भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1153

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  • संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

मुझे इन्द्रने भेजा है, अतः आप मुझसे एकान्तमें मिलिये।' तब भगवान् श्रीरामने एकान्तमें जाकर लक्ष्मणजीसे कहा—'लक्ष्मण! मैं जबतक इस देवदूतके साथ बैठकर वार्तालाप करूँ, तबतक कोई यहाँ न आवे। यदि कोई आवेगा तो उसे मृत्यु-दण्ड दिया जायगा। अतः तुम राजद्वारपर उपस्थित रहकर इस बातकी ओर दृष्टि रखो कि कोई आ न जाय और किसीके लिये वधका प्रसंग न उपस्थित हो जाय।'

लक्ष्मणने 'बहुत अच्छा' कहकर आज्ञा स्वीकार की और वे स्वयं राजद्वारपर खड़े होकर पहरा देने लगे। उधर देवदूतने श्रीरामके साथ वार्तालाप प्रारम्भ किया। इन्द्र तथा अन्य स्वर्गवासियोंका सन्देश सुनाते हुए उसने इस प्रकार कहा—'महाभाग! आपने रावणका विनाश करनेके लिये ही भूतलपर अवतार धारण किया था। वह दुष्ट मारा गया, त्रिभुवनका कण्टक दूर हुआ। आपने इस समय देवताओंका सब कार्य पूर्ण कर दिया। अब यदि आपकी रुचि हो तो मर्त्यलोक त्यागकर दिव्यलोकमें पधारिये।'

इसी समय मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वहाँ आये और लक्ष्मणजीसे पूछने लगे—'श्रीरघुनाथजी कहाँ हैं?' लक्ष्मण बोले—'विप्रवर! मुझपर दया करके थोड़ी देर यहीं ठहर जाइये। महाराज किसी देवकार्यसे एकान्तमें बातचीतमें लगे हुए हैं।'

दुर्वासा बोले—यदि अभी मुझे राजा श्रीरामचन्द्रजी दर्शन नहीं देंगे तो मैं समस्त रघुकुलको शाप देकर भस्म कर डालूँगा।

यह सुनकर लक्ष्मणजीने मन-ही-मन दुःखी होकर कुछ विचार किया और स्वयं श्रीरामचन्द्रजीके समीप जाकर हाथ जोड़ साष्टांग प्रणाम करके कहा—'देव! मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा दर्शनके लिये राजद्वारपर खड़े हैं। उनके लिये क्या आज्ञा है?' लक्ष्मणजीका वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने देवदूतसे कहा—'तुम देवराजके पास जाकर यह कह देना कि मैं एक वर्षके अंदर ही आपके समीप आ जाऊँगा।' दूतसे ऐसा कहकर भगवान्ने लक्ष्मणसे कहा—'वत्स! दुर्वासा मुनिको शीघ्र भीतर ले आओ।' तत्पश्चात् मुनिके आते ही श्रीरामने मुनिको अर्घ्य दे प्रणाम किया और हर्षयुक्त वाणीमें कहा—'मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है, मैं धन्य और अनुगृहीत हूँ, जो कि आप मेरे घर पधारे हैं।'

दुर्वासाने कहा—रघुनन्दन! मैं उपवास-पूर्वक चातुर्मास्य व्रत करके आज भोजन करनेके लिये आपके घर आया हूँ, अतः मुझे शीघ्र भोजन दीजिये।

तब श्रीरामचन्द्रजीने मिष्ठान्न आदिसे मुनिको यथेष्ट भोजन कराकर तृप्त किया। इस प्रकार भोजन करके आशीर्वाद दे दुर्वासा मुनि चले गये। तब लक्ष्मणने भगवान् श्रीरामसे कहा—'प्रभो! अब मुझे मृत्युदण्ड मिलना चाहिये।' यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके दुःखी हो गये। तब लक्ष्मणने कहा—'प्रभो! अपने वचनको बिना किसी हिचकके सत्य कर दिखाना, यही राजाओंका परम धर्म है।' लक्ष्मणकी बात सुनकर श्रीरामके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उन्होंने धर्मशास्त्रके जाननेवाले मन्त्रियोंसे बहुत देरतक सलाह ली और अन्तमें लक्ष्मणजीसे कहा—'सुमित्रानन्दन! आज मैंने तुम्हें त्याग दिया। तुम शीघ्र दूसरे देशको चले जाओ। साधुपुरुषोंका त्याग अथवा वध दोनों बराबर है।'

तत्पश्चात् लक्ष्मणजी अपने घरमें माता, पत्नी, पुत्र या सुहृद् किसीके साथ सम्मति न करके सरयूके तटपर चले गये। वहाँ सरयूजलमें स्नान करके तटपर एकान्त स्थानमें बैठ गये और पद्मासन लगाकर उन्होंने अपने आत्माको परमात्मामें लीन करके ब्रह्मरन्ध्रसे अपने तेजोमय प्राणका परित्याग कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीने जब यह समाचार सुना, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे। वे मन्त्रियों और सुहृज्जनोंको साथ लेकर स्वयं उस स्थानपर गये और करुणस्वरमें 'हा वत्स!' कहकर फूट-फूटकर रोने लगे।