संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११९३ ---|---
सब कौरव, पाण्डव और यादव प्रसन्नतापूर्वक शिवलिंगोंकी स्थापना करके कृतकृत्य हो गये। उन्होंने चिरकालतक उस तीर्थमें रहकर चमत्कारपुरके ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान देकर धनाढ्य बना दिया। इसके बाद वे सब लोग अपने-अपने स्थानको चले गये। जो पुरुष भक्तिभावसे उन शिवलिंगोंकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
स्कन्दस्वामी और देवयजनकी महिमा तथा तीनों सूर्य-विग्रहोंके दर्शनका माहात्म्य
सूतजी कहते हैं—प्राचीन कल्पमें जब देवताओंने हाटकेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की, तब भगवान् शिवने ब्रह्माजीके लिये यह क्षेत्र प्रदान किया था। उस समय वहाँके ब्राह्मणोंकी कलिकाल आदि दोषोंसे रक्षा करनेके लिये महादेवजीने अपने पुत्र कार्तिकेयको ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे वहाँ रहनेकी आज्ञा दी। पिताकी आज्ञासे कार्तिकेयजीने वहाँ निवास किया। जो कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रके योगमें स्वामिकार्तिकेयजीका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंतक धनाढ्य एवं वेदवेत्ता ब्राह्मण होता है। उस तीर्थमें कार्तिकेयजीका मन्दिर बहुत ही ऊँचा और मनोहर है; उस मन्दिरकी चर्चा सुनकर स्वर्गके देवता भी कौतूहलवश वहाँ उतर आये और उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस पवित्रतम नगर एवं मन्दिरका दर्शन किया तथा उस मन्दिरके उत्तर एवं पूर्व दिशामें विधिपूर्वक यज्ञकर्मका अनुष्ठान किया। यज्ञ-होम करके सब देवताओंने वहाँके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दी और उस स्थानका उत्तम फल पाकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। तबसे उस स्थानका नाम देवयजन हुआ। अन्य स्थानोंपर सौ यज्ञ करके मनुष्य जिस फलको पाता है, उसीको वहाँ दक्षिणासहित एक ही यज्ञ करके पा लेता है।
उस तीर्थमें तीन सूर्यविग्रह हैं—प्रथमका नाम मुण्डीर, दूसरेका कालप्रिय तथा तीसरेका मूलस्थान है, जो सब रोगोंका नाश करनेवाले हैं। भगवान् सूर्य प्रातःकाल मुण्डीरमें, मध्याह्नके समय कालप्रियमें तथा सन्ध्याके समय मूलस्थानमें जाते हैं। उस समय जो मनुष्य इन तीनों सूर्यविग्रहोंमेंसे एकका भी भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह निःसन्देह मोक्षको प्राप्त होता है।
समुद्रके निकट विटंकपुर नामक एक उत्तम स्थान है, जो समुद्रकी उत्ताल तरंगोंसे आवृत होनेके कारण ऊँची चहारदीवारीसे सुशोभित प्रतीत होता है। उस नगरमें एक ब्राह्मण था, जो पूर्वकर्मके फलसे युवावस्थामें ही कोढ़ी हो गया था। उसकी पत्नी अच्छे कुलमें उत्पन्न, सती-साध्वी एवं सुशीला थी। वह अपने कोढ़ी पतिको ही कामदेवके समान सुन्दर देखती थी। पतिके अच्छे होनेके लिये ब्राह्मणी भाँति-भाँतिकी बहुमूल्य एवं हितकर ओषधियाँ ले आती और उसके घावोंपर लेप करती थी। एक समय उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके घरमें कोई उत्तम अतिथि आया, जो कि बहुत थका-माँदा था। घरपर आये हुए उस ब्राह्मणको देखकर उसकी सती स्त्रीने भक्तिपूर्वक अनेक उपचारोंसे उसे सन्तुष्ट किया। जब वह स्नान, भोजन और आचमन करके शय्यापर विश्राम करने लगा, तब उससे गृहस्थ ब्राह्मणने पूछा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और इस समय कहाँ जाते हैं?'
पथिक बोला—द्विजश्रेष्ठ! मैं कान्तिपुरका रहनेवाला हूँ, मुझे भी तुम्हारी ही भाँति कुष्ठरोगने दबा लिया था। तब मैंने सुना कि इस पृथ्वीपर समस्त रोगोंका नाश करनेवाले तीन सूर्यविग्रह हैं। सुनकर उन्हींका दर्शन करनेके लिये मैं हाटकेश्वरक्षेत्रमें गया और मुण्डीर स्वामीके पास पहुँचकर वहीं ठहर गया। उस स्थानपर सूर्यदेवका विधिपूर्वक पूजन करनेसे मेरा सब रोग जाता रहा और शरीर परम सुन्दर
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हो गया। इस समय मैं वहींसे लौटकर आ रहा हूँ। द्विजश्रेष्ठ! तुम भी उस तीर्थमें जाकर वहाँके तीनों सूर्यविग्रहोंके दर्शन करो, जिससे कुष्ठरोगका नाश हो जाय। आज मुझे तुम्हारे घरमें अपने ही घरका-सा आराम मिला है। अब मैं अपने नगरको जाऊँगा।
पथिककी यह बात सुनकर गृहस्थ ब्राह्मणने अपनी पत्नीके मुखकी ओर देखा। वह बोली—'प्राणनाथ! इन्होंने बहुत अच्छी सलाह दी है, अतः जहाँ वे तीनों सूर्यविग्रह हैं, उस स्थानपर शीघ्र ही चलिये। प्रभो! मैं भी आपके साथ सेवामें संलग्न रहकर चलूँगी।' तदनन्तर उस ब्राह्मणने अपनी स्त्रीके साथ मुण्डीर स्वामीके निकट प्रस्थान किया और बड़े क्लेशसे किसी तरह वह हाटकेश्वरक्षेत्रमें पहुँचा तथा अपनी पत्नीसे बोला—'प्रिये! मैं रोग और भूखसे बहुत कष्ट पा रहा हूँ, अतः मुण्डीर स्वामीके समीपतक चलनेमें असमर्थ हूँ। इसलिये यहींपर अपना शरीर त्याग दूँगा। तुम कोई अच्छा साथ ढूँढ़कर घर लौट जाओ।'
स्त्री बोली—प्राणवल्लभ! आपके भोजन किये बिना मैंने कभी भोजन नहीं किया है। एकान्तमें भी जबतक आप जगे हैं, मैंने कभी नींद नहीं ली है। अतः आज इस महाक्षेत्रमें आकर जब आप परलोक जानेके लिये उद्यत हैं, तब आपको त्यागकर मैं घर कैसे लौट सकती हूँ? आपके बिना बन्धु-बान्धवों, गुरुजनों तथा अन्य सुहृदोंको कैसे मुँह दिखाऊँगी? इसलिये नाथ! मैं आपके साथ ही अग्निमें प्रवेश करूँगी। यह बात मैं शपथ खाकर कहती हूँ। महामते! जितने उपवास आपने किये हैं, उतने ही मुझे भी हुए हैं। इस दशामें आपको छोड़कर मैं घर कैसे जा सकती हूँ।
अपनी पत्नीका ऐसा निश्चय जानकर ब्राह्मणने चिता तैयार करवायी और अपनेको जला डालनेके लिये वह पत्नीके साथ ही चितापर बैठा। फिर मन-ही-मन भगवान् सूर्यका ध्यान करके उसने ज्यों ही आग अपने हाथमें ली, त्यों ही तीन महातेजस्वी पुरुष उसके सामने उपस्थित हो गये। वे ही भगवान् सूर्यके तीनों विग्रह थे। उनका दर्शन करके ब्राह्मण उसी क्षण कोढ़के रोगसे मुक्त तथा सुन्दर कान्तिसे सुशोभित तरुण हो गया। इस प्रकार उस क्षेत्रके तीनों सूर्य बहुत प्रसिद्ध हैं। उनके दर्शनसे भी सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती है।
चन्द्रदेवके मन्दिरके निर्माणका महत्त्व, अम्बावृद्धाके दर्शनकी महत्ता, शन्तनुके राज्यमें अवर्षण, अग्नितीर्थका प्राकट्य और अग्निको ब्रह्माका वरदान
सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रमें परम शुभदायक चन्द्रमाका भी मन्दिर है, जिसके दर्शनसे ही मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। चन्द्रग्रहणके समय अथवा सोमवारके दिन जो वहाँ चन्द्रदेवका दर्शन करता है, वह पापी हो तो भी नरकको नहीं देखता। यह समस्त संसार सोममय है, अतः सोमके प्रतिष्ठित होनेसे सम्पूर्ण त्रिलोकी ही प्रतिष्ठित हो जाती है। ये अन्न आदि सब ओषधियाँ, ये खेतोंमें लहरानेवाले सस्य, जिनके आश्रयसे समस्त जीव जीवन धारण करते हैं, सब सोममय ही हैं। ब्रह्मा आदि देवता क्रमशः सोमको पाकर परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं, अतः सोम श्रेष्ठ माने गये हैं। अग्निष्टोम आदि यज्ञ भी सोममें ही प्रतिष्ठित हैं। इस कारण सोम सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। वे देवता और दैत्य दोनोंके पूज्य हैं। जिस प्रकार पृथ्वीपर अन्य देवेश्वरोंके मन्दिर बनाये जाते हैं, वैसे ही निशानाथ चन्द्रमाका भी मन्दिर बनवाना चाहिये। जिन मनुष्योंने भूतलपर निशानाथ चन्द्रदेवका मन्दिर बनाया है, वे पुण्यराशिका संचय करके मोक्षपदको प्राप्त हो चुके हैं।
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हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो निशानाथ चन्द्रमाका मन्दिर है, उसे महाराज अम्बरीषने बनवाया था। उसीके उत्तर भागमें चन्द्रमाका एक दूसरा मन्दिर भी है, जो महाराज धुन्धुमारके द्वारा स्थापित किया गया है। उसके प्रभावसे वे दोनों राजा जन्म-मृत्युरहित परम सिद्धिको प्राप्त हुए। इसी प्रकार प्रभासक्षेत्रमें महाराज इक्ष्वाकुने श्रद्धापूर्वक चन्द्रमाके तीसरे मन्दिरकी प्रतिष्ठा की है। पृथ्वीपर इन तीन मन्दिरोंको छोड़कर दूसरा कोई चन्द्रमाका मन्दिर नहीं है। चन्द्रमाका यह उत्तम माहात्म्य बताया गया, जो पढ़ने और सुननेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।
जिस समय महाराज चमत्कारने इस चमत्कारपुरका निर्माण किया था। उसी समय उस नगरकी रक्षाके लिये ब्राह्मणोंकी सम्मतिसे उन्होंने देवियोंकी भी स्थापना की थी। उन दिनों राजा चमत्कारके दो कन्याएँ थीं। जिनमें एकका नाम था—अम्बा और दूसरीका वृद्धा। उन दोनोंका पाणिग्रहण काशिराजने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार देवता, ब्राह्मण और अग्निके समीप किया। एक समय काशीनरेशका यवनोंके साथ घोर युद्ध हुआ। जिसमें भयानक यवनोंके द्वारा प्रतापी काशिराज भृत्य, सेना तथा वाहनोंसहित मारे गये। अम्बा और वृद्धा यह दुःखद वैधव्य पाकर मनोवांछित फल देनेवाले हाटकेश्वरक्षेत्रमें गयीं और देवीके आराधनमें संलग्न हो शुभदायक तप करने लगीं। इसी समय प्रतापी नरेश चमत्कारने उनके लिये कैलास-शिखरके समान ऊँचा मन्दिर बनवाया। तबसे लेकर उस महान् अभ्युदयशाली क्षेत्रमें वे दोनों अम्बा-वृद्धाके नामसे प्रसिद्ध हुईं। वे दोनों देवियाँ सदा नगररक्षाके कार्यमें तत्पर रहती हैं। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर उन दोनोंका मुख देखता है, उसको एक वर्षतक किसी प्रकारका दोष नहीं प्राप्त होता। जो वर्षके आदि अथवा अन्तमें उन दोनोंकी प्रसन्नताके लिये पूजा करता है, उसे भूतलपर किसी प्रकारका छिद्र नहीं प्राप्त होता। जो पुरुष यात्राके समय उन दोनोंके लिये पूजन करता है, वह मनोवांछित फल पाकर शीघ्र अपने घर लौटता है। जो महानवमीके दिन श्रद्धापूर्वक अम्बा-वृद्धाकी प्रसन्नताके लिये पूजा करता है, वह अकण्टक होकर रहता है।
पूर्वकालमें प्रतीप नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े ही शूरवीर तथा ब्रह्मज्ञानी थे। उनका जन्म चन्द्रवंशमें हुआ था। राजा प्रतीपके दो पुत्र हुए, जो समस्त शुभलक्षणोंसे सुशोभित थे। उनमें पहलेका नाम देवापि और दूसरेका शान्तनु था। कुछ कालके बाद नृपश्रेष्ठ प्रतीप जब ब्रह्मलीन हो गये, तब देवापिने राज्यका त्याग करके तपस्याके लिये वनको प्रस्थान किया। तब उनके छोटे भाई शान्तनुको सब मन्त्रियोंने पिता-पितामहोंके राज्यपर बिठाया। राजा शान्तनुके राज्य करते समय इन्द्रने बारह वर्षोंतक वृष्टि रोक दी। इससे सब लोग बड़ी कठिनाईमें पड़ गये और भूखसे पीड़ित रहने लगे। यदि दैवयोगसे किसीके पास कहीं थोड़ा भी कच्चा या पका अन्न दिखायी देता तो उसे दूसरे बलवान् लोग बलपूर्वक छीन लेते थे। सारे वृक्ष और जलाशय सूख गये। गंगा आदि नदियोंमें भी बहुत थोड़ा जल रह गया। इस प्रकार वर्षा बंद होनेपर धर्मका मार्ग नष्ट हो गया। सम्पूर्ण जगत् हड्डियोंसे भर गया। कोई भी यज्ञ, स्वाध्याय तथा व्रतका पालन नहीं करता था। तब अग्निदेव इन्द्रपर क्रोध करके भूमण्डलवासियोंके लिये अदृश्य हो गये। इसी समय ब्रह्मा और विष्णुको आगे करके सब देवता अग्निकी खोज करनेके लिये पृथ्वीपर घूमने लगे। इधर अग्निदेव हाटकेश्वरक्षेत्रमें ब्रह्माजीके स्थानसे ईशानकोणमें स्थित गम्भीर जलाशयके भीतर प्रवेश कर गये। देवता उन्हें खोजते हुए वहाँ आ पहुँचे। देवताओंको आया देख अग्निदेव उस स्थानसे निकले। तब महात्मा ब्रह्माजीने पूछा—'अग्ने ! तुम देवताओंको देखकर क्यों अन्यत्र चले जाते हो ? तुम्हीं सबके आदि हो और तुम्हीं इन सबके मुखरूपसे जगत्में प्रतिष्ठित हो। तुममें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यको प्राप्त होती है, सूर्यसे वृष्टि होती है और वृष्टिसे अन्न उत्पन्न होता
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है। फिर अन्नसे प्रजाका जीवन चलता है, इसलिये तुम्हीं जगत्के धाता और विधाता हो। तुम्हारे सन्तुष्ट रहनेपर सम्पूर्ण जगत् सुरक्षित रहता है और तुम्हारे कुपित होनेपर इसका नाश हो जायगा। अग्निष्टोम आदि सम्पूर्ण यज्ञ तुममें ही प्रतिष्ठित हैं और सम्पूर्ण भूत-प्राणी तुम्हारे ही आश्रयसे जीवित रहते हैं। अग्निदेव ! तुम समस्त भूतोंके भीतर सदा विचरते हो, क्योंकि उदरस्थित अन्न और जलका पाचन तुम्हीं करते हो। अतः सम्पूर्ण देवताओंपर कृपा करो और अपने क्रोधका कारण बताओ। तुम क्यों सबको त्यागकर चले गये थे?'
सूतजी कहते हैं—ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर अग्निदेवने क्रोध त्याग दिया और प्रेमसे कहा—'कमलोद्भव ! इन्द्रने वृष्टि रोक दी, जिससे अन्न आदि ओषधियोंका सर्वनाश हो गया। अतः उन्हींपर क्रोध करके मैं संसारको छोड़कर अदृश्य हो गया था।' यह सुनकर ब्रह्माजीने कहा—'इन्द्र ! अग्निदेव ठीक ही कहते हैं, तुम संसारमें वर्षा क्यों नहीं करते?'
इन्द्रने कहा—पितामह ! अपने बड़े भाईका उल्लंघन करके शन्तनु समूची पृथ्वीका राजा बन बैठा है। इसीलिये मैंने उसके राज्यमें वर्षा रोक दी है। अब आप ही प्रमाण हैं, कहिये मैं क्या करूँ?
