विन्ध्याचल पर्वतपर तपस्या करती है। उसके बारह हाथ हैं और उन हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे हैं, उसका सौन्दर्य अद्भुत है।’

सेवकोंका यह वचन सुनकर महिषासुर तत्काल कामदेवके वशमें हो गया और बड़ी भारी सेना साथ लेकर वह उस स्थानपर गया, जहाँ वह कन्या बैठी थी। उसे देखते ही वह दानव कामबाणसे आहत हो गया और अपनी सेनाको दूर रखकर अकेला ही देवीके सामने उपस्थित हुआ। निकट पहुँचकर वह इस प्रकार बोला—‘सुन्दरी! यह व्रत और तपस्या तो तुम्हारी युवावस्थाके विपरीत है। अतः यह सब छोड़कर तुम त्रिलोकके राज्यकी महारानी बनो। तुमने मेरा नाम सुना होगा—मैं दानवराज महिष हूँ, जिसने द्वन्द्वयुद्धमें इन्द्रको परास्त किया है। इस समय त्रिभुवनका राज्य मेरे अधीन है। अतः तुम मेरी प्राणवल्लभा पत्नी हो जाओ। मेरी सहस्रों भार्याएँ हैं। वे सब तुम्हारी दासियाँ हो जायँगी!’

उसकी यह बात सुनकर परमेश्वरी कात्यायनीकी आँखें कोपसे लाल हो गयीं। उन्होंने उस दानवसे फटकारकर कहा—पापाचारी! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है। तू मुझ कुमारव्रत धारण करनेवाली कन्यासे इस प्रकार काम-कलुषितचित्त होकर क्यों ऐसी बात कर रहा है? मैं तेरा नाश कर डालूँगी।

महिषासुर बोला—सुन्दरी! तुम गान्धर्वविवाहसे मुझे आत्मदान करो।

उसकी यह बात सुनकर देवीने उसके मुँहमें एक बाण मारा। वह बाण बाँबीमें घुसनेवाले सर्पकी भाँति उसके मुँहमें समा गया। महिषासुर चीख उठा, उसके मुँहसे खूनकी धारा बहने लगी। वह देवीके पाससे लौट गया और अपने सैनिकोंसे बोला—‘इस दुष्टा स्त्रीको जीती-

११३६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जागती पकड़ लाओ, इसे मेरी पत्नी बनना ही होगा।' महिषासुरकी आज्ञा पाकर सब दानव बाणोंकी बौछार करते हुए देवीकी ओर दौड़े। उन्हें निकट आया देख देवीने खिलवाड़में ही महाबाणोंका प्रहार करके उन सबके मर्मस्थानोंको छेद डाला। कितने ही मृत्युको प्राप्त हो गये और बहुत-से दैत्य घायल होकर सब दिशाओंमें भाग गये। अपनी सेनाको तितर-बितर हुई देख महिषासुर क्रोधमें भरा हुआ स्वयं ही देवीकी ओर दौड़ा और उसने भयानक गर्जना की। उसे देखकर कात्यायनीने बड़े जोरसे अट्टहास किया। उस शब्दसे तीनों लोक गूँज उठे। देवीके अट्टहासयुक्त मुखसे सैकड़ों पुलिन्द, शबर, म्लेच्छ, शक और यवन आदि प्रकट हुए। तब देवीने उन्हें आज्ञा दी—'तुम सब लोग इस दुष्टात्मा महिषासुरकी सेनाके इन बलोन्मत्त दैत्योंका शीघ्र वध करो।' उनका यह आदेश सुनकर वे बलवान् और दुर्धर्ष वीर दैत्योंकी सेनाकी ओर दौड़े। फिर तो उनमें बड़ा भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया। उस समय किसीको अपने-परायेका भान न रहा। देवीके उत्पन्न किये हुए योद्धाओंने सब दानवोंका उत्साह भंग कर दिया। कितने ही दैत्य उनके द्वारा मौतके घाट उतार दिये गये तथा कितने ही उनके भीषण प्रहारोंसे जर्जर हो गये। अपनी सेनाका पाँव उखड़ता देख महिषासुर क्रोधसे उन्मत्त हो उठा और देवीसे कठोर वाणीमें बोला—'ओ पापिनि! अबतक तुझे स्त्री समझकर मैंने युद्धमें नहीं मारा, अब तू मेरा प्रभाव देख।'

