भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1151

११२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

राजवापीके प्रसंगमें राजा दशरथका प्रभाव, शनैश्चरग्रहकी पराजय, इन्द्रके साथ राजाकी मैत्री और उनके यहाँ श्रीराम आदिके प्राकट्यकी कथा

सूतजी कहते हैं—राजा अजके पाताललोकमें गमन करनेके पश्चात् उनके पुत्र दशरथ राजा हुए। मन्त्रियोंने उनको आगे रखा और सदा सम्मान दिया। ये वे ही राजा दशरथ थे, जो प्रतिदिन इन्द्रलोकमें जाते और इन्द्रके साथ क्रीडा करते थे। इन्होंने रोहिणीका भेदन करनेवाले शनैश्चरग्रहको परास्त किया था तथा इनके घरमें साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर रावणका विनाश करनेके लिये अवतार लिया था। राजा दशरथने भी हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाकर आराधनाद्वारा भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट किया और सुन्दर मन्दिर निर्माण करके वहीं उनको स्थापित किया। वहाँ राजा दशरथकी वापी प्रसिद्ध है, जिसे उन्होंने स्वयं तैयार कराया था। उसे लोकमें 'राजवापी' कहते हैं। जो लोग पंचमीको तथा विशेषतः पितृपक्षमें वहाँ श्राद्ध करते हैं वे सत्पुरुषोंके प्रिय होते हैं।

किसी समय ज्योतिषके विद्वानोंने राजासे यह कहा कि 'शनैश्चर ग्रह रोहिणीका भेदन करेगा और यदि ऐसा हुआ तो संसारमें बारह वर्षोंतक घोर अनावृष्टि होगी, सर्वत्र अकाल पड़ जायगा। उस समय सम्पूर्ण भूमण्डल मनुष्योंसे शून्य हो जायगा।' उनकी यह बात सुनकर राजा दशरथके मनमें शनैश्चरके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। राजाको इन्द्रने एक कामग विमान दे रखा था। उसीपर बैठकर दशरथने शनैश्चरपर आक्रमण किया और अपने महान् धनुषको खींचकर उसपर तीखे बाणका सन्धान किया तथा नीचे मुख किये स्थित हुए शनैश्चरके सामने खड़े होकर कहा—'शनैश्चर! मेरे कहनेसे तुम रोहिणीका मार्ग त्याग दो, अन्यथा इस मन्त्रप्रेरित दिव्यास्त्रसे मारकर मैं तुम्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।'

उनकी यह भयङ्कर बात सुनकर शनैश्चर देवको बड़ा विस्मय हुआ और वे बोले—महाभाग! तुम कौन हो जो मेरा मार्ग रोकते हो? यह मार्ग तो किसीके द्वारा गम्य नहीं है, देवता और असुर भी यहाँ नहीं आ सकते, फिर तुम कैसे चले आये?

राजाने कहा—मैं सूर्यवंशमें उत्पन्न महाराज अजका पुत्र दशरथ नामक राजा हूँ और क्रोधपूर्वक तुम्हें रोहिणीके मार्गसे हटानेके लिये आया हूँ।

शनैश्चर बोले—राजन्! तुम्हारे साथ तो मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर क्यों तुम अतिशय क्रोधमें आकर मेरा मार्ग रोकना चाहते हो?

राजाने कहा—अभी-अभी ज्योतिषियोंने मुझे बताया है कि तुम (शनैश्चर) रोहिणीचक्रका भेदन करनेवाले हो और यदि तुमने उसका भेदन कर दिया तो इन्द्र वर्षा रोक देंगे। वृष्टि रुक जानेसे पृथ्वीपर अन्न नहीं पैदा होगा और अन्नके अभावसे भूतलके समस्त प्राणी नाशको प्राप्त हो जायँगे। जब सब प्राणियोंका नाश हो जायगा, तब यज्ञ कौन करेगा? फलतः अग्निष्टोम आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ पृथ्वीसे उठ जायँगी और ऐसा होनेपर प्रलय मच जायगा। सूर्यनन्दन! इसीलिये मैंने तुम्हारी राह रोकी है।

शनिदेव बोले—बेटा! अपने घरको लौट जाओ। इच्छा हो तो मुझसे भी तुम कोई वर माँगो; मैं तुम्हारे पराक्रमसे सन्तुष्ट हूँ। मैं अपनी दृष्टिसे जिसे देख लूँ, वह भस्म हो जाता है। इसीलिये अपनी दृष्टि सदा नीची किये रहता हूँ। तुमने प्रजावर्गके हितके लिये मेरे भयको त्याग दिया है, अतः तुम्हारे लिये मैं रोहिणीका भेदन नहीं करूँगा।

राजाने कहा—शनिदेव! आपका दिन प्राप्त होनेपर जो मनुष्य अपनी शरीरमें तेल लगाता है, उसको अपना दूसरा दिन आनेतक आप कभी