ब्रह्माजी बोले—इस उल्लंघनका फल तो उस राजाने पा लिया। अब मेरे कहनेसे तुम शीघ्र ही वर्षा करो, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् अकाल और क्षुधाद्वारा नष्ट होनेसे बच जाय।
तब इन्द्रने शीघ्रतापूर्वक पृथ्वीपर वर्षा करनेके लिये पुष्करावर्तक नामवाले मेघोंको आज्ञा दी। आज्ञा पाते ही उन्होंने बिजली चमकाते और गर्जते हुए क्षणभरमें पृथ्वीको जलसे परिपूर्ण कर दिया। तत्पश्चात् देवताओंसहित ब्रह्माजीने अग्निसे कहा—'पावक ! तुम अग्निहोत्रमें ब्राह्मणोंके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हो जाओ और मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'
अग्नि बोले—यह पवित्र जलाशय भूतलपर अग्नितीर्थ कहलाये। जो प्रातःकाल उठकर श्रद्धापूर्वक इसमें स्नान करनेके पश्चात् अग्निसूक्तका जप करके आदरके साथ आपका दर्शन करे, उसको आप मेरे अनुरोधसे पूर्णतः सन्तुष्ट करें।
ब्रह्माजीने कहा—अग्ने ! जो वेदवेत्ता द्विज प्रातःकाल उठकर यहाँ स्नान और अग्निसूक्तका जप करनेके पश्चात् मेरा दर्शन करेगा, उसे अग्निष्टोम यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा।
अग्निदेव बोले—लोकेश्वर ! बारह वर्षोंतक मुझे कभी तृप्ति नहीं प्राप्त हुई। मर्त्यलोक भूखसे पीड़ित था; अतः मुझे कहीं कुछ नहीं मिला। इसलिये पुनः यहाँ अन्नमय यज्ञ हो।
ब्रह्माजी बोले—हुताशन! यहाँ जो कोई ब्राह्मण निवास करते हैं, वे वसुधाराकी आहुतिसे तुम्हें रात-दिन भक्तिपूर्वक तृप्त करते रहेंगे। इससे तुम पूर्णतः पुष्ट हो जाओगे और उनके भी मनोवांछित मनोरथ पूर्ण होंगे। संक्रान्तिके समय जो वसुधारा प्रदान करनेवाले ब्राह्मण तुम्हारे मुखमें आहुति डालेंगे, उनके जीवभरके अज्ञानजनित पाप नष्ट हो जायँगे। तुम्हारे सन्तुष्ट होनेपर आगे चलकर उशीनर देशमें शिवि नामसे सुविख्यात राजा होंगे, जो श्रद्धापूर्वक द्वादशवार्षिक (बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला) यज्ञ करके वसुधारा देकर तुम्हें वर्षों तृप्त करते रहेंगे। इससे तुम्हें उत्तम पुष्टि प्राप्त होगी। भूतलपर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सब मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे। आजसे लेकर शान्तिक या पौष्टिक जो भी कर्म होगा, वसुधारासे युक्त होगा और तुम्हें परम तृप्ति प्रदान करनेवाला होगा।
अग्निदेवसे ऐसा कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी इन्द्र, विष्णु और शिव आदि देवताओंके साथ ब्रह्मलोकको गये। वहाँसे सब देवता अपने-अपने धामको चले गये। अग्निदेव ब्राह्मणोंके अग्निहोत्र गृहमें प्रकट हुए और विधिपूर्वक प्राप्त वसुधारा होम ग्रहण करने लगे। इस प्रकार हाटकेश्वरक्षेत्रमें परम उत्तम अग्नितीर्थ प्रसिद्ध हुआ, जहाँ प्रातः स्नान करके मनुष्य दिनभरके पापसे मुक्त हो जाता है।
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ब्रह्मकुण्ड तथा गोमुखतीर्थकी उत्पत्तिकथा एवं महिमा
सूतजी कहते हैं—महात्मा मार्कण्डेयजीने जिस समय ब्रह्माजीका स्थापन किया था, उसी समय वहाँ पवित्र जलसे युक्त एक कुण्डका भी निर्माण किया और उसके माहात्म्यके विषयमें इस प्रकार कहा—'कार्तिक मासमें चन्द्रनक्षत्र कृत्तिकाके योगमें जो यहाँ भलीभाँति भीष्मव्रतका पालन करेगा, वह उत्तम ब्रह्मलोकमें जायगा।' ऐसा कहते हुए मार्कण्डेयजीके उस वचनको किसी पशुपाल (चरवाहे)-ने सुना और श्रद्धासे प्रेरित होकर उसने कार्तिक मासमें भीष्मपंचक-व्रतका विधिपूर्वक पालन किया। जब कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा आयी तब उसमें स्नान करके ब्रह्माजीकी पूजा की। उसके बाद पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुका भी विधिपूर्वक पूजन किया। तदनन्तर काल आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी और वह इसी नगरमें ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुआ। उस समय उसे अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण बना हुआ था। एक दिन उसने लोगोंके पूछनेपर बताया कि किसी समय महामुनि मार्कण्डेयके मुखसे मैंने ब्रह्मकुण्डका माहात्म्य सुना और कार्तिक मासमें उस शुभदायक कुण्डके जलमें विधिपूर्वक स्नान किया था। उसीके प्रभावसे इस जन्ममें मैं ब्रह्मर्षि चन्द्रात्रेयके वंशमें उत्पन्न हुआ हूँ और पूर्वजन्मकी सब बातोंको भी स्मरण करता हूँ। कार्तिक पूर्णिमाको कृत्तिकानक्षत्रका योग होनेपर यहाँका महत्त्व बढ़ जाता है, इस बातको मैं अनुभव कर चुका हूँ। इसीलिये सदा उत्तम भीष्मपंचक-व्रतका पालन करता हूँ।
इस प्रकार उसकी बात सुनकर अन्य सब श्रेष्ठ ब्राह्मण भी श्रद्धापूर्वक भीष्मपंचक-व्रतका पालन करने लगे। तभीसे उत्तर दिशामें वह कुण्ड इस पृथ्वीपर ब्रह्मकुण्डके नामसे विख्यात हुआ। जो ब्राह्मण सदा उसमें स्नान करता है, वह प्रत्येक जन्ममें श्रेष्ठ ब्राह्मण ही होता है।
वहीं एक गोमुख नामसे प्रसिद्ध अतिशय शोभायमान तीर्थ है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें चमत्कारपुरके भीतर गौओंका पालन करनेवाला एक ब्राह्मण था, जो कुष्ठरोगसे पीड़ित हो अत्यन्त दुर्बल हो गया था। किसी समय उसी मार्गसे उसकी गौओंका झुंड आ निकला। वे सभी गौएँ प्याससे कष्ट पा रही थीं। उस दिन ज्येष्ठ मासकी एकादशी तिथिमें चित्रा नक्षत्रका योग था और मध्याह्नकाल हो गया था। यद्यपि वहाँ घास बहुत उगी थी, फिर भी गरमी और प्यासके कष्टसे किसी भी धेनुने उस घासकी ओर देखातक नहीं। उनमेंसे एक गौने दूरसे ही घासके उस पुंजको देखा और अत्यन्त हर्षमें भरकर तुरंत ही वहाँ जा दाँतोंसे उखाड़कर खींचा। इतनेमें ही उस घासके नीचेसे जलकी धारा निकल आयी। उस प्याससे कष्ट पाती हुई गायने घासको खा धीरे-धीरे दुग्धके समान स्वच्छ एवं मधुर प्रतीत होनेवाले उस जलको जी भरकर पीया। जब वह वेगपूर्वक जल पी रही थी, उसी समय पृथ्वीपर वहाँ जलसे भरे हुए अनेक लंबे-चौड़े गड्ढे प्रकट हो गये। तदनन्तर दूसरी सैकड़ों गौओंने भी उस अत्यन्त निर्मल अमृतरसके समान मधुर जलका पान किया। जैसे-जैसे गौएँ आकर जल पीती थीं, वैसे-ही-वैसे उनके मुखके स्पर्शसे वे गड्ढे बढ़ते जाते थे। इस प्रकार जब सभी गौओंने पानी पीकर प्यासको बुझा लिया, तब वह प्यासा गोपालक ब्राह्मण जलमें घुसा। अपने अंगोंको धोकर और जल पीकर ज्यों ही वह जलसे बाहर निकला त्यों ही अपने शरीरको उसने सूर्यके समान तेजस्वी देखा। इससे उसको बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने घर जाकर सब लोगोंके सामने वहाँका सब वृत्तान्त कह सुनाया। तब वहाँके सब लोग, विशेषतः रोगी मनुष्य, उस दिव्य जलके पास गये और सबने एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान किया। स्नान करते ही सब लोग तत्काल
११९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
रोगों और पापोंसे मुक्त हो गये। तबसे वह जल गोमुख तीर्थके नामसे विख्यात हुआ; क्योंकि वह गौओंके मुखसे प्रकट हुआ था।
ऋषि बोले—सूतनन्दन! उस स्थानसे जो वैसा माहात्म्यपूर्ण जल प्रकट हुआ, इसका क्या कारण है?
सूतजीने कहा—महर्षियो! यहाँ पूर्वकालमें महाराज अम्बरीषने तप किया था। तपस्याका कारण यह था कि राजाको वृद्धावस्थामें एक पुत्र हुआ। उसका नाम सुवर्चा था। पूर्वजन्मके कर्मके फलसे बाल्यावस्थामें ही राजकुमार सुवर्चा कोढ़ी हो गये। इससे राजाको बड़ा दुःख हुआ। तब वे सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हाटकेश्वरक्षेत्रमें गये और पुत्रके रोगका निवारण करनेके लिये उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् विष्णुने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और आदरपूर्वक कहा—'वत्स! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे माँगो।'
राजाने कहा—केशव! मेरा पुत्र बाल्यावस्थामें ही कुष्ठरोगसे पीड़ित हो गया है। आप इसके रोगका निवारण करें।
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने एकाग्रमनसे पातालगंगाका स्मरण किया। भगवान्के स्मरण करनेपर पातालगंगा एक छोटा-सा विवर बनाकर तत्काल ऊपर आ गयीं। तब श्रीहरिने राजासे कहा—'तुम्हारा पुत्र इस उत्तम गंगाजलमें स्नान करे।' यह आज्ञा पाकर अम्बरीषने अपने पुत्रको श्रीहरिके सामने ही पातालगंगाके जलमें नहलाया। वहाँ स्नान करनेमात्रसे ही वह बालक उसी क्षण कुष्ठरोगसे मुक्त हो बालसूर्यके समान तेजस्वी हो गया। तब उसने भगवान्को नमस्कार किया। इस बातको कोई जानता नहीं था, इसलिये वह सर्वपापहारी जल वहाँ गुप्त ही रहा। वही पुनः गोमुखद्वारा पृथ्वीपर प्रकट हुआ। आज भी उस जलके स्पर्शसे वहाँका धरातल अत्यन्त पवित्र है। जो पुरुष रविवारको सूर्योदयके समय वहाँ स्नान करता है, उसके गलगण्ड (घेघा) आदि सब रोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं। पापजनित बड़ी भयंकर व्याधियाँ भी निवृत्त हो जाती हैं। फोड़े और चेचक आदिके उपद्रव भी शान्त हो जाते हैं। जो मनुष्य निष्कामभावसे भक्तिपूर्वक इस तीर्थमें स्नान करता है, वह देवदेव चक्रपाणि श्रीहरिके लोकमें जाता है। जिस दिन भगवान् विष्णुने वहाँ गंगाको प्रकट किया था, उस दिन सूर्य वृषराशिपर स्थित थे और चन्द्रमा चित्रानक्षत्रकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा भगवान् विष्णुकी एकादशी तिथि भी विद्यमान थी। फिर गायके मुखसे जिस दिन घासोंका समूह उखाड़ा गया और गंगा भूतलपर प्रकट हुईं, उस दिन भी पूर्वोक्त योग ही था। अतः वही वहाँके लिये उत्तम पर्व है।
परशुरामद्वारा लोहयष्टिकी स्थापना और उसकी महिमा, देवीकुण्डका माहात्म्य, देवीकी कृपासे अजको दिव्यास्त्रोंकी प्राप्ति तथा पातालगमन
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! जिस समय परशुरामजीने रामकुण्डमें जाकर अपने पितरोंका तर्पण किया और यज्ञमें सारी पृथ्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देकर वे क्रोधरहित हो गये, उस समय समुद्र-स्नानके लिये हर्षपूर्वक प्रस्थित हुए। उस यात्राके समय भी उन्होंने अपने हाथमें सूर्यके समान तेजस्वी कुठार ले रखा था। तब समस्त ऋषि-मुनियोंने परशुरामजीसे कहा—'महाभाग राम! आप पुण्यकार्य करनेके लिये जाते समय भी जो हाथमें शस्त्र धारण करते हैं, यह उचित नहीं जान पड़ता। जबतक आपके हाथमें कुठार रहेगा, तबतक आपका क्रोध शान्त नहीं होगा। इसलिये इसे त्याग दीजिये।'
मुनियोंकी यह बात सुनकर परशुरामजीने हाथ जोड़कर विनीतभावसे कहा—विप्रवरो!
