भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1154
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११२५

उस समय लक्ष्मणजीका कलेवर अदृश्य हो गया और फूलोंकी वर्षाके साथ आकाशवाणी हुई—'महाभाग राम! आप शोक न करें। ब्रह्मज्ञानसे संयुक्त लक्ष्मणजी सर्वसंन्यास करके परम धामको पधार गये हैं।'

आकाशवाणीकी यह बात सुनकर मन्त्रियोंने कहा—महाराज! ये लक्ष्मण परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। अतः अब अपने घरको लौटिये। राजकार्यकी चिन्ता कीजिये और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे पूछकर अपने स्नेहके अनुरूप उनका पारलौकिक कृत्य (श्राद्ध-पिण्डदान आदि) कीजिये।

श्रीरामचन्द्रजी बोले—मैं लक्ष्मणके बिना अब घरको नहीं लौटूँगा। यदि आपलोगोंकी रुचि हो तो मेरे प्रिय पुत्र कुशको राजसिंहासनपर बिठाइये।

ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने परम धाम पधारनेका विचार किया। उस समय उन्हें अपने मित्र विभीषणका स्मरण हो आया। वे सोचने लगे—'मैंने विभीषणको, जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता रहेगी तबतकके लिये लंकाका अक्षय राज्य दिया है। परंतु इस पृथ्वीपर पुनः वरदानसे पुष्ट हुए अतिशय क्रूर राक्षसोंका संयोग हो सकता है। अतः मैं विभीषणके समीप जाकर उसे शिक्षा दूँगा, जिससे वे देवताओंसे द्वेष न करें। इसी प्रकार महाभाग सुग्रीव नामक वानर भी मेरे परम मित्र हैं। जाम्बवान्, बालिपुत्र अंगद, पवनसुत हनुमान्, कुमुद तथा तार आदि अन्य वानर भी मेरे परम सुहृद् हैं। इन सब लोगोंसे बातचीत करके विदा लेकर मैं परम धामको जाऊँगा।' ऐसा निश्चय करके भगवान् श्रीरामने पुष्पक विमानको बुलाया और उसपर चढ़कर किष्किन्धापुरीको प्रस्थान किया। किष्किन्धानिवासी वानर पुष्पक विमानका प्रकाश देखकर श्रीरामचन्द्रजीका आगमन जान शीघ्र उनके सामने गये और दूरसे ही धरतीपर घुटने टेककर प्रणाम करके इधर-उधर बार-बार जय-जयकार करने लगे। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीको साथ लेकर सबने सुन्दर ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित महापुरी किष्किन्धामें प्रवेश किया। इसके बाद विमानसे उतरकर श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही सुग्रीवके भवनमें गये। वहाँ वानरोंने अर्घ्य आदिसे श्रीरघुनाथजीका पूजन किया और उनसे पूछा—'रघुनन्दन! घरपर कुशल तो है न? सदा आपके साथ रहनेवाले छोटे भैया लक्ष्मणजी कहाँ हैं? प्राणोंके समान प्रिया सीतादेवीजी कहाँ हैं?'

वानरोंका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार सीता और लक्ष्मणजीका परित्याग हुआ था, वह सब समाचार कह सुनाया। यह सुनकर सुग्रीव आदि सब वानर अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर फूट-फूटकर रोने लगे और श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार बोले—'राजन्! हमलोगोंसे आपका जो कार्य यहाँ सिद्ध होनेवाला हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये। इस भूतलपर हम सभी वानर धन्य हैं, जिनके प्रति ऐसा स्नेह रखकर आप स्वयं हमारे घर पधारे हैं।'

श्रीराम बोले—सुग्रीव! तुम्हारे यहाँ एक रात रहकर मैं जहाँ लंकामें विभीषण हैं, वहाँ जाऊँगा। अपने प्रधान मन्त्रीसहित तुम्हें भी मेरे साथ विभीषणके घरतक चलना चाहिये।

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार समस्त श्रेष्ठ वानरोंने भक्तिपूर्वक सेवित हो श्रीरघुनाथजीने किष्किन्धापुरीमें रातभर निवास किया। फिर प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो रघुनाथजी पुष्पक विमानको बुलाकर दस वानरोंके साथ उसपर आरूढ़ हुए। उन दसों वानरोंके नाम इस प्रकार हैं—सुग्रीव, सुषेण, तार, कुमुद, अंगद, कुन्दु, हनुमान्, गवाक्ष, नल तथा जाम्बवान्। तदनन्तर उस उत्तम विमानके द्वारा वे लंकापुरीकी ओर प्रस्थित हुए और जहाँ पहले राक्षसोंसे युद्ध हुआ था, उन प्रदेशोंको दिखाते हुए तत्काल ही महापुरी लंकामें जा पहुँचे। पुष्पकका प्रकाश देखते ही विभीषणजीको यह ज्ञात हो गया कि श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं। अतः वे प्रसन्नतापूर्वक अपने समस्त मन्त्रियों, सेवकों