भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1152
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११२३ ---|---
पीड़ा न दें। जो आपके सन्तोषके लिये यथाशक्ति लोहा और तिल आदि दान करता है, उसकी एक वर्षतक आप प्रत्येक कष्ट और संकटसे रक्षा करें। सूर्यनन्दन! जब आप कुण्डलीमें पीडाकारक स्थानमें स्थित हों, उस समय जो भक्तिपूर्वक आपके दिवसमें तिल, लोह आदि दान करके विधिवत् शान्तिकर्म और पूजा करे, उसकी साढ़े सात वर्षोंतक आप सदा रक्षा करते रहें, यही मेरे लिये आप वरदान दें।<br>सूतजी कहते हैं—तब शनैश्चरदेवने 'तथास्तु' कहकर राजाकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वे मौन हो गये। तभीसे राजा दशरथकी बात मानकर शनैश्चरदेव कभी रोहिणीमण्डलका भेदन नहीं करते हैं। इस समाचारको सुनकर इन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए और राजा दशरथसे मिलकर आदरपूर्वक बोले—'राजन्! तुमने यह बड़ा अद्भुत पराक्रम किया है, दूसरा कोई तो इस बातकी कल्पना भी अपने मनमें नहीं ला सकता। अतः इस पुरुषार्थसे मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो कोई अभिलाषा हो उसके अनुसार मुझसे वर माँगो।'<br>राजा बोले—सुरश्रेष्ठ! आपके साथ सदा मेरी मैत्री बनी रहे। यही प्रार्थना करता हूँ।<br>इन्द्रने कहा—राजेन्द्र! ऐसा ही होगा। तुम्हारे साथ मेरी सदैव शाश्वत मैत्री बनी रहेगी। ठीक वैसी ही, जैसी वसु देवताकी मैत्री है। तुम सदैव सन्ध्याके समय मेरे पास आते रहना, जिससेसदैव आपसका मैत्रीभाव बढ़ता रहे।<br>ऐसा कहकर देवराज इन्द्र स्वर्गलोकमें चले गये। राजा दशरथ भी शनैश्चरके भयसे सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करके हर्षपूर्वक अयोध्यापुरीके भीतर अपने भवनमें लौट आये। तबसे प्रायः नित्य ही सायंकालकी उपासना करके राजा दशरथ इन्द्रलोकको चले जाते थे। वहाँपर देवर्षियोंके मुखसे विचित्र अर्थवाली कथाएँ सुनकर और स्वयं भी कहकर अपने घर लौट आते थे। एक समय इन्द्रसे प्रेरित होकर महाराज दशरथने महर्षि वसिष्ठके द्वारा पुत्रके लिये पुत्रेष्टि नामक यज्ञ कराया। तदनन्तर बड़ी रानी कौशल्याने परम धर्मात्मा पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको जन्म दिया। राजाकी सबसे छोटी रानी कैकेयीने भरत नामक पुत्र उत्पन्न किया और मझली रानी सुमित्राने दो महाबली पुत्रोंको जन्म दिया। जिनके नाम लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे। इनके सिवा सुमित्रासे एक सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई, जिसे पुत्रहीन राजा लोमपादको दत्तक पुत्रीके रूपमें दे दिया गया। इस प्रकार पितरोंसे उऋण होकर कृतकृत्य हो राजा दशरथने स्वर्गलोककी यात्रा की। उनके बाद श्रीरामचन्द्रजी चक्रवर्ती राजा हुए, जिन्होंने देवताओंके लिये कण्टकरूप दुर्धर्ष रावणका वध किया और हाटकेश्वरक्षेत्रमें रामेश्वर एवं लक्ष्मणेश्वरकी स्थापना करके मूर्तिमती सीतादेवीको भी प्रतिष्ठित किया था।
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श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणका त्याग, लक्ष्मणका परमधाम-गमन, श्रीरामका किष्किन्धा, लंका एवं हाटकेश्वरतीर्थमें जाना और रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर एवं सीता आदिकी प्रतिमा स्थापित करना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! कमलनयन भगवान् श्रीरामचन्द्रजी लोकापवादके कारण सीताजीका परित्याग करके अयोध्याका राज्य करने लगे। उन्होंने दूसरी किसी स्त्रीको पत्नीरूपमें किसी तरह भी स्वीकार नहीं किया। यज्ञकार्यकीसिद्धिके लिये भी पत्नीके स्थानपर सीतादेवीकी स्वर्णमयी प्रतिमाको ही बिठाया। श्रीरामने ग्यारह हजार वर्षोंतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए निष्कण्टक राज्य किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीके भवनमें एक देवदूत आया और बोला—'भगवन् !