ऐसा कहकर महिषासुरने सींगोंके प्रहारसे देवीके ऊपर शिलाखण्ड फेंके और उन्हें बार-बार फटकारा। उस दैत्यको अपने पास आया देख देवी क्रोधपूर्वक आगे बढ़ीं और बड़े वेगसे उसकी पीठपर चढ़ गयीं। चढ़कर उन्होंने लातसे इतना मारा कि वह लहूलुहान हो गया और आकाशमें उछलकर जोर-जोरसे चीत्कार करने लगा। इसी बीचमें देवीकी ही ज्योतिसे प्रकट हुए सिंहने आकर तीखी दाढ़ोंके अग्रभागसे क्रोधपूर्वक उस दैत्यके पिछले अंगोंको पकड़ लिया। फिर तो देवीके पैरोंसे दबा हुआ वह दानव स्थिर हो गया, एक पग भी हिल-डुल नहीं सका। उस विवशताकी दशामें वह केवल भयंकर चीत्कार करता रहा।

इसी समय इन्द्र आदि सब देवता वहाँ आ पहुँचे और आकाशमें स्थित होकर बोले—'देवेश्वरि! इस तीखी तलवारसे शीघ्र ही इसका मस्तक काट डालो।' देवताओंका यह वचन सुनकर देवीने महिषासुरकी मोटी ग्रीवापर खड्गका प्रहार किया। उस खड्गके आघातसे दैत्यकी ग्रीवाके दो टूक हो गये। इससे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। उस समय वह महिषरूप त्यागकर ढाल और तलवारको लिये एक तेजस्वी पुरुषके रूपमें प्रकट हो गया और देवीपर खड्गका प्रहार करना ही चाहता था कि देवीने उसकी चोटी पकड़ ली और उसके शरीरका नाश करनेके लिये तलवार उठायी। यह देख वह दुर्गादेवीकी स्तुति करने लगा।

दानव बोला—देवि! आपकी जय हो। अचिन्त्यशक्ते! आपकी जय हो। सब देवताओंकी स्वामिनी! आपकी जय हो। सर्वव्यापिनी देवि! आपकी जय हो। सर्वजनप्रिये! आपकी जय हो। सबका मनोरथ पूर्ण करनेवाली देवि! आपकी जय हो। त्रिभुवनसुन्दरि! आपकी जय हो। भक्तजनोंको आनन्द देनेवाली देवि! आपकी जय हो। दैत्योंका विनाश करनेवाली! आपकी जय हो। देवि! आपको कहींसे भी भय नहीं है। आप तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये उद्यत हैं, अतः मुझपर कृपाप्रसाद कीजिये। प्राणोंकी रक्षा और दयाकी भिक्षा दीजिये। मैं आपके चरणोंकी शरणमें पड़ा हुआ अत्यन्त दीन और विनीत हूँ, मुझपर अनुग्रह कीजिये। देवि! मैं हिरण्याक्षका पुत्र चित्रसम हूँ। महर्षि दुर्वासाने शाप देकर मुझे महिष बना दिया था। आज आपने मेरा उद्धार कर दिया। साथ ही मेरा वीर्यदर्प भी गल गया। सुरेश्वरि! अब मैं आपके चरणोंका किंकर होकर

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११३७

रहूँगा। सब दुष्टोंका विनाश करनेवाली सर्वव्यापिनी देवि! आपकी जय हो।

महिषासुरका यह दीन वचन सुनकर देवीको दया आ गयी। वे आकाशमें खड़े हुए देवताओंसे बोलीं—'देवगण! अब मैं क्या करूँ?' देवता बोले—'देवेश्वरि! यदि इस अधम दानवका वध नहीं करोगी, तब तो यह समस्त चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका विनाश कर डालेगा; फिर तो तुम्हारे प्रादुर्भावके निमित्त किया हुआ हमारा सारा परिश्रम व्यर्थ होगा और तुमने भी जो यह युद्ध करनेका सारा कष्ट सहन किया है, इसका भी कोई अच्छा परिणाम नहीं निकलेगा।'

देवीने कहा—देवताओ! न तो मैं इसे मारूँगी और न छोड़ूँगी। सदा इसकी चोटी पकड़कर इसे अपने हाथमें ही रखूँगी।

देवता बोले—महाभागे! तुम्हारा कथन ठीक है, इस समय ऐसा ही करना उचित होगा। जो मनुष्य इस रूपमें स्थित हुई तुम्हारी पूजा करेगा, उसे तुम्हारा दुर्लभ दर्शन प्राप्त होगा। आजसे 'विन्ध्यवासिनीदेवी' के नामसे तुम्हारी ख्याति होगी। आश्विनमासके शुक्ल पक्षमें अष्टमी-नवमी तिथिको जो मनुष्य तुम्हारी भक्तिपूर्वक पूजा करेगा, उसे एक वर्षतक कोई रोग, भय और तिरस्कार आदिकी प्राप्ति नहीं होगी। उसके लिये अकालमृत्यु तथा चोर आदिका उपद्रव भी नहीं रहेगा।

