संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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और पुत्रोंके साथ उनके सामने आये और दूरसे ही जय-जयकार करते हुए उन्होंने धरतीपर लेटकर साष्टांग प्रणाम किया। विमानसे उतरकर श्रीरघुनाथजीने विभीषणको आदरपूर्वक हृदयसे लगाया और उन्हींके साथ लंकापुरीमें प्रवेश किया। फिर विभीषणके महलमें पहुँचकर वानरों-द्वारा सब ओरसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी शुभ सिंहासनपर विराजमान हुए। तत्पश्चात् विभीषणने अपना राज्य, पुत्र, कलत्र आदि समस्त वैभव श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें समर्पित कर दिया और सामने हाथ जोड़ खड़े हो इस प्रकार कहा—'प्रभो! आज्ञा दीजिये, मैं कौन-सी सेवा करूँ। भगवन्! आप अकस्मात् कैसे आ गये? आपके साथ लक्ष्मण और जानकीजी क्यों नहीं आयीं?'
तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे सब समाचार बताया और उनके हितके लिये इस प्रकार कहा—राक्षसराज! इस समय मैं राज्य त्यागकर अपने परम धामको, जहाँ लक्ष्मणजी गये हैं, शीघ्र जाऊँगा। उनके बिना अब इस मर्त्यलोकमें दो घड़ी भी ठहरनेका मेरे मनमें उत्साह नहीं है। इस समय मैं तुम्हें शिक्षा देनेके लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। तुम शान्तचित्त होकर मेरी बात सुनो। यह राज्यलक्ष्मी स्वल्पबुद्धिवाले पुरुषोंके मनमें मदिराकी भाँति मद उत्पन्न कर देती है। अतः तुम्हें अपने हृदयमें इस मदको स्थान नहीं देना चाहिये। इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंका तुम्हें आदर और पूजन करना चाहिये, जिससे तुम्हारा राज्य सदा सुस्थिर रहे और मेरा वचन भी सत्य हो। इसीलिये मैं यहाँ आया हूँ। यदि कोई मनुष्य किसी प्रकार यहाँ आ जाय तो समस्त निशाचरोंको प्रसन्न होकर उसका सत्कार ही करना चाहिये। विभीषण! तुम्हें अपने समस्त निशाचरोंको मना कर देना चाहिये कि वे मेरे सेतुका उल्लंघन करके भारतवर्षकी भूमिमें न जायें।
विभीषणने कहा—प्रभो! ऐसा ही करूँगा, निःसन्देह आपकी आज्ञाका पालन किया जायगा। परंतु जब आप मर्त्यलोकको छोड़कर पधार जाते हैं, तब मैं भी यहाँ जीवित न रहूँगा। अतः मुझे भी वहीं अपने साथ ले चलिये।
श्रीरामने कहा—राक्षसराज! मैंने तुम्हें अविनाशी राज्य दिया है। अतः किसी प्रकार मुझे मिथ्यावादी न करो। मैं यहाँ सेतुमें कीर्तिके लिये तीन शिवलिंगोंकी स्थापना करूँगा। उन तीनोंकी तुम्हें सदैव पूजा करनी चाहिये।
विभीषणसे इस प्रकार कहकर वानरोंसहित श्रीराम दस रात्रिपर्यन्त वहीं लंकामें टिके रहे। ग्यारहवें दिन विमानपर बैठकर उन्होंने अपनी पुरीको प्रस्थान किया और विभीषण एवं वानरोंके साथ मार्गमें उतरकर आपने सेतुके आदि, मध्य और अन्तमें श्रद्धापूर्वक तीन रामेश्वरोंकी स्थापना की। तत्पश्चात् जब वे अपने घरकी ओर चले, उस समय विभीषणने बार-बार प्रणाम करके कहा—'भगवन्! इस सेतुमार्गसे कौतुकवश तथा श्रद्धासे बहुतेरे मनुष्य रामेश्वरजीका दर्शन करनेके लिये आवेंगे, राक्षसोंकी जाति अत्यन्त क्रूर मानी गयी है, मनुष्यको आते देखकर उनके मनमें उसे खा जानेकी इच्छा पैदा हो जाती है। अतः यदि कोई राक्षस किसी मनुष्यको खा लेगा तो निश्चय ही मेरे द्वारा आपकी आज्ञाका उल्लंघन हो जायगा। इसलिये आप कोई ऐसा उपाय सोचें, जिससे मुझे आज्ञाभंगका दोष न लगे।'
विभीषणका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीरामने कहा—'बहुत अच्छा।' तत्पश्चात् उन्होंने अपना धनुष चढ़ाया और अपने तीखे बाणोंसे सेतुके दस योजन विस्तृत मध्यभागको खण्डित कर दिया। इस प्रकार सेतुमार्गसे लंकामें जाना असम्भव करके उन्होंने वानरों और राक्षसोंके साथ अयोध्यापुरीको प्रस्थान किया।
इस प्रकार अपने नगरको प्रस्थान करते समय मार्गमें आकाशके पथसे जाता हुआ पुष्पक विमान सहसा अचल हो गया। यह देख श्रीरामचन्द्रजीने हनुमान्जीसे कहा—'वायुनन्दन! तुम भूमिपर जाकर पता लगाओ कि क्या कारण है, जिससे पुष्पक विमान आकाशमें रुक गया?' हनुमान्जी