संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उत्तरके कोनेमें एक जलाशय है, उसमें किसी समय मेरे पिताने जाल डाला था। वह जाल काले केशोंका बना हुआ था, जलाशयमें डालते ही सफेद हो गया। तब कौतूहलवश मेरे पिता भी जलमें खड़े हुए। उनका शरीर काले रंगका था, जो उसी समय सफेद हो गया। केवल शरीर ही नहीं, उनके काले बाल भी सफेद हो गये। तबसे वहाँ कोई नहीं जाता है, अतः उसीमें तुम अपने कपड़े धुलवाओ। इससे सब काले कपड़े सफेद हो जायँगे। उन वस्त्रोंकी अच्छी तरह शुद्धि हो जायगी।
तदनन्तर वह रजक-कन्या शीघ्र अपने पिताके समीप गयी और इस प्रकार बोली—'पिताजी! मेरी सखीने बताया है, इधर समीप ही कोई जलाशय है, उसमें डाली हुई प्रत्येक काली वस्तु सफेद हो जाती है। अतः प्रातःकाल जलाशयमें जाकर अपने कपड़े धोइये, वे सब निश्चय ही सफेद हो जायँगे।'
धोबीने कहा—बेटी! प्राचीन पुरुषोंने कहा है कि वज्रके लेप, मूर्ख, स्त्री, केंकड़ा, मछली, नीलके रंग तथा मदिरा पीनेवाले मनुष्यका एक ही ग्रह (पकड़ या आग्रह) होता है। अतः नीलका रंग मिट नहीं सकता।
कन्या बोली—एक बार सब वस्त्रोंको लेकर चलिये तो सही, जब ये शुद्ध होंगे—कालेसे सफेद हो जायँगे, तभी हम घरको लौटेंगे, अन्यथा दूसरी दिशाको चल देंगे।
कन्याका यह वचन सुनकर उसके भाई-बन्धुओं तथा सेवकोंने एक स्वरसे कहा—'ठीक है, ठीक है।' फिर सब लोग रातमें ही जलाशयके पास गये। दास-कन्या सबके आगे होकर राह दिखाती जा रही थी। वह जलाशय नाना प्रकारकी फैली हुई लताओंसे छिपा हुआ था। मल्लाहकी पुत्रीने उसे दिखाया। तब धोबीने जलमें घुसकर उन वस्त्रोंको धोया। धोते ही वे सभी काले वस्त्र तत्क्षण स्फटिकमणिके समान स्वच्छ एवं श्वेत हो गये। इससे प्रसन्न होकर धोबीने अपनी कन्या तथा मल्लाहकी पुत्रीको साधुवाद देते हुए आदरपूर्वक कहा—'अब हम ये सभी वस्त्र उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको समर्पित कर सकते हैं।' तदनन्तर घर जाकर धोबीने बड़े हर्षके साथ वे वस्त्र ब्राह्मणोंको दिये। ब्राह्मणोंने वस्त्रके साथ ही धोबीके शरीर और केशोंको भी श्वेत हुआ देखकर पूछा—'यह क्या अद्भुत बात दिखायी देती है?'
तब धोबीने सब हाल कह सुनाया। सुनकर ब्राह्मणलोग भी उत्सुकतापूर्वक वहाँ गये। उन्होंने परीक्षाके लिये बहुत-सी काली वस्तुएँ डालीं, पर वे सभी श्वेतरूपमें परिणत हो गयीं। तब तरुण धर्मात्मा पुरुषोंने भी उस जलाशयमें स्नान किया। स्नान करते ही वे सब श्वेतवर्णके तथा तेज और वीर्यसे सम्पन्न हो गये। हाँ, उनके केश भी सफेद हुए बिना न रह सके। वहाँ स्नान करनेके प्रभावसे सब लोग परम गतिको प्राप्त होने लगे। तब इन्द्रने उस मोक्षदायक शुक्लतीर्थको देखकर उसे धूलसे पटवा दिया। आज भी वहाँ जो तृण आदि उत्पन्न होते हैं, वे शुक्लतीर्थके प्रभावसे श्वेत होते हैं। जो मनुष्य वहाँ उत्पन्न हुए कुशोंसे श्राद्ध करता है, वह समस्त पितरोंको तार देता है। जो मानव शुक्लतीर्थकी मृत्तिकाको अपने शरीरमें लगाकर स्नान करता है, वह सब तीर्थोंका फल पाता है।
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