भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1150
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११२१

जाता था। सत्ययुगमें लोगोंका जैसा व्यवहार था, वैसा ही त्रेतामें भी हुआ।

एक समय भगवान् शंकर व्याघ्रका शरीर धारण करके बार-बार गर्जना करते हुए जहाँ राजा अज थे, वहीं उपस्थित हो गये। विकराल शरीर धारण करनेवाले उस व्याघ्रको देखकर राजाने भगवतीके दिये हुए सूर्यके समान तेजस्वी अस्त्रका प्रहार किया। क्रमशः देवीसे प्राप्त हुए अन्यान्य अस्त्रोंका भी प्रयोग किया, परंतु उन सभी अस्त्रोंको भगवान् शंकरने धीरे-धीरे अपने मुखमें ग्रहण कर लिया। तब अस्त्रोंके अभावसे राजाने व्याघ्ररूपधारी भगवान् शिवसे द्वन्द्वयुद्ध किया। उनके शरीरका स्पर्श होते ही भगवान् शिवने व्याघ्रशरीर त्याग दिया और भस्मांगराग-विभूषित, चन्द्रार्धमुकुटमण्डित दिव्यरूप धारण कर लिया। उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही थी। उन्होंने खट्वांग तथा सर्पमय आभूषण धारण कर रखे थे। भगवान् शिवको इस रूपमें प्रत्यक्ष देखकर रानीसहित राजा अजने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् उनकी स्तुति करके वे विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़े हो गये और आनन्दाश्रु बहाते हुए हर्षगद्गद वाणीमें बोले—'प्रभो! मैंने अज्ञानवश जो आपका तिरस्कार किया और आपके ऊपर अस्त्र चलाया, वह सब अपराध कृपया क्षमा करें।'

भगवान् शिव बोले—बेटा! तुम्हारा अलौकिक कर्म देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ, अतएव उस तिरस्कारको मैंने अपनी स्वाभाविक क्षमासे ही क्षमा कर दिया है। राजन्! तुमने जैसा राज्य किया, जिस प्रकार प्रजाकी रक्षा की, वैसी राज्यव्यवस्था अबतक न तो किसीने की थी और न कोई आगे करेगा ही। अतः तुम अभी अपनी इन रानीके साथ इसी शरीरसे पाताललोकमें चलो।

राजाने कहा—भगवन्! मैं अयोध्या नामक महापुरीमें अपने पुत्र दशरथको राजसिंहासनपर बिठाकर उसे मन्त्रियोंके अधीन सौंपकर आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। जिन्होंने सन्तुष्ट होकर मुझे अस्त्र-शस्त्र तथा यन्त्रसमुदाय दिये थे, उन महादेवीने यह आज्ञा की थी कि 'जब तुम दुस्त्यज मर्त्यलोकका त्याग करने लगो, तब मेरे कुण्डमें इन सबको डाल देना।' अतः आप उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको मुझे पुनः लौटा दें, जिससे मैं देवीके ऋणसे उऋण हो जाऊँ।

उनके ऐसा कहनेपर भगवान् त्रिपुरारिने राजाको वे दिव्य अस्त्र-शस्त्र लौटा दिये और आज्ञा देते हुए कहा—राजन्! तुम्हारा पुत्र स्वयं ही राजा हो जायगा। वह वीरता, उदारता और शम आदि गुणोंसे सम्पन्न हो तुम्हारे वंशको धारण करनेमें समर्थ होगा। तुम आज ही मेरे साथ इस देवीकुण्डके पवित्र जलमें प्रवेश करके मेरे धामको चलो। आज माघ शुक्ला चतुर्दशीका दिन है। दूसरा कोई भी जो पुरुष इस तिथिको देवीकी भक्तिपूर्वक पूजा करके इस जलमें गोता लगाकर प्राण त्याग करेगा, वह पाताललोकमें, जहाँ हाटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध मेरा दिव्य विग्रह है, वहाँ पहुँच जायगा। नृपश्रेष्ठ! जो इस तीर्थमें केवल स्नानमात्र करेगा, उसके एक सौ आठ रोगोंमेंसे एक भी न होगा।

ऐसा कहकर भगवान् शिवने रानी तथा उन अस्त्र-शस्त्रोंके सहित राजाको साथ लेकर उस देवीकुण्डके जलमें प्रवेश किया और वहाँसे उन्हें अपने धाममें पहुँचा दिया। उसी मानवशरीरसे राजा अज अपनी रानीके साथ आज भी अजर-अमर होकर वहाँ पातालमें रहते हैं और हाटकेश्वर भगवान्‌की श्रद्धापूर्वक आराधना करते हैं।

इस प्रकार हाटकेश्वरक्षेत्रमें माहेश्वरी देवीका प्रादुर्भाव हुआ है, जिसे राजा अजने श्रद्धापूर्ण हृदयसे स्थापित किया था।

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