भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1164, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1164
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११३५ ---|---

स्कन्दने अपनी तीखी एवं भयंकर शक्ति दी, भगवान् विष्णुने धनुष, महादेवजीने त्रिशूल, सूर्यने तीखे बाण, चन्द्रमाने उत्तम ढाल, निर्ऋतिने खड्ग, अग्निने उल्मुक, वायुने तीखी छुरी, कुबेरने परिघ तथा प्रेतराज यमने असुरोंके वधके लिये अपना भयंकर दण्ड प्रदान किया। इन सब अस्त्रोंको देखकर कात्यायनी देवीने अपने बारह हाथ बना लिये और उन हाथोंमें देवताओंके वे सभी उत्तम अस्त्र-शस्त्र ग्रहण कर लिये। तत्पश्चात् कात्यायनीने कहा—‘देववरो! तुमने मेरी सृष्टि किसलिये की है, शीघ्र बताओ। मैं तुम्हारे सब कार्य सिद्ध करूँगी।’

देवता बोले—इस संसारमें इस समय बड़ा भयंकर महिष नामक दानव उत्पन्न हुआ है, जो समस्त प्राणियों तथा विशेषतः मनुष्योंके लिये अवध्य है। एकमात्र स्त्रीको छोड़कर दूसरा कोई उसे मार नहीं सकता। इसीलिये हमने तुम्हें उत्पन्न किया है। अब तुम श्रेष्ठ पर्वत विन्ध्याचलपर जाओ और वहाँ उग्र तपस्या करो, जिससे तुम्हारे तेजकी वृद्धि हो। जब हम तुम्हें तेजसे सम्पन्न जान लेंगे, तब तुम्हींको आगे करके उस दुष्टात्माके साथ युद्ध करेंगे। तदनन्तर तुम्हारे बाणसे दग्ध होकर वह मृत्युको प्राप्त होगा।

देवताओंकी यह बात सुनकर परमेश्वरी कात्यायनीने कहा—देवताओ! आपलोग शीघ्र मुझे कोई वाहन प्रदान करें। तब भगवती पार्वतीने कात्यायनीकी सवारीके लिये सिंह दिया। देवी कात्यायनी उसी सिंहपर आरूढ़ हो विन्ध्याचल पर्वतकी ओर प्रस्थित हुईं और उसके मनोहर शिखरपर पहुँचकर व्रत-उपवासमें संलग्न हो महादेवजीका ध्यान करती हुई इन्द्रियसंयमपूर्वक तपस्यामें संलग्न हो गयीं। ज्यों-ज्यों उनके तपकी वृद्धि होती, त्यों-ही-त्यों शरीरमें रूप और कान्ति भी बढ़ती जाती थी। उस समय दैत्येश्वर महिषके सेवक वहाँ आये और अद्भुत रूप धारण करनेवाली उस व्रतपरायणा देवीको देखकर लौट गये। वहाँ उन्होंने दुष्टात्मा महिषासुरसे इस प्रकार कहा—‘देव! हमने पृथ्वीपर भ्रमण करके एक अपूर्व कुमारी कन्या देखी है, जो विन्ध्याचल पर्वतपर तपस्या करती है। उसके बारह हाथ हैं और उन हाथोंमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र शोभा पा रहे हैं, उसका सौन्दर्य अद्भुत है।’

सेवकोंका यह वचन सुनकर महिषासुर तत्काल कामदेवके वशमें हो गया और बड़ी भारी सेना साथ लेकर वह उस स्थानपर गया, जहाँ वह कन्या बैठी थी। उसे देखते ही वह दानव कामबाणसे आहत हो गया और अपनी सेनाको दूर रखकर अकेला ही देवीके सामने उपस्थित हुआ। निकट पहुँचकर वह इस प्रकार बोला—‘सुन्दरी! यह व्रत और तपस्या तो तुम्हारी युवावस्थाके विपरीत है। अतः यह सब छोड़कर तुम त्रिलोकके राज्यकी महारानी बनो। तुमने मेरा नाम सुना होगा—मैं दानवराज महिष हूँ, जिसने द्वन्द्वयुद्धमें इन्द्रको परास्त किया है। इस समय त्रिभुवनका राज्य मेरे अधीन है। अतः तुम मेरी प्राणवल्लभा पत्नी हो जाओ। मेरी सहस्रों भार्याएँ हैं। वे सब तुम्हारी दासियाँ हो जायँगी!’

उसकी यह बात सुनकर परमेश्वरी कात्यायनीकी आँखें कोपसे लाल हो गयीं। उन्होंने उस दानवसे फटकारकर कहा—पापाचारी! तुझे धिक्कार है, धिक्कार है। तू मुझ कुमारव्रत धारण करनेवाली कन्यासे इस प्रकार काम-कलुषितचित्त होकर क्यों ऐसी बात कर रहा है? मैं तेरा नाश कर डालूँगी।

महिषासुर बोला—सुन्दरी! तुम गान्धर्वविवाहसे मुझे आत्मदान करो।

उसकी यह बात सुनकर देवीने उसके मुँहमें एक बाण मारा। वह बाण बाँबीमें घुसनेवाले सर्पकी भाँति उसके मुँहमें समा गया। महिषासुर चीख उठा, उसके मुँहसे खूनकी धारा बहने लगी। वह देवीके पाससे लौट गया और अपने सैनिकोंसे बोला—‘इस दुष्टा स्त्रीको जीती-