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १११९
यह कुठार अक्षय है और भगवान् शंकरके तेजसे प्रकट हुए लोहका बना हुआ है। साक्षात् विश्वकर्माने इसका निर्माण किया है। ऐसे दिव्य शस्त्रको त्यागकर मैं क्षात्रधर्ममें तत्पर होकर भी कैसे दिग्दिगन्तमें जा सकता हूँ? मेरे छोड़े हुए इस कुठारको यदि दूसरा कोई ग्रहण कर लेगा, तो वह मेरेद्वारा वध्य होगा। अतः यदि इसे छोड़ भी दूँ, तो मेरे मनमें शान्ति नहीं रहेगी। मैं इसे तभी छोड़ सकता हूँ, जब आपलोग इसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करें।
ब्राह्मणोंने कहा—महाभाग! यदि तुम इस कुठारको हमें रक्षाके लिये सौंपते हो, तो इसका खण्ड-खण्ड करके दो। तभी हम यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करेंगे। उस दशामें कोई इसे लेगा भी नहीं।
मुनियोंकी यह बात सुनकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने उस कुठारको तोड़कर लोहेकी छड़ी बनवा दी और उसे उन ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक सौंप दिया।
ब्राह्मण बोले—राम! आपके कुठारकी बनी हुई इस लोहेकी छड़ीको हमलोग बड़े यत्नसे रखेंगे। जैसे कुमार कार्तिकेयकी शक्तिमयी कीर्ति यहाँ प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार आपकी लोहयष्टिमयी कीर्ति भी यहाँ प्रतिष्ठित हो गयी। जो राज्यभ्रष्ट राजा इस लोहदण्डकी आराधना करेगा, वह शीघ्र ही अपने राज्यको पाकर प्रतापी होगा। जो द्विज सदा विद्याके लिये इस लोहयष्टिकी पूजा करेगा, वह उत्तम विद्या पाकर सर्वज्ञताको प्राप्त होगा। जो पुत्रहीन पुरुष अथवा स्त्री आपके इस लोहदण्डकी पूजा करेंगे, वे पुत्रवान् होंगे। जो आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके इसकी पूजा करेगा, वह समस्त मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त करेगा।
ऐसा सुनकर परशुरामजीने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम करके तुरंत ही समुद्रकी ओर प्रस्थान किया और वे ब्राह्मण भी उस लोहयष्टिके लिये उत्तम मन्दिर बनवाकर उसमें उसकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी पूजा करने लगे। इससे उन्होंने अपने देवदुर्लभ मनोरथोंको भी प्राप्त कर लिया।
सूतजी कहते हैं—प्राचीनकालमें अज नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनका सत्पुरुषोंमें भी बड़ा सम्मान था। वे माता-पिताकी भाँति सब लोगोंका हित करनेवाले थे। उन्होंने पिता-पितामहका राज्य पाकर मन-ही-मन यह विचार किया कि 'मुझे ऐसा कर्म करना चाहिये, जिसे संसारके दूसरे राजाओंने अबतक न किया हो और जो भविष्यमें होनेवाले हैं, वे भी जिसे न कर सकें। राजाओंके लिये सर्वोत्तम धर्म यही है कि प्रजाका भलीभाँति पालन करे, जिससे प्रजावर्गके लोग सुखपूर्वक रह सकें। राजालोग लोभमें आकर जैसे-जैसे प्रजासे अधिक कर लेने लगते हैं, वैसे-वैसे प्रजाके हृदयमें क्षोभ उत्पन्न हो जाता है। राजा कर लिये बिना हाथी, घोड़े और पैदल आदि सेनाकी रक्षा नहीं कर सकते और यदि सेना न रहे तो नीच-से-नीच भी मनुष्य उन्हें दबा लेंगे। इसीलिये सब राजा प्रजाजनोंसे कर लेते हैं। अतः मुझे हाथी, घोड़े और पैदल आदिके बिना ही केवल तपस्याकी शक्तिसे अपने राज्यको निष्कण्टक बनाये रखना चाहिये।'
ऐसा सोचकर वे कर न लेकर सदा प्रजाको प्रसन्न रखने लगे। दूसरे राजाओंसे भी कर लेना उन्होंने बंद कर दिया और अपने पुरोहित मुनिवर वसिष्ठको आदरपूर्वक बुलाकर पूछा—'ब्रह्मन्! इस भूतलपर सबसे उत्तम तीर्थ कौन है, जहाँ थोड़े ही समयमें भगवान् शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। उसे शीघ्र बताइये। जिससे मैं वहाँ जाकर सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करूँ।'
वसिष्ठजी बोले—नृपश्रेष्ठ! हाटकेश्वरक्षेत्र मनीषियोंको शीघ्र ही उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला तथा सब पातकोंका नाशक है। वही सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ है। इसी प्रकार देवताओंमें भी भगवती चण्डिका ही ऐसी हैं, जो श्रद्धालु मनुष्योंद्वारा
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आराधना करनेपर शीघ्र सन्तुष्ट होती हैं। इसलिये उसी क्षेत्रमें जाकर तुम श्रद्धापूर्वक देवीकी आराधना करो। ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पवित्र व्रतमें तत्पर रहो। नियमपूर्वक रहते हुए नियमित भोजन एवं त्रिकाल स्नान करो।
वसिष्ठजीके बताये अनुसार राजा अजने हाटकेश्वरक्षेत्रमें देवीकी आराधना की। गन्ध, पुष्प और अनुलेपन आदि उपचारोंके द्वारा निरन्तर पूजामें तत्पर हुए राजापर देवी चण्डिका प्रसन्न हुईं और बोलीं—'वत्स ! मैं तुम्हारे इस व्रत और पूजाविधानसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे माँगो। मैं उसे शीघ्र पूर्ण करूँगी।'
राजाने कहा—देवि! मैंने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे इस व्रत और तपस्याका आश्रय लिया है। जिससे सब लोगोंको सुख मिले, ऐसी कृपा कीजिये। मुझे बहुत-से ऐसे ज्ञानयुक्त विचित्र-विचित्र अस्त्र दीजिये, जो स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचर सकें। जो इस भूतलपर स्थित और मेरे पासकी भी सब वस्तुओंको भी स्वतः जान लें। लोकमें परस्त्रीसंगम आदि जो अपराध हों, उन सबको स्वयं जानकर अपराधके अनुसार जो स्वतः दण्ड दे दें, जिससे लोकमें संकरता न फैलने पावे। इसके सिवा मुझे भाँति-भाँतिके मन्त्र दीजिये, जिनसे मैं सबकी रोग-व्याधियोंको शीघ्र निवारण कर सकूँ। जिससे मेरे राज्यमें रहनेवाले सब मनुष्य सुखी, नीरोग, पुष्ट, निर्भय तथा शोकरहित हो जायँ।
देवी बोलीं—राजन् ! तुमने यह एक ऐसा बड़ा अद्भुत कर्म प्रारम्भ किया है, जिसे अबतक न तो किसीने किया है और न आगे कोई करेगा। तथापि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगी। मैं तुम्हें समस्त ज्ञानयुक्त शस्त्र देती हूँ और वैसे ही प्रभावशाली मन्त्र देती हूँ। इन मन्त्रोंसे बड़े-बड़े भयंकर रोग भी तुम्हारे द्वारा रोक दिये जायँगे, परंतु मेरे मन्त्रोंसहित उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको तुम सदा सुरक्षित रखना। यदि वे तुम्हारी दृष्टिसे कहीं दूर निकल जायँगे तो मनुष्योंको बहुत अधिक पीड़ा देंगे। राजन् ! तुम जब स्वर्गलोकको जाओ तब इन समस्त मन्त्रों और अस्त्र-शस्त्रोंको यहाँ मेरे सम्मुख जलमें स्थापित कर देना, जिससे सब व्यवहार पूर्ववत् नीतिके अनुकूल चल सके।
'बहुत अच्छा' कहकर राजाने देवीकी आज्ञा शिरोधार्य की। फिर तो उनके सामने वे ज्ञान-वैभवसे युक्त नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र प्रकट हुए, जिनके लिये उन्होंने देवीसे प्रार्थना की थी। साथ ही, व्याधिनाशक मन्त्र भी उनके ज्ञानमें आ गये, जिनके द्वारा सब रोग स्वेच्छानुसार ग्रहण किये और छोड़े जाते हैं तथा जिनके द्वारा दृष्टिमें आये हुए सब मनुष्योंका सुखपूर्वक पालन होता है।
