भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1157
११२८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। चित्रशर्माने भी मनोहर मन्दिरका निर्माण करके भक्तिभावसे शास्त्रोक्त विधिके अनुसार उसमें स्वर्णमय लिंग स्थापित किया और उसीकी पूजा प्रारम्भ की। वहाँ उस लिंगकी तीनों लोकोंमें ख्याति फैल गयी। दूर-दूरसे लोग आकर उस उत्तम लिंगकी पूजा करने लगे। यह देखकर दूसरे ब्राह्मणोंने यह विचार किया कि 'हमलोग भी भगवान् सदाशिवको आराधनाद्वारा सन्तुष्ट करें। शूलपाणि शिवके अड़सठ क्षेत्र बताये गये हैं, जहाँ ये परमेश्वर तीनों कालमें निवास करते हैं। हम सब लोग प्रयत्न करें तो उन सभी क्षेत्रोंका समूह यहाँ आ जायगा।' तदनन्तर जितने श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, उन सबने दुष्कर तपस्या प्रारम्भ की। सहस्रों वर्ष आराधना करनेपर भी जब उन्हें कोई फल नहीं प्राप्त हुआ तब वे सभी ब्राह्मण क्षुब्ध हो उठे और बोले—'हम बाल्यावस्थासे ही भगवान् शंकरजीकी आराधना करते हुए वृद्ध हो गये, परंतु हमें अबतक परमेश्वर शिवका दर्शन नहीं हुआ, इसलिये अब हम सब लोगोंको अग्निमें प्रवेश कर जाना चाहिये।' ऐसा निश्चय करके उन सबने अग्नि प्रज्वलित की और एकाग्रचित्त होकर वे पुत्रोंके साथ ज्यों ही उसमें प्रवेश करने लगे त्यों ही भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया और हँसकर कहा—'द्विजवरो! ऐसा दुःसाहस न करो। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो उसे माँगो।'

ब्राह्मण बोले—सुरश्रेष्ठ ! आपके जो अड़सठ क्षेत्र परम धन्य कहे जाते हैं और आदिशिवलिंगोंकी स्थितिके कारण जिन्हें परम पूजनीय माना जाता है, वे सभी क्षेत्र यहाँ प्रतिष्ठित हों।

यह सुनकर भगवान् शंकरने सोचा 'मेरे मनमें भी सदा यह कार्य करनेका विचार होता है कि मैं अपने सभी क्षेत्रोंको किसी एक स्थानपर एकत्र करूँ, क्योंकि कलिकाल बड़ा भयंकर होगा। उस समय पृथ्वीपर प्रायः जितने तीर्थ और क्षेत्र हैं, सब नष्ट हो जायेंगे।' ऐसा विचारकर भगवान् शंकरने उन सभी ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रवरो! तुमलोग मन्दिर बनवाओ और उसमें अपने-अपने गोत्रको आगे रखकर उत्तम शिवलिंग स्थापित करो, जिससे उन शिवलिंगोंमें मैं संक्रमण कर सकूँ।' तब उन सभी ब्राह्मणोंने हर्षमें भरकर मनोहर भूमिभागोंको देखकर वहाँ कैलासशिखरके समान उच्च और दिव्य अड़सठ मन्दिर बनवाये तथा उन मन्दिरोंमें भाँति-भाँतिके उत्तम शिवलिंगोंकी स्थापना की और विभिन्न क्षेत्रोंमें जो-जो नाम प्रसिद्ध हैं उनके वही-वही नाम रखे।

इस प्रकार समस्त क्षेत्र और शिवमन्दिर वहाँ सदैव निवास करते हैं।


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अड़सठ क्षेत्रों और उनमें भी प्रधान आठ क्षेत्रोंके नाम तथा उनके कीर्तनका महत्त्व

पार्वतीजीने भगवान् शंकरसे पूछा—प्रभो! आप किन-किन तीर्थोंमें किन-किन नामोंसे कीर्तन करनेयोग्य हैं? यह सब पूर्णरूपसे बतावें।<br><br>भगवान् शिवने कहा—देवि! १ काशीमें महादेव (विश्वनाथ), २ प्रयागमें महेश्वर, ३ नैमिषारण्यमें देवदेव, ४ गयामें प्रपितामह (ब्रह्मा), ५ कुरुक्षेत्रमें स्थाणु, ६ प्रभासमें शशिशेखर, ७ पुष्करमें अजागन्धि, ८ विश्वेश्वरमें विश्व, ९ अट्टहासमें महानाद, १० महेन्द्रमें महाव्रत,११ उज्जयिनीमें महाकाल, १२ मरुकोटमें महोत्कट, १३ शंकुकर्णमें महातेज, १४ गोकर्णमें महाबल, १५ रुद्रकोटिमें महायोग, १६ स्थलेश्वरमें महालिंग, १७ हर्षितमें हर्ष, १८ वृषभध्वजमें वृषभ, १९ केदारमें ईशान, २० मध्यमकेश्वरमें शर्व, २१ सुपर्णमें सहस्रांशु, २२ कार्तिकेस्वरमें सुसूक्ष्म, २३ वस्त्रापथमें भव, २४ कनखलमें उग्र, २५ भद्रकर्णमें शिव, २६ दण्डकमें दण्डिन्, २७ त्रिदण्डामें ऊर्ध्वरेत, २८ कृमिजांगलमें चण्डीश,