भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११२९ ---|---

२९ एकाग्रमें कृत्तिवास, ३० छागलेयमें कपर्दी, ३१ कालिंजरमें नीलकण्ठ, ३२ मण्डलेश्वरमें श्रीकण्ठ, ३३ काश्मीरमें विजय, ३४ मरुकेश्वरमें जयन्त, ३५ हरिश्चन्द्रमें हर, ३६ पुरश्चन्द्रमें शंकर, ३७ वामेश्वरमें जटि, ३८ कुक्कुटेश्वरमें सौम्य, ३९ भस्मगात्रमें भूतेश्वर, ४० अमरकण्टकमें ॐकार, ४१ त्रिसन्ध्यामें त्र्यम्बक, ४२ विरजामें त्रिलोचन, ४३ अर्केश्वरमें दीप्त, ४४ नेपालमें पशुपति, ४५ दुष्कर्णमें यमलिंग, ४६ करवीरमें कपाली, ४७ जलेश्वरमें त्रिशूली, ४८ श्रीशैलमें त्रिपुरान्तक, ४९ अयोध्यामें नागेश्वर, ५० पातालमें हाटकेश्वर, ५१ कारोणमें नकुलीश, ५२ देविकामें उमापति, ५३ भैरवमें भैरवाकार, ५४ पूर्वसागरमें अमर, ५५ सप्तगोदावरीतीर्थमें भीम, ५६ निर्मलेश्वरमें स्वयम्भू, ५७ कर्णिकारमें गणाध्यक्ष, ५८ कैलाशमें गणाधिप, ५९ गंगाद्वारमें हिमस्थान, ६० जललिंगमें जलप्रिय, ६१ वडवाग्निमें अनल, ६२ बदरिकाश्रममें भीम, ६३ श्रेष्ठस्थानमें कोटीश्वर, ६४ विन्ध्याचलमें वाराह, ६५ हेमकूटमें विरूपाक्ष, ६६ गन्धमादनमें भूर्भुव, ६७ लिंगेश्वरमें वरद तथा ६८ लंकामें नरान्तकका कीर्तन करना चाहिये।

देवि! इस प्रकार यहाँ अड़सठ क्षेत्रोंमें प्रसिद्ध नामोंका मैंने तुमसे वर्णन किया है। ये पढ़ने और सुननेवालोंके सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको विशेषतः शिवकी दीक्षा लेनेवाले पवित्रजनोंको तीनों कालोंमें इन सब नामोंका प्रयत्नपूर्वक कीर्तन करना चाहिये। जिस घरमें ये अड़सठ नाम लिखे हुए रखे रहते हैं, वहाँ भूत, प्रेत, रोग, व्याधि, सर्प, चोर तथा राजा आदिकी कभी कोई बाधा उपस्थित नहीं होती है।

देवि! इन सब तीर्थोंमें आठ बहुत उत्तम हैं। जिनमें स्नान करनेवाला मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त करता है। नैमिषारण्य, केदार, पुष्कर, कुरुजांगल, काशी, कुरुक्षेत्र, प्रभास तथा हाटकेश्वर—इन आठ तीर्थोंमें जिसने श्रद्धापूर्वक स्नान किया है, उसने सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया।

पार्वतीजीने पूछा—महादेव! कलिकालमें मनुष्य किसी प्रकार इन सब क्षेत्रोंमें स्नान करनेमें समर्थ न हो सकेंगे। अतः इन आठों तीर्थोंका भी जो सारभूत तीर्थ हो, उसका वर्णन कीजिये।

महादेवजी बोले—देवेश्वरि! इन आठोंमें भी सबसे उत्तम हाटकेश्वरक्षेत्र है, जहाँ मेरी आज्ञासे सब क्षेत्र निवास करते हैं। अन्य जितने तीर्थ हैं, वे भी कलिकाल आनेपर यहीं स्थित होते हैं। अतः मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सब प्रकारसे यत्न करके इसी क्षेत्रका सेवन करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे अड़सठ क्षेत्रोंका उनके नाम और देवताओंसहित वर्णन किया है, जैसा कि महादेवजीने पार्वतीजीसे किया था। जो श्रद्धापूर्वक इन सबके नामोंका पठन और कीर्तन करता है, वह उनमें स्नान करनेका पुण्य प्राप्त कर लेता है।

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भगवान् शिवके दिये हुए मन्त्रद्वारा नागरब्राह्मणोंपर आये हुए सर्पोंके उपद्रवका निवारण

सूतजी कहते हैं—कुछ कालके अनन्तर चमत्कारपुरमें मौद्गल्यवंशमें देवरात नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण हुए। उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम क्रथ रखा गया। क्रथ युवावस्थामें पहुँचनेपर बड़ा उद्दण्ड निकला, उसे अपने पुरुषार्थका सदैव बड़ा गर्व रहता था। एक समय वह वनमें घूमता हुआ श्रावण शुक्ला पंचमीको नागतीर्थमें गया। वहाँ उसने नागराजके अत्यन्त तेजस्वी पुत्र रुद्रमालको देखा, जो अपनी माताके साथ वहाँ आया था। क्रथने सर्पके उस छोटे-से

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