संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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बच्चेको साधारण जलसर्प समझा और उसे डंडेसे मार डाला। मारे जाते समय उस सर्पबालकने बड़ा आर्तनाद किया—'हा माता! हा तात! मैं निरपराध मारा गया।' साँपके मुखसे मनुष्योंका-सा यह शब्द सुनकर क्रथ भयसे थर्रा उठा और शीघ्र ही घर भाग गया। तदनन्तर नागमाता जब जलाशयसे बाहर निकली, तब उसने तीरपर अपने पुत्रको मरा हुआ देखा। लाठीके प्रहारसे उसके सारे अंग फटकर लहूलुहान हो रहे थे। पुत्रकी ऐसी दशा देखकर माता मूर्च्छित हो गयी। फिर सचेत होनेपर शोकके कारण उसने बहुत देरतक विलाप किया। तदनन्तर नागिन उस मरे हुए पुत्रको लेकर नागराजके समीप गयी। वे भी अपने पुत्रको मरा हुआ देखकर शोकसे व्याकुल हो गये। उस समय नागराजके दुःखसे दुःखी हो समस्त नाग वहाँ एकत्र हो गये। सबने प्राचीन कथाओं और दृष्टान्तोंद्वारा नागराजको समझा-बुझाकर शान्त किया। तत्पश्चात् उन्होंने पुत्रका दाह-संस्कार किया, किंतु जलदानके समय समस्त नागों और सर्पोंसे कहा—'जबतक मेरे पुत्रका विनाश करनेवाले उस दुष्ट पुरुषको स्त्री, पुत्र एवं भृत्योंसहित नष्ट नहीं कर दिया जायगा, तबतक मैं अपने पुत्रको जलांजलि नहीं दूँगा।'
ऐसा कहकर नागराजने उस पापात्मा द्विजकी खोज करायी, जिसने डंडेसे उनके पुत्रका वध किया था। उसके बाद उन्होंने पार्श्ववर्ती नागोंसे कहा—'मेरे हितैषियो ! तुम हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाओ और मेरे पुत्रका नाश करनेवाले क्रथको स्त्री-पुत्र और कुटुम्बसहित शीघ्र नष्ट करके समस्त चमत्कारपुरको खा जाओ।' नागराजकी यह आज्ञा पाकर सर्पोंने पहले तो सोते समय देवरातके पुत्रको डँसा। फिर उसके समस्त परिवारको काट खाया। तदनन्तर अन्यान्य बाल, वृद्ध और कुमारोंको भी उन्होंने डँस लिया। चमत्कारपुरमें साँपोंके काटनेसे ब्राह्मणोंके घर-घर दारुण हाहाकार मच गया था। कितने ही मनुष्य घर-द्वार छोड़कर दूरस्थ जंगलोंमें भाग गये। इस प्रकार चमत्कारपुरको सर्पोंने मनुष्योंसे सूना कर दिया। तब नागराज शेषने पुत्रके मारे जानेका दुःख छोड़कर अपने पुत्रको जलदान दिया !
सर्पोंका ऐसा उत्पात होनेपर उनसे डरे हुए बहुत-से ब्राह्मण जो सब दिशाओंमें भाग गये थे, परस्पर मिलकर उस वनमें गये, जहाँ त्रिजात नामक ब्राह्मण तपस्या करता था। वह भगवान् शंकरसे वर पाकर भी बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न था। उसने अपनी जन्मभूमिके लोगोंको रोते देख स्वयं भी दुःखका अनुभव किया और उन्हें आश्वासन देते हुए कहा—'ब्राह्मणो ! आज मैं भगवान् शिवसे ऐसी प्रार्थना करूँगा, जिससे उन दुष्टचित्तवाले नागोंका संहार हो जाय।' ऐसा कहकर त्रिजातने परमेश्वर शिवसे प्रार्थना की—'देव ! इस समय मुझे वर दीजिये।' शिवजीने कहा—'शीघ्र माँगो।'
तब त्रिजातने कहा—भगवन् ! नागोंने हमारे समस्त नगरको निर्जन कर दिया है। अतः उन सबका विनाश हो।
भगवान् शिव बोले—ब्रह्मन् ! मैं तुम्हें एक सिद्ध मन्त्र बताऊँगा, जिसके उच्चारणमात्रसे सर्पोंका विष नष्ट हो जाता है। महाभाग ! तुम इन सम्पूर्ण ब्राह्मणोंके साथ वहाँ जाकर उच्च स्वरसे सब ओर इस मन्त्रको सुनाओ। इस मन्त्रको सुनकर जो नीच नाग पाताललोकमें नहीं चले जायँगे, वे विषरहित हो जायँगे। विप्रवर ! गर कहते हैं विषको, जहाँ गर नहीं है, वह नगर है। तुम मेरे प्रसादसे वहाँ 'नगर'-'नगर' का उच्चारण करो। इस शब्दको सुनकर भी जो अधम नाग वहाँ ठहरेंगे, वे सुखपूर्वक मारनेयोग्य हो जायँगे। आजसे वह स्थान इस पृथ्वीपर नगरके नामसे विख्यात होगा और तुम्हारी कीर्तिका विस्तार करेगा। दूसरा कोई भी शुद्ध वंशमें उत्पन्न हुआ जो नागर ब्राह्मण नगरनामक मन्त्रसे तीन बार जलको अभिमन्त्रित करके कालसर्पसे डसे हुए तथा मृत्युके वशमें पड़े हुए