भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1160

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११३१


मनुष्यके मुखमें स्वयं डाल देगा, वह उसे जीवित कर देगा। अन्यत्र रहनेवाला भी जो कोई मनुष्य सोते समय इस तीन अक्षरवाले मन्त्रका सदा स्मरण करेगा, वह सर्पके विषसे मुक्त होगा। अजीर्ण और ज्वरसम्बन्धी रोग भी इस मन्त्रके प्रभावसे तुरंत नष्ट हो जायेंगे।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् त्रिजात भी मरनेसे बचे हुए ब्राह्मणोंके साथ चमत्कारपुरमें गया। वहाँ सबने 'नगरम्' 'नगरम्' का उच्चारण करते हुए उस क्षेत्रमें प्रवेश किया, जो घोर एवं क्रूर सर्पोंसे व्याप्त हो रहा था। भगवान् शिवसे प्राप्त हुए उस सिद्ध मन्त्रको सुनकर सब सर्प विष और तेजसे रहित होकर भाग चले। कुछ तो बिमौटमें छिप गये और कितने ही पाताललोकमें भाग गये। बचे-खुचे सर्पोंको वहाँके ब्राह्मणोंने डंडोंसे मार डाला। इस प्रकार सब सर्पोंको उजाड़कर पीडारहित हुए ब्राह्मणोंने त्रिजातको आगे रखकर स्थानीय सब आवश्यक कृत्योंको पूर्ण किया। ब्रह्मर्षियो! इस तरह देवाधिदेव भगवान् शिवकी दयासे कालान्तरमें वह नगर पुनः बसा और 'नगर' नामसे प्रसिद्ध हुआ।


## चमत्कारपुरमें पुनर्वास करनेवाले ब्राह्मणोंकी संख्या

**सूतजी कहते हैं—** ब्रह्मर्षियो! इस प्रकार उस स्थानका उद्धार करके त्रिजातने वहाँ देवाधिदेव भगवान् शिवके लिये एक मन्दिर बनवाया और उसमें त्रिजातेश्वर नामसे उनकी प्रतिष्ठा की। तत्पश्चात् वह श्रद्धापूर्वक दिन-रात भगवान् शिवकी आराधनामें संलग्न रहकर कुछ कालके अनन्तर शरीरसहित शिवलोकको चला गया। उपमन्यु, क्रौंच, कैशोर्य तथा त्रैवण—इन चार गोत्रोंके ब्राह्मण उस नगरमें फिर लौटकर नहीं गये। उन्हींके साथ शुक आदि गोत्र भी सर्पभयसे भाग गया था। वह भी वहाँ नहीं आया। शेष गोत्रोंके ब्राह्मण जो वहाँ रह गये थे, उनका परिचय देता हूँ। कौशिक गोत्रके छब्बीस, कश्यप गोत्रके सत्तासी, लक्ष्मण गोत्रके इक्कीस, भरद्वाज गोत्रके तीन, कुण्डन गोत्रके चौदह, रैतिक गोत्रवाले बीस, पराशर गोत्रके आठ, गर्ग गोत्रके बाईस, हारीत गोत्रके तेईस, और्वभार्गव गोत्रके पच्चीस, गौतम गोत्रके छब्बीस, दाल्भ्य गोत्रके बीस, माण्डव्य गोत्रके तेईस, बह्वृच गोत्रवाले भी तेईस, सांकत्य गोत्रके दस, आंगिरस गोत्रके पाँच, अत्रि तथा शुक्लात्रेय कुलके ब्राह्मण दस-दस, वत्स गोत्रके पाँच, कुत्सगोत्रके सोलह, शाण्डिल्यभार्गवके पाँच, मुद्गल गोत्रके बीस तथा बौधायन और कौशल गोत्रके तीस-तीस ब्राह्मण वहाँ आकर बसे थे। अथर्वकुलके पचपन, मौनसके सतहत्तर, यजुर्वेदी तीस, च्यवन गोत्रके सत्ताईस, अगस्त्य गोत्रके तैंतीस, जैमिनि कुलके दस, नैवृत पचपन, पाठीन सत्तर, गोभिल और काक्व पाँच-पाँच, औशनस और दाशार्ह तीन-तीन, लोकाख्य साठ, ऐणिश, बहत्तर, कापिष्ठल, शार्कर और दत्त—ये सतहत्तर, शार्कव सौ, दार्घ्य सतहत्तर, कात्यायन, अधिष्ठ और वैदिश—ये तीन-तीन, कृष्णात्रेय पाँच, दत्तात्रेय पाँच, नारायण, शौनकेय तथा जाबाल—ये सौ-सौ, गोपाल, जामदग्न्य, शालिहोत्र, कर्णिक, भागुरायण, मातृक तथा त्रैणव आदि—ये भी सौ-सौकी संख्यामें ही क्रमशः वहाँ लौट आये। इन्हीं ब्राह्मणोंके अड़तालीस^१ संस्कार होते हैं, जो पूर्वकालमें ब्रह्माजीके द्वारा बताये गये हैं।

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१. अड़तालीस संस्कारोंके नाम इस प्रकार बताये जाते हैं—१ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ विष्णुबलि, ५ जातकर्म, ६ नामकरण, ७ उपनिष्क्रामण, ८ अन्नप्राशन, ९ कर्णवेध, १० चौल, ११ अक्षरारम्भ, १२ उपनयन, १३ व्रत,