सूतजी कहते हैं—देवतालोग ऐसा कहकर अपने-अपने स्थानको चले गये। इन्द्रने दीर्घकालके बाद त्रिलोकीका अकण्टक राज्य प्राप्त किया। तदनन्तर सब लोग सुखी हो गये। देवता पुनः तीनों लोकोंमें यज्ञभागके भोक्ता हुए। आनर्तदेशमें सुरथ नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उन्होंने उत्तम भक्तिपूर्वक हाटकेश्वरक्षेत्रमें देवीकी स्थापना की है। चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको जो पुरुष उत्तम भक्तिभावसे यहाँ देवीका दर्शन करता है, वह एक वर्षतक कृतार्थ (पूर्णमनोरथ) होता है।


# केदारक्षेत्रका प्रादुर्भाव तथा वहाँ भगवान् शिवकी आराधनाका माहात्म्य

ऋषियोंने पूछा—सूतजी! हिमालय-प्रदेशवर्ती गंगाद्वारक्षेत्रमें 'केदार' भगवान्‌की स्थिति सुनी जाती है, सो वे वहाँ किस प्रकार प्राप्त हुए?

सूतजीने कहा—महर्षियो! जबतक गरमी और वर्षा रहती है, तबतक तो भगवान् शिव वहीं (हिमालय-प्रदेशके केदारक्षेत्रमें) रहते हैं; किंतु शीतकालमें हाटकेश्वरक्षेत्रमें चले आते हैं। प्राचीन कालमें स्वायम्भुव मन्वन्तरके प्रारम्भसमयकी बात है, हिरण्याक्ष नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी दैत्य था। महाबली होनेके साथ ही वह तप और पराक्रमसे भी सम्पन्न था। हिरण्याक्ष आदि दैत्योंने इन्द्रको स्वर्गसे निकाल दिया और स्वयं ही समस्त त्रिलोकीपर अधिकार जमा लिया। राज्यरहित इन्द्रने देवताओंसहित गंगाद्वारमें आकर तपस्या प्रारम्भ की। एक दिन भगवान् शिव महिषका रूप धारणकर तीव्र तपस्या करते हुए इन्द्रके सम्मुख पृथ्वीतलसे निकले और बोले—'सुरश्रेष्ठ! शीघ्र बोलो, मैं इस रूपमें सम्पूर्ण दैत्योंमेंसे किन-किनको जलमें विदीर्ण कर डालूँ (के दारयामि)?'

इन्द्र बोले—प्रभो! हिरण्याक्ष, सुबाहु, वक्त्र-कन्धर, त्रिश्रृंग तथा लोहिताक्ष—इन पाँचोंका वध कीजिये। इनके मरनेपर निश्चय ही सब दैत्य मरे हुएके ही तुल्य हो जायेंगे; अतः अन्यान्य दीन-हीन दैत्योंका नाश करनेसे क्या लाभ है?

इन्द्रके ऐसा कहनेपर भगवान् शिव तुरंत उस स्थानपर गये, जहाँ दानव हिरण्याक्ष विद्यमान था। उस भयानक भैंसेको देखकर सब दानव सब ओरसे उसपर पत्थरों और डंडोंकी बौछार करने लगे। दैत्यों और उनके प्रहारोंकी तनिक भी
११३८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

परवा न करके भगवान् शिवने चार मन्त्रियोंसहित हिरण्याक्षको खिलवाड़में ही एक गहरा धक्का दिया। तब दैत्य हथियार लेकर ज्यों ही उनके सामने दौड़ा, त्यों ही सींगसे उसको विदीर्ण करके महादेवजीने यमलोक भेज दिया। हिरण्याक्षको मारनेके बाद उन्होंने सुबाहु आदि सचिवोंको भी मृत्युके घाट उतार दिया। निशाना साधकर प्रहार करनेवाले उन दैत्योंद्वारा यत्नपूर्वक चलाया हुआ भी कोई अस्त्र-शस्त्र महादेवजीके शरीरपर नहीं लगता था। इस प्रकार उन पाँचों प्रधान दैत्योंका वध करके भगवान् शिव पुनः उसी स्थानपर लौट आये, जहाँ इन्द्र तपस्या करते थे। वहाँ आकर वे इन्द्रसे बोले—'देवराज ! तुमने जिन पाँच दानवोंके वधके लिये कहा था, उन सबको मैंने मार डाला है; अब तुम पुनः त्रिलोकीका राज्य करो। देवेश ! मुझसे दूसरा कोई भी मनोवांछित वर माँगना चाहो तो माँगो।'