तत्पश्चात् राजाने देवीके प्रसादको ग्रहण करके अपनी पत्नी इन्दुमति और पुत्र दशरथको छोड़कर शेष समस्त पदार्थों और हाथी-घोड़े आदि उपकरणोंको ब्राह्मणोंकी सेवामें दान कर दिया। रोग-व्याधियोंको मन्त्रोंके द्वारा दूर करके वे डंडा लेकर अजापालनकी तरह स्वयं प्रजापालन करने लगे। उनके राज्यमें कोई छिपकर भी अपराध नहीं कर पाता था। यदि कोई प्रमादवश पृथ्वीपर पाप करता तो उसे तत्काल ही तदनुकूल दण्ड मिल जाता था। राजाके वे दिव्यास्त्र किसीके दृष्टिमें न आकर भी वध अथवा बन्धन आदि दण्ड तत्काल देते थे। अन्य राजाओंके राज्यमें तो जो मनुष्य गुप्त पाप करते थे, उन्हींके पापोंका यमराज दण्ड देते थे; परंतु राजा अजके राज्यमें उन दिव्यास्त्रोंके भयसे डरा हुआ कोई भी मनुष्य पाप नहीं करता था। अतः वे सभी पापमुक्त एवं पवित्र शरीरवाले हो गये। रोगोंका नियन्त्रण हो जानेके कारण सब मनुष्योंको उत्तम सुख प्राप्त होता था। इस प्रकार संसारसे जब पापका भय निवृत्त हो गया, तब यमलोकके सभी नरक सूने हो गये। कोई भी पुरुष नरकमें नहीं
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११२१
जाता था। सत्ययुगमें लोगोंका जैसा व्यवहार था, वैसा ही त्रेतामें भी हुआ।
एक समय भगवान् शंकर व्याघ्रका शरीर धारण करके बार-बार गर्जना करते हुए जहाँ राजा अज थे, वहीं उपस्थित हो गये। विकराल शरीर धारण करनेवाले उस व्याघ्रको देखकर राजाने भगवतीके दिये हुए सूर्यके समान तेजस्वी अस्त्रका प्रहार किया। क्रमशः देवीसे प्राप्त हुए अन्यान्य अस्त्रोंका भी प्रयोग किया, परंतु उन सभी अस्त्रोंको भगवान् शंकरने धीरे-धीरे अपने मुखमें ग्रहण कर लिया। तब अस्त्रोंके अभावसे राजाने व्याघ्ररूपधारी भगवान् शिवसे द्वन्द्वयुद्ध किया। उनके शरीरका स्पर्श होते ही भगवान् शिवने व्याघ्रशरीर त्याग दिया और भस्मांगराग-विभूषित, चन्द्रार्धमुकुटमण्डित दिव्यरूप धारण कर लिया। उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही थी। उन्होंने खट्वांग तथा सर्पमय आभूषण धारण कर रखे थे। भगवान् शिवको इस रूपमें प्रत्यक्ष देखकर रानीसहित राजा अजने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् उनकी स्तुति करके वे विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़े हो गये और आनन्दाश्रु बहाते हुए हर्षगद्गद वाणीमें बोले—'प्रभो! मैंने अज्ञानवश जो आपका तिरस्कार किया और आपके ऊपर अस्त्र चलाया, वह सब अपराध कृपया क्षमा करें।'
भगवान् शिव बोले—बेटा! तुम्हारा अलौकिक कर्म देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ, अतएव उस तिरस्कारको मैंने अपनी स्वाभाविक क्षमासे ही क्षमा कर दिया है। राजन्! तुमने जैसा राज्य किया, जिस प्रकार प्रजाकी रक्षा की, वैसी राज्यव्यवस्था अबतक न तो किसीने की थी और न कोई आगे करेगा ही। अतः तुम अभी अपनी इन रानीके साथ इसी शरीरसे पाताललोकमें चलो।
राजाने कहा—भगवन्! मैं अयोध्या नामक महापुरीमें अपने पुत्र दशरथको राजसिंहासनपर बिठाकर उसे मन्त्रियोंके अधीन सौंपकर आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। जिन्होंने सन्तुष्ट होकर मुझे अस्त्र-शस्त्र तथा यन्त्रसमुदाय दिये थे, उन महादेवीने यह आज्ञा की थी कि 'जब तुम दुस्त्यज मर्त्यलोकका त्याग करने लगो, तब मेरे कुण्डमें इन सबको डाल देना।' अतः आप उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको मुझे पुनः लौटा दें, जिससे मैं देवीके ऋणसे उऋण हो जाऊँ।
उनके ऐसा कहनेपर भगवान् त्रिपुरारिने राजाको वे दिव्य अस्त्र-शस्त्र लौटा दिये और आज्ञा देते हुए कहा—राजन्! तुम्हारा पुत्र स्वयं ही राजा हो जायगा। वह वीरता, उदारता और शम आदि गुणोंसे सम्पन्न हो तुम्हारे वंशको धारण करनेमें समर्थ होगा। तुम आज ही मेरे साथ इस देवीकुण्डके पवित्र जलमें प्रवेश करके मेरे धामको चलो। आज माघ शुक्ला चतुर्दशीका दिन है। दूसरा कोई भी जो पुरुष इस तिथिको देवीकी भक्तिपूर्वक पूजा करके इस जलमें गोता लगाकर प्राण त्याग करेगा, वह पाताललोकमें, जहाँ हाटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध मेरा दिव्य विग्रह है, वहाँ पहुँच जायगा। नृपश्रेष्ठ! जो इस तीर्थमें केवल स्नानमात्र करेगा, उसके एक सौ आठ रोगोंमेंसे एक भी न होगा।
ऐसा कहकर भगवान् शिवने रानी तथा उन अस्त्र-शस्त्रोंके सहित राजाको साथ लेकर उस देवीकुण्डके जलमें प्रवेश किया और वहाँसे उन्हें अपने धाममें पहुँचा दिया। उसी मानवशरीरसे राजा अज अपनी रानीके साथ आज भी अजर-अमर होकर वहाँ पातालमें रहते हैं और हाटकेश्वर भगवान्की श्रद्धापूर्वक आराधना करते हैं।
इस प्रकार हाटकेश्वरक्षेत्रमें माहेश्वरी देवीका प्रादुर्भाव हुआ है, जिसे राजा अजने श्रद्धापूर्ण हृदयसे स्थापित किया था।
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११२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
राजवापीके प्रसंगमें राजा दशरथका प्रभाव, शनैश्चरग्रहकी पराजय, इन्द्रके साथ राजाकी मैत्री और उनके यहाँ श्रीराम आदिके प्राकट्यकी कथा
सूतजी कहते हैं—राजा अजके पाताललोकमें गमन करनेके पश्चात् उनके पुत्र दशरथ राजा हुए। मन्त्रियोंने उनको आगे रखा और सदा सम्मान दिया। ये वे ही राजा दशरथ थे, जो प्रतिदिन इन्द्रलोकमें जाते और इन्द्रके साथ क्रीडा करते थे। इन्होंने रोहिणीका भेदन करनेवाले शनैश्चरग्रहको परास्त किया था तथा इनके घरमें साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर रावणका विनाश करनेके लिये अवतार लिया था। राजा दशरथने भी हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाकर आराधनाद्वारा भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट किया और सुन्दर मन्दिर निर्माण करके वहीं उनको स्थापित किया। वहाँ राजा दशरथकी वापी प्रसिद्ध है, जिसे उन्होंने स्वयं तैयार कराया था। उसे लोकमें 'राजवापी' कहते हैं। जो लोग पंचमीको तथा विशेषतः पितृपक्षमें वहाँ श्राद्ध करते हैं वे सत्पुरुषोंके प्रिय होते हैं।
किसी समय ज्योतिषके विद्वानोंने राजासे यह कहा कि 'शनैश्चर ग्रह रोहिणीका भेदन करेगा और यदि ऐसा हुआ तो संसारमें बारह वर्षोंतक घोर अनावृष्टि होगी, सर्वत्र अकाल पड़ जायगा। उस समय सम्पूर्ण भूमण्डल मनुष्योंसे शून्य हो जायगा।' उनकी यह बात सुनकर राजा दशरथके मनमें शनैश्चरके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। राजाको इन्द्रने एक कामग विमान दे रखा था। उसीपर बैठकर दशरथने शनैश्चरपर आक्रमण किया और अपने महान् धनुषको खींचकर उसपर तीखे बाणका सन्धान किया तथा नीचे मुख किये स्थित हुए शनैश्चरके सामने खड़े होकर कहा—'शनैश्चर! मेरे कहनेसे तुम रोहिणीका मार्ग त्याग दो, अन्यथा इस मन्त्रप्रेरित दिव्यास्त्रसे मारकर मैं तुम्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।'
उनकी यह भयङ्कर बात सुनकर शनैश्चर देवको बड़ा विस्मय हुआ और वे बोले—महाभाग! तुम कौन हो जो मेरा मार्ग रोकते हो? यह मार्ग तो किसीके द्वारा गम्य नहीं है, देवता और असुर भी यहाँ नहीं आ सकते, फिर तुम कैसे चले आये?
