संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भगवान् शिव बोले—दुर्वासाके वचनको अन्यथा नहीं किया जा सकता, परंतु तुम्हारे सुखका एक उपाय मैं कर दूँगा, वह यह कि जितने भी दैव, मानव तथा आसुर भोग हैं, वे सब तुम्हें इस शरीरमें प्राप्त होंगे। भोगके लिये ही देवता और असुर मानव-शरीरकी इच्छा करते हैं। तुम्हारा यही शरीर उन सब भोगोंको प्राप्त करेगा।
महिष बोला—देवदेवेश्वर! यदि इस प्रकार सब भोगोंकी प्राप्ति मुझे हो सकती है, तब तो मेरा यही शरीर अवध्य हो जाय। एक स्त्रीके सिवा अन्य कोई भी प्राणी मुझे मार न सके। जो कोई भी मनुष्य मेरे इस तीर्थमें स्नान करे, उसे आपका दर्शन प्राप्त हो तथा उसके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जायँ।
भगवान् शिवने कहा—अगहनके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथिको तुम्हारे इस तीर्थमें स्नान करके जो मेरे उत्तम अर्चा-विग्रहका दर्शन करेगा, उसके भूत, प्रेत और पिशाच आदिसे प्राप्त होनेवाले सब प्रकारके दोष नष्ट हो जायँगे और क्षय आदि रोगोंकी भी निवृत्ति हो जायगी।
इतना कहकर देवेश्वर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तब महिष भी अपने स्थानको लौट गया और सब दानवोंको बुलाकर उनकी सभामें अमर्षयुक्त होकर बोला—'दानवो! देवताओंने श्रीविष्णुको आगे रखकर मेरे पिता, पितृव्य तथा अन्य पूर्वजोंका वध किया है। अतः मैं महायुद्धमें उन देवताओंका नाश करूँगा और उनके हाथसे त्रिलोकीका राज्य छीन लूँगा।'
तब उन दानवोंने कहा—आपने ठीक कहा है, हम आज ही चलकर युद्धमें देवताओंको मार भगावेंगे और स्वर्गमें दिव्य भोगोंका उपभोग करते हुए सुखसे रहेंगे।
ऐसा निश्चय करके दैत्योंने सेवक, सेना और सवारियोंके साथ मेरुशिखरपर प्रस्थान किया। इन्द्र आदि देवताओंने देखा, दैत्योंकी सेना शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्जित होकर सहसा युद्धके लिये आ पहुँची है। तब वे भी उसका सामना करनेके लिये नगरद्वारके बाहर निकल आये। दोनों दलोंमें गर्जन-तर्जनके साथ तीन वर्षोंतक घोर युद्ध हुआ। अन्तमें अपनी पराजय होती देख देवताओंने आपसमें यह विचार किया कि 'इस समय हम अमरावतीपुरी छोड़कर ब्रह्मलोकमें चले चलें, जहाँ दैत्योंका कोई भय नहीं है।' ऐसा निश्चय करके देवतालोग इन्द्रपुरी खाली करके रातमें ही अन्यत्र चले गये। प्रातःकाल उस पुरीको जनशून्य देखकर दैत्योंने हर्षपूर्वक उसके भीतर प्रवेश किया। तदनन्तर उन्होंने इन्द्रके स्थानपर महिषासुरको बिठाया और उसे प्रणाम करके अपनी विजयका बड़ा भारी उत्सव मनाया। महिषासुर तीनों लोकोंका राज्य करने लगा। वह त्रिलोकीमें जो कोई भी अति उत्तम सारभूत वस्तु—हाथी, घोड़े, रथ, अस्त्र-शस्त्र आदि देखता, सब स्वयं ले लेता था। इस प्रकार स्वेच्छाचारपूर्ण बर्ताव करनेवाले उस दैत्यका वध करनेके लिये सब देवता आपसमें मिलकर विचार करने लगे। इसी समय मुनिश्रेष्ठ नारदजी भी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने महिषासुरके द्वारा जो त्रिलोकीका उत्पीड़न हो रहा था, उसका तथा उस दैत्यके उग्र अनाचारपूर्ण कठोर बर्तावका देवताओंसे विस्तारपूर्वक वर्णन किया। यह सब सुनकर देवताओंका कोप बहुत बढ़ गया। उसी अवसरपर कार्तिकेयजी भी वहाँ आये और उन्होंने पूछा—'मुने! देवताओंके कोपका क्या कारण है?' इसके उत्तरमें नारदजीने महिषासुरके अत्याचारका भयंकर चित्र उपस्थित किया। इससे कार्तिकेयजीको बड़ा क्रोध हुआ। उस क्रोधकी अवस्थामें प्रत्येक देवताके मुखसे तेज प्रकट हुआ और सब मिलकर वह एक कुमारी कन्याके रूपमें परिणत हो गया। वह दिव्यतेजोमयी सर्वलक्षणसम्पन्ना कन्या देवताओंके क्रोधमें कार्तिकेयका कोप मिलनेसे प्रकट हुई थी, इसलिये उसका नाम 'कात्यायनी' हुआ। तत्पश्चात् देवराज इन्द्रने उस कन्याको वज्र प्रदान किया,