इन्द्र बोले—भगवन् ! आप त्रिलोकीकी रक्षा, धर्मस्थापना तथा कल्याणके लिये इसी रूपसे यहाँ निवास कीजिये।

भगवान् शिवने कहा—शक्र ! यह रूप तो मैंने उस दैत्यका वध करनेके लिये ही धारण किया था। अब तुम्हारे अनुरोधपूर्ण वचनसे मैं त्रिभुवनकी रक्षा, धर्मकी स्थापना तथा लोक-कल्याणके लिये यहीं निवास करूँगा।

ऐसा कहकर भगवान् शिवने वहाँ एक सुन्दर कुण्ड प्रकट किया, जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान स्वच्छ तथा दूधके सदृश सुस्वादु जलसे भरा हुआ था। तत्पश्चात् इन्द्रसे कहा—'जो कोई भी मेरा दर्शन करके पवित्र हो इस कुण्डका दर्शन करेगा तथा दायें-बायें दोनों हाथोंकी अंजलिसे तीन बार इस कुण्डका जल पीयेगा, वह तीन कुलके पितरोंको तार देगा। बायें हाथसे जल पीकर मातृपक्षका, दायें हाथसे जल ग्रहण करनेपर पिता-पितामह आदिका तथा दोनों हाथोंसे जल पीकर अपने-आपका उद्धार करेगा।'

इन्द्र बोले—वृषभवाहन ! मैं प्रतिदिन स्वर्गसे आकर यहाँ आपकी पूजा करूँगा और इस कुण्डका जल भी पीऊँगा। आपने महिषरूपमें यहाँ आकर 'के दारयामि—जलमें किनको विदीर्ण करूँ' ऐसा कहा था, इसलिये आप 'केदार' नामसे प्रसिद्ध होंगे।

भगवान् शिवने कहा—इन्द्र ! यदि ऐसा करोगे तब तुम्हें दैत्योंसे भय नहीं प्राप्त होगा। तुम्हें अपने शरीरमें उत्कृष्ट तेज दिखायी देगा।

तदनन्तर इन्द्रने भगवान्‌के लिये सुन्दर मन्दिरका निर्माण किया, जो देखनेमें बड़ा ही सुन्दर और मनोरम था। तत्पश्चात् उन्हें प्रणाम करके उनकी अनुमति ले वे मेरुगिरिके शिखरपर विराजमान स्वर्गलोकमें चले गये। तबसे प्रतिदिन नियमपूर्वक आकर वे देवेश्वर शिवकी पूजा करते हैं और उस कुण्डका तीन बार जल पीकर स्वर्गलोकको लौट जाते हैं। एक दिनकी बात है। जब इन्द्र पूजाके लिये आये तब देखते हैं, सारा गिरिशिखर बर्फसे ढक गया है। साथ ही भगवान् केदारका अर्चा-विग्रह, उनका मन्दिर तथा वह कुण्ड—सभी हिमाच्छादित हो गये हैं। तब वे दुःखी हो भक्तिपूर्वक उस दिशाको प्रणाम करके इन्द्रलोक चले गये। इस प्रकार चार महीनेतक वे प्रतिदिन आते और शिवजीको न देखकर उस दिशाको प्रणाम करके लौट जाते रहे। फिर जब गरमीका समय आया, तब उन्हें भगवान् शिवके उस विग्रहका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ। फिर तो उन्होंने बड़े समारोहसे चौमासेकी पूजा सम्पन्न की और उनके आगे गीत-वाद्य आदिका आयोजन किया। तब भगवान् शिवने इन्द्रको प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'देवेश ! मैं तुम्हारी अनन्य भक्तिसे सन्तुष्ट हूँ, इसलिये तुम्हारे हृदयमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुसार वर माँगो।'

इन्द्रने कहा—भगवन् ! आपके प्रसादसे मुझे उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त है, अतः अब वैसी कोई कामना नहीं है। सुरेश्वर ! यह पर्वत मीनगत सूर्य

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११३९

(चैत्रमास)-से लेकर आठ मासतक बड़ा मनोरम रहता है। फिर वृश्चिककी संक्रान्तिसे लेकर कुम्भकी संक्रान्तितक यह मेरे लिये भी अगम्य हो जाता है, तब मनुष्य आदि साधारण जीवोंकी तो बात ही क्या है। अतः इन चार महीनोंतक आप इसी रूपमें कहीं अन्यत्र मर्त्यलोक या पातालमें निवास करें, जिससे मेरे द्वारा नित्यपूजनकी प्रतिज्ञामें कोई बाधा न हो।