राजाने कहा—मैं सूर्यवंशमें उत्पन्न महाराज अजका पुत्र दशरथ नामक राजा हूँ और क्रोधपूर्वक तुम्हें रोहिणीके मार्गसे हटानेके लिये आया हूँ।
शनैश्चर बोले—राजन्! तुम्हारे साथ तो मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर क्यों तुम अतिशय क्रोधमें आकर मेरा मार्ग रोकना चाहते हो?
राजाने कहा—अभी-अभी ज्योतिषियोंने मुझे बताया है कि तुम (शनैश्चर) रोहिणीचक्रका भेदन करनेवाले हो और यदि तुमने उसका भेदन कर दिया तो इन्द्र वर्षा रोक देंगे। वृष्टि रुक जानेसे पृथ्वीपर अन्न नहीं पैदा होगा और अन्नके अभावसे भूतलके समस्त प्राणी नाशको प्राप्त हो जायँगे। जब सब प्राणियोंका नाश हो जायगा, तब यज्ञ कौन करेगा? फलतः अग्निष्टोम आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ पृथ्वीसे उठ जायँगी और ऐसा होनेपर प्रलय मच जायगा। सूर्यनन्दन! इसीलिये मैंने तुम्हारी राह रोकी है।
शनिदेव बोले—बेटा! अपने घरको लौट जाओ। इच्छा हो तो मुझसे भी तुम कोई वर माँगो; मैं तुम्हारे पराक्रमसे सन्तुष्ट हूँ। मैं अपनी दृष्टिसे जिसे देख लूँ, वह भस्म हो जाता है। इसीलिये अपनी दृष्टि सदा नीची किये रहता हूँ। तुमने प्रजावर्गके हितके लिये मेरे भयको त्याग दिया है, अतः तुम्हारे लिये मैं रोहिणीका भेदन नहीं करूँगा।
राजाने कहा—शनिदेव! आपका दिन प्राप्त होनेपर जो मनुष्य अपनी शरीरमें तेल लगाता है, उसको अपना दूसरा दिन आनेतक आप कभी
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११२३ ---|---
| पीड़ा न दें। जो आपके सन्तोषके लिये यथाशक्ति लोहा और तिल आदि दान करता है, उसकी एक वर्षतक आप प्रत्येक कष्ट और संकटसे रक्षा करें। सूर्यनन्दन! जब आप कुण्डलीमें पीडाकारक स्थानमें स्थित हों, उस समय जो भक्तिपूर्वक आपके दिवसमें तिल, लोह आदि दान करके विधिवत् शान्तिकर्म और पूजा करे, उसकी साढ़े सात वर्षोंतक आप सदा रक्षा करते रहें, यही मेरे लिये आप वरदान दें।<br>सूतजी कहते हैं—तब शनैश्चरदेवने 'तथास्तु' कहकर राजाकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वे मौन हो गये। तभीसे राजा दशरथकी बात मानकर शनैश्चरदेव कभी रोहिणीमण्डलका भेदन नहीं करते हैं। इस समाचारको सुनकर इन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए और राजा दशरथसे मिलकर आदरपूर्वक बोले—'राजन्! तुमने यह बड़ा अद्भुत पराक्रम किया है, दूसरा कोई तो इस बातकी कल्पना भी अपने मनमें नहीं ला सकता। अतः इस पुरुषार्थसे मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो कोई अभिलाषा हो उसके अनुसार मुझसे वर माँगो।'<br>राजा बोले—सुरश्रेष्ठ! आपके साथ सदा मेरी मैत्री बनी रहे। यही प्रार्थना करता हूँ।<br>इन्द्रने कहा—राजेन्द्र! ऐसा ही होगा। तुम्हारे साथ मेरी सदैव शाश्वत मैत्री बनी रहेगी। ठीक वैसी ही, जैसी वसु देवताकी मैत्री है। तुम सदैव सन्ध्याके समय मेरे पास आते रहना, जिससे | सदैव आपसका मैत्रीभाव बढ़ता रहे।<br>ऐसा कहकर देवराज इन्द्र स्वर्गलोकमें चले गये। राजा दशरथ भी शनैश्चरके भयसे सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करके हर्षपूर्वक अयोध्यापुरीके भीतर अपने भवनमें लौट आये। तबसे प्रायः नित्य ही सायंकालकी उपासना करके राजा दशरथ इन्द्रलोकको चले जाते थे। वहाँपर देवर्षियोंके मुखसे विचित्र अर्थवाली कथाएँ सुनकर और स्वयं भी कहकर अपने घर लौट आते थे। एक समय इन्द्रसे प्रेरित होकर महाराज दशरथने महर्षि वसिष्ठके द्वारा पुत्रके लिये पुत्रेष्टि नामक यज्ञ कराया। तदनन्तर बड़ी रानी कौशल्याने परम धर्मात्मा पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको जन्म दिया। राजाकी सबसे छोटी रानी कैकेयीने भरत नामक पुत्र उत्पन्न किया और मझली रानी सुमित्राने दो महाबली पुत्रोंको जन्म दिया। जिनके नाम लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे। इनके सिवा सुमित्रासे एक सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई, जिसे पुत्रहीन राजा लोमपादको दत्तक पुत्रीके रूपमें दे दिया गया। इस प्रकार पितरोंसे उऋण होकर कृतकृत्य हो राजा दशरथने स्वर्गलोककी यात्रा की। उनके बाद श्रीरामचन्द्रजी चक्रवर्ती राजा हुए, जिन्होंने देवताओंके लिये कण्टकरूप दुर्धर्ष रावणका वध किया और हाटकेश्वरक्षेत्रमें रामेश्वर एवं लक्ष्मणेश्वरकी स्थापना करके मूर्तिमती सीतादेवीको भी प्रतिष्ठित किया था। |
श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणका त्याग, लक्ष्मणका परमधाम-गमन, श्रीरामका किष्किन्धा, लंका एवं हाटकेश्वरतीर्थमें जाना और रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर एवं सीता आदिकी प्रतिमा स्थापित करना
| सूतजी कहते हैं—महर्षियो! कमलनयन भगवान् श्रीरामचन्द्रजी लोकापवादके कारण सीताजीका परित्याग करके अयोध्याका राज्य करने लगे। उन्होंने दूसरी किसी स्त्रीको पत्नीरूपमें किसी तरह भी स्वीकार नहीं किया। यज्ञकार्यकी | सिद्धिके लिये भी पत्नीके स्थानपर सीतादेवीकी स्वर्णमयी प्रतिमाको ही बिठाया। श्रीरामने ग्यारह हजार वर्षोंतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए निष्कण्टक राज्य किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीके भवनमें एक देवदूत आया और बोला—'भगवन् ! |
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- संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मुझे इन्द्रने भेजा है, अतः आप मुझसे एकान्तमें मिलिये।' तब भगवान् श्रीरामने एकान्तमें जाकर लक्ष्मणजीसे कहा—'लक्ष्मण! मैं जबतक इस देवदूतके साथ बैठकर वार्तालाप करूँ, तबतक कोई यहाँ न आवे। यदि कोई आवेगा तो उसे मृत्यु-दण्ड दिया जायगा। अतः तुम राजद्वारपर उपस्थित रहकर इस बातकी ओर दृष्टि रखो कि कोई आ न जाय और किसीके लिये वधका प्रसंग न उपस्थित हो जाय।'
लक्ष्मणने 'बहुत अच्छा' कहकर आज्ञा स्वीकार की और वे स्वयं राजद्वारपर खड़े होकर पहरा देने लगे। उधर देवदूतने श्रीरामके साथ वार्तालाप प्रारम्भ किया। इन्द्र तथा अन्य स्वर्गवासियोंका सन्देश सुनाते हुए उसने इस प्रकार कहा—'महाभाग! आपने रावणका विनाश करनेके लिये ही भूतलपर अवतार धारण किया था। वह दुष्ट मारा गया, त्रिभुवनका कण्टक दूर हुआ। आपने इस समय देवताओंका सब कार्य पूर्ण कर दिया। अब यदि आपकी रुचि हो तो मर्त्यलोक त्यागकर दिव्यलोकमें पधारिये।'
इसी समय मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा वहाँ आये और लक्ष्मणजीसे पूछने लगे—'श्रीरघुनाथजी कहाँ हैं?' लक्ष्मण बोले—'विप्रवर! मुझपर दया करके थोड़ी देर यहीं ठहर जाइये। महाराज किसी देवकार्यसे एकान्तमें बातचीतमें लगे हुए हैं।'
दुर्वासा बोले—यदि अभी मुझे राजा श्रीरामचन्द्रजी दर्शन नहीं देंगे तो मैं समस्त रघुकुलको शाप देकर भस्म कर डालूँगा।
