भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1168, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1168
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११३९

(चैत्रमास)-से लेकर आठ मासतक बड़ा मनोरम रहता है। फिर वृश्चिककी संक्रान्तिसे लेकर कुम्भकी संक्रान्तितक यह मेरे लिये भी अगम्य हो जाता है, तब मनुष्य आदि साधारण जीवोंकी तो बात ही क्या है। अतः इन चार महीनोंतक आप इसी रूपमें कहीं अन्यत्र मर्त्यलोक या पातालमें निवास करें, जिससे मेरे द्वारा नित्यपूजनकी प्रतिज्ञामें कोई बाधा न हो।

तब भगवान् शिव बोले—इन्द्र ! आनर्तदेशमें हमारा हाटकेश्वरक्षेत्र विद्यमान है। वहाँ मैं वृश्चिककी संक्रान्तिसे लेकर कुम्भराशिमें सूर्यके रहते समयतक सदा निवास किया करूँगा। अतः वहाँ मेरा मन्दिर बनाकर उसमें मेरे स्वरूपकी प्रतिष्ठा करके मेरी यथोचित पूजा करते रहो। तुम्हारे लिये मैं अपना तेज उस शिवलिंगमें स्थापित कर दूँगा।

सूतजी कहते हैं—देवाधिदेव शिवका यह वचन सुनकर इन्द्रने हाटकेश्वरक्षेत्रमें मन्दिर बनाया और उसमें शिवजीके केदारस्वरूपको स्थापित करके निर्मल जलसे भरे हुए एक कुण्डका भी निर्माण किया। फिर उस कुण्डमें स्नान करके तीन बार जल पीया। इस प्रकार इन्द्रसे आराधित होकर भगवान् केदार इस क्षेत्रमें पधारे हैं। जो मनुष्य प्रतिदिन सर्दीके चार महीनोंमें उनकी वहाँ आराधना करता है, वह उनके कल्याणमय स्वरूपको प्राप्त होता है। अन्य समयोंमें भी जो भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह जन्मसे लेकर मृत्युतकके समस्त पापोंको धो डालता है। केदारक्षेत्रमें जल पीकर, गयातीर्थमें पितरोंको पिण्ड देकर तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके मनुष्यका फिर जन्म नहीं होता। ब्रह्मर्षियो ! जो भगवान् केदारका यह माहात्म्य पढ़ता या सुनता है, उसके समस्त पापोंका नाश तथा पुत्र-पौत्रकी वृद्धि होती है।


शुक्लतीर्थकी महिमा

सूतजी कहते हैं—ब्रह्मर्षियो ! प्राचीन कालकी बात है। चमत्कारपुरमें कोई शुद्धक नामवाला धोबी रहता था। वह कपड़े धोने तथा रँगनेकी कलामें विशेष निपुण था। नगरके प्रधान-प्रधान जो ब्राह्मण थे, उनके कपड़े वही धोता था। एक समय भूलसे शुद्धकने ब्राह्मणोंके कपड़ोंको नीलके रंगसे भरे हुए पात्रमें डाल दिया। बहुत देरके बाद जब उसे इस बातका पता लगा, तब उसने अपनी स्त्री और पुत्रोंको एकान्तमें बुलाकर कहा—'मैंने महात्मा ब्राह्मणोंके बहुत-से बहुमूल्य वस्त्र अज्ञानवश नीलके रंगमें डाल दिये हैं, इस कारण वे ब्राह्मणलोग मुझे भीषण दण्ड देंगे अथवा मुझे बन्धन (कैद)-में डाल देंगे। इसलिये हम सब लोग अन्यत्र भाग चलें।'

ऐसा निश्चय करके वह घरकी सारभूत वस्तुएँ लेकर पत्नीसहित किसी अज्ञात दिशामें जानेको उद्यत हुआ। इसी समय उसकी पुत्री अपनी एक सहेली दासकन्यासे मिलने गयी और वहाँ जाकर बोली—'भद्रे ! मेरे द्वारा जाने-अनजाने जो तुम्हारा अपराध हुआ हो, तुम्हारे साथ खेलकूद करते समय प्रेमसे, बचपनसे, क्रोध अथवा ईर्ष्यासे मैंने जो कभी कुछ प्रतिकूल बर्ताव किया हो, वह सब क्षमा करना।'

यह सुनकर सहसा उसके नेत्र भर आये और वह आकुल होकर पूछने लगी—'सखी ! आज तुम मुझसे ऐसी बात क्यों कर रही हो ?' धोबीकी कन्याने कहा—'सुनयनी ! मेरे पिताने ब्राह्मणोंके बहुमूल्य वस्त्र नीलकी नादमें डाल दिये हैं, प्रातःकाल इस बातका जब उन ब्राह्मणोंको पता लगेगा, तब वे उन्हें बड़ा कठोर दण्ड देंगे। मनमें यही भय लेकर पिताजी अब यहाँसे अन्यत्र जा रहे हैं, अतः मैं तुमसे अन्तिम बार मिलने चली आयी हूँ। तुमसे आज्ञा लेकर जाऊँगी।'

दास-कन्या बोली—सरोजाक्षी ! यदि ऐसी बात है तो तुम कहीं न जाओ। यहाँसे शीघ्र जाकर अपने पिताको रोक दो। यहाँसे पूर्व-