तब भगवान् शिव बोले—इन्द्र ! आनर्तदेशमें हमारा हाटकेश्वरक्षेत्र विद्यमान है। वहाँ मैं वृश्चिककी संक्रान्तिसे लेकर कुम्भराशिमें सूर्यके रहते समयतक सदा निवास किया करूँगा। अतः वहाँ मेरा मन्दिर बनाकर उसमें मेरे स्वरूपकी प्रतिष्ठा करके मेरी यथोचित पूजा करते रहो। तुम्हारे लिये मैं अपना तेज उस शिवलिंगमें स्थापित कर दूँगा।

सूतजी कहते हैं—देवाधिदेव शिवका यह वचन सुनकर इन्द्रने हाटकेश्वरक्षेत्रमें मन्दिर बनाया और उसमें शिवजीके केदारस्वरूपको स्थापित करके निर्मल जलसे भरे हुए एक कुण्डका भी निर्माण किया। फिर उस कुण्डमें स्नान करके तीन बार जल पीया। इस प्रकार इन्द्रसे आराधित होकर भगवान् केदार इस क्षेत्रमें पधारे हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन सर्दीके चार महीनोंमें उनकी वहाँ आराधना करता है, वह उनके कल्याणमय स्वरूपको प्राप्त होता है। अन्य समयोंमें भी जो भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंको धो डालता है। केदारक्षेत्रमें जल पीकर, गयातीर्थमें पितरोंको पिण्ड देकर तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके मनुष्यका फिर जन्म नहीं होता। ब्रह्मर्षियो ! जो भगवान् केदारका यह माहात्म्य पढ़ता या सुनता है, उसके समस्त पापोंका नाश तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि होती है।


शुक्लतीर्थकी महिमा

सूतजी कहते हैं—ब्रह्मर्षियो ! प्राचीन कालकी बात है। चमत्कारपुरमें कोई शुद्धक नामवाला धोबी रहता था। वह कपड़े धोने तथा रँगनेकी कलामें विशेष निपुण था। नगरके प्रधान-प्रधान जो ब्राह्मण थे, उनके कपड़े वही धोता था। एक समय भूलसे शुद्धकने ब्राह्मणोंके कपड़ोंको नीलके रंगसे भरे हुए पात्रमें डाल दिया। बहुत देरके बाद जब उसे इस बातका पता लगा, तब उसने अपनी स्त्री और पुत्रोंको एकान्तमें बुलाकर कहा—'मैंने महात्मा ब्राह्मणोंके बहुत-से बहुमूल्य वस्त्र अज्ञानवश नीलके रंगमें डाल दिये हैं, इस कारण वे ब्राह्मणलोग मुझे भीषण दण्ड देंगे अथवा मुझे बन्धन (कैद)-में डाल देंगे। इसलिये हम सब लोग अन्यत्र भाग चलें।'

ऐसा निश्चय करके वह घरकी सारभूत वस्तुएँ लेकर पत्नीसहित किसी अज्ञात दिशामें जानेको उद्यत हुआ। इसी समय उसकी पुत्री अपनी एक सहेली दासकन्यासे मिलने गयी और वहाँ जाकर बोली—'भद्रे ! मेरे द्वारा जाने-अनजाने जो तुम्हारा अपराध हुआ हो, तुम्हारे साथ खेलकूद करते समय प्रेमसे, बचपनसे, क्रोध अथवा ईर्ष्यासे मैंने जो कभी कुछ प्रतिकूल बर्ताव किया हो, वह सब क्षमा करना।'

यह सुनकर सहसा उसके नेत्र भर आये और वह आकुल होकर पूछने लगी—'सखी ! आज तुम मुझसे ऐसी बात क्यों कर रही हो ?' धोबीकी कन्याने कहा—'सुनयनी ! मेरे पिताने ब्राह्मणोंके बहुमूल्य वस्त्र नीलकी नादमें डाल दिये हैं, प्रातःकाल इस बातका जब उन ब्राह्मणोंको पता लगेगा, तब वे उन्हें बड़ा कठोर दण्ड देंगे। मनमें यही भय लेकर पिताजी अब यहाँसे अन्यत्र जा रहे हैं, अतः मैं तुमसे अन्तिम बार मिलने चली आयी हूँ। तुमसे आज्ञा लेकर जाऊँगी।'

दास-कन्या बोली—सरोजाक्षी ! यदि ऐसी बात है तो तुम कहीं न जाओ। यहाँसे शीघ्र जाकर अपने पिताको रोक दो। यहाँसे पूर्व-