भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1156
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११२७ ---|---

'बहुत अच्छा' कहकर शीघ्र ही धरतीपर उतरे और पुनः लौटकर भगवान्‌को प्रणाम करके बोले—'भगवन्‌! यहाँ नीचे परम कल्याणमय हाटकेश्वरक्षेत्र है। वहाँ संसारकी सृष्टि करनेवाले साक्षात् ब्रह्माजी विराजमान हैं। यही कारण है कि पुष्पक विमान उन्हें लाँघकर आगे नहीं बढ़ता है।' हनुमान्‌जीकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने विमानको उस क्षेत्रमें उतरनेकी आज्ञा दी। तदनन्तर वे स्वयं विमानसे उतरे और समस्त वानरों तथा राक्षसोंके साथ उस क्षेत्रमें सब ओर घूम-घूमकर तीर्थोंका दर्शन करने लगे। वहाँपर उन्होंने अपने पितामह राजा अजके द्वारा स्थापित की हुई चामुण्डादेवीके दर्शन किये और समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले कुण्डमें स्नान करके अपने पिता राजा दशरथद्वारा स्थापित अपने स्वरूपभूत चार भुजाधारी श्रीविष्णु भगवान्‌का दर्शन किया। वहाँ राजवापीमें स्नान करके शुद्ध हो देवताओं और पितरोंका तर्पण कर उन्होंने मन-ही-मन यह विचार किया कि 'इस परम पुण्यदायक क्षेत्रमें मैं भी शिवलिंगकी स्थापना करूँ, जैसे कि पिताजीने श्रीविष्णु भगवान्‌की स्थापना की है। इसके सिवा मेरे प्रिय भाई लक्ष्मण दिव्य लोकमें चले गये हैं, अतः उनके नामसे भी एक शिवलिंगकी स्थापना करूँ। साथ ही अपनी सीतादेवीकी तथा लक्ष्मणकी भी प्रस्तरमयी प्रतिमा इस पवित्र क्षेत्रमें स्थापित करूँ।'

ऐसा विचार करके श्रीरामचन्द्रजीने पाँच मन्दिर बनवाये और उन सबमें पूर्वोक्त विग्रहोंको स्थापित किया। तत्पश्चात् सब वानरों तथा राक्षसोंने भी अपने-अपने नामसे पृथक्-पृथक् शिवलिंगोंको स्थापित किया। उसके बाद श्रेष्ठ पुष्पकविमानपर बैठकर सब-के-सब अयोध्यापुरीको गये।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार उस कल्याणमय तीर्थमें रामेश्वर और लक्ष्मणेश्वर आदिकी स्थापना की, वह सब प्रसंग मैंने आपलोगोंसे कह सुनाया। जो प्रातःकाल उठकर रामेश्वर और लक्ष्मणेश्वरका दर्शन करता है, वह इस तीर्थमें सम्पूर्ण रामायणके श्रवणसे होनेवाले फलको पाता है। जो अष्टमी और चतुर्दशीको रामेश्वरजीके आगे रामचरितका पाठ करता है, वह अश्वमेध यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।


चित्रशर्मा तथा अन्यान्य ब्राह्मणोंके द्वारा भगवान् शंकरको सन्तुष्ट करके हाटकेश्वर आदि सभी क्षेत्रोंके देवताओंकी चमत्कारपुरमें स्थापना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! पूर्वकालमें चमत्कारपुरके भीतर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, जिनका जन्म वत्सकुलमें हुआ था। उनका नाम चित्रशर्मा था। चित्रशर्मा बड़े यशस्वी थे। एक दिन उनके मनमें यह बात पैदा हुई कि 'मैं पातालसे हाटकेश्वरजीको यहाँ लाकर भक्तिपूर्वक दिन-रात उनका पूजन करूँ।' ऐसा निश्चय करके वे नियमपूर्वक रहते और नियमित भोजन करते हुए बड़ी निष्ठाके साथ तपस्या करने लगे। दीर्घकालतक तपस्या करनेके पश्चात् भगवान् शंकर प्रसन्न हुए और आदरपूर्वक बोले—'विप्रवर! तुम्हारा जो मनोरथ हो, उसके अनुसार वर माँगो।'

चित्रशर्मा बोले—देव! आप पातालसे हाटकेश्वरलिंगके रूपमें यहाँ पधारें।

भगवान् शिव बोले—द्विजश्रेष्ठ! मेरा लिंगमय विग्रह सर्वत्र अचल होता है, तुम हाटक (सुवर्ण)-के द्वारा निर्मित दूसरे शिवलिंगकी स्थापना करो। वही संसारमें हाटकेश्वरके नामसे विख्यात होगा। जो शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको सोमवारके दिन श्रद्धापूर्वक भक्तियुक्त चित्तसे उस लिंगकी पूजा करेगा, उसे आदिहाटकेश्वरकी पूजासे होनेवाले कल्याणमय फलकी प्राप्ति होगी। ऐसा कहकर