यह सुनकर लक्ष्मणजीने मन-ही-मन दुःखी होकर कुछ विचार किया और स्वयं श्रीरामचन्द्रजीके समीप जाकर हाथ जोड़ साष्टांग प्रणाम करके कहा—'देव! मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा दर्शनके लिये राजद्वारपर खड़े हैं। उनके लिये क्या आज्ञा है?' लक्ष्मणजीका वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने देवदूतसे कहा—'तुम देवराजके पास जाकर यह कह देना कि मैं एक वर्षके अंदर ही आपके समीप आ जाऊँगा।' दूतसे ऐसा कहकर भगवान्ने लक्ष्मणसे कहा—'वत्स! दुर्वासा मुनिको शीघ्र भीतर ले आओ।' तत्पश्चात् मुनिके आते ही श्रीरामने मुनिको अर्घ्य दे प्रणाम किया और हर्षयुक्त वाणीमें कहा—'मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है, मैं धन्य और अनुगृहीत हूँ, जो कि आप मेरे घर पधारे हैं।'
दुर्वासाने कहा—रघुनन्दन! मैं उपवास-पूर्वक चातुर्मास्य व्रत करके आज भोजन करनेके लिये आपके घर आया हूँ, अतः मुझे शीघ्र भोजन दीजिये।
तब श्रीरामचन्द्रजीने मिष्ठान्न आदिसे मुनिको यथेष्ट भोजन कराकर तृप्त किया। इस प्रकार भोजन करके आशीर्वाद दे दुर्वासा मुनि चले गये। तब लक्ष्मणने भगवान् श्रीरामसे कहा—'प्रभो! अब मुझे मृत्युदण्ड मिलना चाहिये।' यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी अपनी प्रतिज्ञाका स्मरण करके दुःखी हो गये। तब लक्ष्मणने कहा—'प्रभो! अपने वचनको बिना किसी हिचकके सत्य कर दिखाना, यही राजाओंका परम धर्म है।' लक्ष्मणकी बात सुनकर श्रीरामके नेत्रोंमें आँसू भर आये। उन्होंने धर्मशास्त्रके जाननेवाले मन्त्रियोंसे बहुत देरतक सलाह ली और अन्तमें लक्ष्मणजीसे कहा—'सुमित्रानन्दन! आज मैंने तुम्हें त्याग दिया। तुम शीघ्र दूसरे देशको चले जाओ। साधुपुरुषोंका त्याग अथवा वध दोनों बराबर है।'
तत्पश्चात् लक्ष्मणजी अपने घरमें माता, पत्नी, पुत्र या सुहृद् किसीके साथ सम्मति न करके सरयूके तटपर चले गये। वहाँ सरयूजलमें स्नान करके तटपर एकान्त स्थानमें बैठ गये और पद्मासन लगाकर उन्होंने अपने आत्माको परमात्मामें लीन करके ब्रह्मरन्ध्रसे अपने तेजोमय प्राणका परित्याग कर दिया। श्रीरामचन्द्रजीने जब यह समाचार सुना, तब वे अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे। वे मन्त्रियों और सुहृज्जनोंको साथ लेकर स्वयं उस स्थानपर गये और करुणस्वरमें 'हा वत्स!' कहकर फूट-फूटकर रोने लगे।
- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११२५
उस समय लक्ष्मणजीका कलेवर अदृश्य हो गया और फूलोंकी वर्षाके साथ आकाशवाणी हुई—'महाभाग राम! आप शोक न करें। ब्रह्मज्ञानसे संयुक्त लक्ष्मणजी सर्वसंन्यास करके परम धामको पधार गये हैं।'
आकाशवाणीकी यह बात सुनकर मन्त्रियोंने कहा—महाराज! ये लक्ष्मण परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। अतः अब अपने घरको लौटिये। राजकार्यकी चिन्ता कीजिये और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे पूछकर अपने स्नेहके अनुरूप उनका पारलौकिक कृत्य (श्राद्ध-पिण्डदान आदि) कीजिये।
श्रीरामचन्द्रजी बोले—मैं लक्ष्मणके बिना अब घरको नहीं लौटूँगा। यदि आपलोगोंकी रुचि हो तो मेरे प्रिय पुत्र कुशको राजसिंहासनपर बिठाइये।
ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजीने परम धाम पधारनेका विचार किया। उस समय उन्हें अपने मित्र विभीषणका स्मरण हो आया। वे सोचने लगे—'मैंने विभीषणको, जबतक सूर्य और चन्द्रमाकी सत्ता रहेगी तबतकके लिये लंकाका अक्षय राज्य दिया है। परंतु इस पृथ्वीपर पुनः वरदानसे पुष्ट हुए अतिशय क्रूर राक्षसोंका संयोग हो सकता है। अतः मैं विभीषणके समीप जाकर उसे शिक्षा दूँगा, जिससे वे देवताओंसे द्वेष न करें। इसी प्रकार महाभाग सुग्रीव नामक वानर भी मेरे परम मित्र हैं। जाम्बवान्, बालिपुत्र अंगद, पवनसुत हनुमान्, कुमुद तथा तार आदि अन्य वानर भी मेरे परम सुहृद् हैं। इन सब लोगोंसे बातचीत करके विदा लेकर मैं परम धामको जाऊँगा।' ऐसा निश्चय करके भगवान् श्रीरामने पुष्पक विमानको बुलाया और उसपर चढ़कर किष्किन्धापुरीको प्रस्थान किया। किष्किन्धानिवासी वानर पुष्पक विमानका प्रकाश देखकर श्रीरामचन्द्रजीका आगमन जान शीघ्र उनके सामने गये और दूरसे ही धरतीपर घुटने टेककर प्रणाम करके इधर-उधर बार-बार जय-जयकार करने लगे। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीको साथ लेकर सबने सुन्दर ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित महापुरी किष्किन्धामें प्रवेश किया। इसके बाद विमानसे उतरकर श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही सुग्रीवके भवनमें गये। वहाँ वानरोंने अर्घ्य आदिसे श्रीरघुनाथजीका पूजन किया और उनसे पूछा—'रघुनन्दन! घरपर कुशल तो है न? सदा आपके साथ रहनेवाले छोटे भैया लक्ष्मणजी कहाँ हैं? प्राणोंके समान प्रिया सीतादेवीजी कहाँ हैं?'
वानरोंका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार सीता और लक्ष्मणजीका परित्याग हुआ था, वह सब समाचार कह सुनाया। यह सुनकर सुग्रीव आदि सब वानर अत्यन्त दुःखसे आतुर होकर फूट-फूटकर रोने लगे और श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार बोले—'राजन्! हमलोगोंसे आपका जो कार्य यहाँ सिद्ध होनेवाला हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये। इस भूतलपर हम सभी वानर धन्य हैं, जिनके प्रति ऐसा स्नेह रखकर आप स्वयं हमारे घर पधारे हैं।'
श्रीराम बोले—सुग्रीव! तुम्हारे यहाँ एक रात रहकर मैं जहाँ लंकामें विभीषण हैं, वहाँ जाऊँगा। अपने प्रधान मन्त्रीसहित तुम्हें भी मेरे साथ विभीषणके घरतक चलना चाहिये।
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार समस्त श्रेष्ठ वानरोंने भक्तिपूर्वक सेवित हो श्रीरघुनाथजीने किष्किन्धापुरीमें रातभर निवास किया। फिर प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर आवश्यक कृत्योंसे निवृत्त हो रघुनाथजी पुष्पक विमानको बुलाकर दस वानरोंके साथ उसपर आरूढ़ हुए। उन दसों वानरोंके नाम इस प्रकार हैं—सुग्रीव, सुषेण, तार, कुमुद, अंगद, कुन्दु, हनुमान्, गवाक्ष, नल तथा जाम्बवान्। तदनन्तर उस उत्तम विमानके द्वारा वे लंकापुरीकी ओर प्रस्थित हुए और जहाँ पहले राक्षसोंसे युद्ध हुआ था, उन प्रदेशोंको दिखाते हुए तत्काल ही महापुरी लंकामें जा पहुँचे। पुष्पकका प्रकाश देखते ही विभीषणजीको यह ज्ञात हो गया कि श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं। अतः वे प्रसन्नतापूर्वक अपने समस्त मन्त्रियों, सेवकों
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और पुत्रोंके साथ उनके सामने आये और दूरसे ही जय-जयकार करते हुए उन्होंने धरतीपर लेटकर साष्टांग प्रणाम किया। विमानसे उतरकर श्रीरघुनाथजीने विभीषणको आदरपूर्वक हृदयसे लगाया और उन्हींके साथ लंकापुरीमें प्रवेश किया। फिर विभीषणके महलमें पहुँचकर वानरों-द्वारा सब ओरसे घिरे हुए श्रीरामचन्द्रजी शुभ सिंहासनपर विराजमान हुए। तत्पश्चात् विभीषणने अपना राज्य, पुत्र, कलत्र आदि समस्त वैभव श्रीरघुनाथजीके चरणोंमें समर्पित कर दिया और सामने हाथ जोड़ खड़े हो इस प्रकार कहा—'प्रभो! आज्ञा दीजिये, मैं कौन-सी सेवा करूँ। भगवन्! आप अकस्मात् कैसे आ गये? आपके साथ लक्ष्मण और जानकीजी क्यों नहीं आयीं?'
तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणसे सब समाचार बताया और उनके हितके लिये इस प्रकार कहा—राक्षसराज! इस समय मैं राज्य त्यागकर अपने परम धामको, जहाँ लक्ष्मणजी गये हैं, शीघ्र जाऊँगा। उनके बिना अब इस मर्त्यलोकमें दो घड़ी भी ठहरनेका मेरे मनमें उत्साह नहीं है। इस समय मैं तुम्हें शिक्षा देनेके लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ। तुम शान्तचित्त होकर मेरी बात सुनो। यह राज्यलक्ष्मी स्वल्पबुद्धिवाले पुरुषोंके मनमें मदिराकी भाँति मद उत्पन्न कर देती है। अतः तुम्हें अपने हृदयमें इस मदको स्थान नहीं देना चाहिये। इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओंका तुम्हें आदर और पूजन करना चाहिये, जिससे तुम्हारा राज्य सदा सुस्थिर रहे और मेरा वचन भी सत्य हो। इसीलिये मैं यहाँ आया हूँ। यदि कोई मनुष्य किसी प्रकार यहाँ आ जाय तो समस्त निशाचरोंको प्रसन्न होकर उसका सत्कार ही करना चाहिये। विभीषण! तुम्हें अपने समस्त निशाचरोंको मना कर देना चाहिये कि वे मेरे सेतुका उल्लंघन करके भारतवर्षकी भूमिमें न जायें।
विभीषणने कहा—प्रभो! ऐसा ही करूँगा, निःसन्देह आपकी आज्ञाका पालन किया जायगा। परंतु जब आप मर्त्यलोकको छोड़कर पधार जाते हैं, तब मैं भी यहाँ जीवित न रहूँगा। अतः मुझे भी वहीं अपने साथ ले चलिये।
श्रीरामने कहा—राक्षसराज! मैंने तुम्हें अविनाशी राज्य दिया है। अतः किसी प्रकार मुझे मिथ्यावादी न करो। मैं यहाँ सेतुमें कीर्तिके लिये तीन शिवलिंगोंकी स्थापना करूँगा। उन तीनोंकी तुम्हें सदैव पूजा करनी चाहिये।
विभीषणसे इस प्रकार कहकर वानरोंसहित श्रीराम दस रात्रिपर्यन्त वहीं लंकामें टिके रहे। ग्यारहवें दिन विमानपर बैठकर उन्होंने अपनी पुरीको प्रस्थान किया और विभीषण एवं वानरोंके साथ मार्गमें उतरकर आपने सेतुके आदि, मध्य और अन्तमें श्रद्धापूर्वक तीन रामेश्वरोंकी स्थापना की। तत्पश्चात् जब वे अपने घरकी ओर चले, उस समय विभीषणने बार-बार प्रणाम करके कहा—'भगवन्! इस सेतुमार्गसे कौतुकवश तथा श्रद्धासे बहुतेरे मनुष्य रामेश्वरजीका दर्शन करनेके लिये आवेंगे, राक्षसोंकी जाति अत्यन्त क्रूर मानी गयी है, मनुष्यको आते देखकर उनके मनमें उसे खा जानेकी इच्छा पैदा हो जाती है। अतः यदि कोई राक्षस किसी मनुष्यको खा लेगा तो निश्चय ही मेरे द्वारा आपकी आज्ञाका उल्लंघन हो जायगा। इसलिये आप कोई ऐसा उपाय सोचें, जिससे मुझे आज्ञाभंगका दोष न लगे।'
विभीषणका यह वचन सुनकर भगवान् श्रीरामने कहा—'बहुत अच्छा।' तत्पश्चात् उन्होंने अपना धनुष चढ़ाया और अपने तीखे बाणोंसे सेतुके दस योजन विस्तृत मध्यभागको खण्डित कर दिया। इस प्रकार सेतुमार्गसे लंकामें जाना असम्भव करके उन्होंने वानरों और राक्षसोंके साथ अयोध्यापुरीको प्रस्थान किया।
इस प्रकार अपने नगरको प्रस्थान करते समय मार्गमें आकाशके पथसे जाता हुआ पुष्पक विमान सहसा अचल हो गया। यह देख श्रीरामचन्द्रजीने हनुमान्जीसे कहा—'वायुनन्दन! तुम भूमिपर जाकर पता लगाओ कि क्या कारण है, जिससे पुष्पक विमान आकाशमें रुक गया?' हनुमान्जी
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'बहुत अच्छा' कहकर शीघ्र ही धरतीपर उतरे और पुनः लौटकर भगवान्को प्रणाम करके बोले—'भगवन्! यहाँ नीचे परम कल्याणमय हाटकेश्वरक्षेत्र है। वहाँ संसारकी सृष्टि करनेवाले साक्षात् ब्रह्माजी विराजमान हैं। यही कारण है कि पुष्पक विमान उन्हें लाँघकर आगे नहीं बढ़ता है।' हनुमान्जीकी यह बात सुनकर श्रीरघुनाथजीने विमानको उस क्षेत्रमें उतरनेकी आज्ञा दी। तदनन्तर वे स्वयं विमानसे उतरे और समस्त वानरों तथा राक्षसोंके साथ उस क्षेत्रमें सब ओर घूम-घूमकर तीर्थोंका दर्शन करने लगे। वहाँपर उन्होंने अपने पितामह राजा अजके द्वारा स्थापित की हुई चामुण्डादेवीके दर्शन किये और समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले कुण्डमें स्नान करके अपने पिता राजा दशरथद्वारा स्थापित अपने स्वरूपभूत चार भुजाधारी श्रीविष्णु भगवान्का दर्शन किया। वहाँ राजवापीमें स्नान करके शुद्ध हो देवताओं और पितरोंका तर्पण कर उन्होंने मन-ही-मन यह विचार किया कि 'इस परम पुण्यदायक क्षेत्रमें मैं भी शिवलिंगकी स्थापना करूँ, जैसे कि पिताजीने श्रीविष्णु भगवान्की स्थापना की है। इसके सिवा मेरे प्रिय भाई लक्ष्मण दिव्य लोकमें चले गये हैं, अतः उनके नामसे भी एक शिवलिंगकी स्थापना करूँ। साथ ही अपनी सीतादेवीकी तथा लक्ष्मणकी भी प्रस्तरमयी प्रतिमा इस पवित्र क्षेत्रमें स्थापित करूँ।'
ऐसा विचार करके श्रीरामचन्द्रजीने पाँच मन्दिर बनवाये और उन सबमें पूर्वोक्त विग्रहोंको स्थापित किया। तत्पश्चात् सब वानरों तथा राक्षसोंने भी अपने-अपने नामसे पृथक्-पृथक् शिवलिंगोंको स्थापित किया। उसके बाद श्रेष्ठ पुष्पकविमानपर बैठकर सब-के-सब अयोध्यापुरीको गये।
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! श्रीरामचन्द्रजीने जिस प्रकार उस कल्याणमय तीर्थमें रामेश्वर और लक्ष्मणेश्वर आदिकी स्थापना की, वह सब प्रसंग मैंने आपलोगोंसे कह सुनाया। जो प्रातःकाल उठकर रामेश्वर और लक्ष्मणेश्वरका दर्शन करता है, वह इस तीर्थमें सम्पूर्ण रामायणके श्रवणसे होनेवाले फलको पाता है। जो अष्टमी और चतुर्दशीको रामेश्वरजीके आगे रामचरितका पाठ करता है, वह अश्वमेध यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।
चित्रशर्मा तथा अन्यान्य ब्राह्मणोंके द्वारा भगवान् शंकरको सन्तुष्ट करके हाटकेश्वर आदि सभी क्षेत्रोंके देवताओंकी चमत्कारपुरमें स्थापना
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! पूर्वकालमें चमत्कारपुरके भीतर एक श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, जिनका जन्म वत्सकुलमें हुआ था। उनका नाम चित्रशर्मा था। चित्रशर्मा बड़े यशस्वी थे। एक दिन उनके मनमें यह बात पैदा हुई कि 'मैं पातालसे हाटकेश्वरजीको यहाँ लाकर भक्तिपूर्वक दिन-रात उनका पूजन करूँ।' ऐसा निश्चय करके वे नियमपूर्वक रहते और नियमित भोजन करते हुए बड़ी निष्ठाके साथ तपस्या करने लगे। दीर्घकालतक तपस्या करनेके पश्चात् भगवान् शंकर प्रसन्न हुए और आदरपूर्वक बोले—'विप्रवर! तुम्हारा जो मनोरथ हो, उसके अनुसार वर माँगो।'
चित्रशर्मा बोले—देव! आप पातालसे हाटकेश्वरलिंगके रूपमें यहाँ पधारें।
भगवान् शिव बोले—द्विजश्रेष्ठ! मेरा लिंगमय विग्रह सर्वत्र अचल होता है, तुम हाटक (सुवर्ण)-के द्वारा निर्मित दूसरे शिवलिंगकी स्थापना करो। वही संसारमें हाटकेश्वरके नामसे विख्यात होगा। जो शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको सोमवारके दिन श्रद्धापूर्वक भक्तियुक्त चित्तसे उस लिंगकी पूजा करेगा, उसे आदिहाटकेश्वरकी पूजासे होनेवाले कल्याणमय फलकी प्राप्ति होगी। ऐसा कहकर
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भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। चित्रशर्माने भी मनोहर मन्दिरका निर्माण करके भक्तिभावसे शास्त्रोक्त विधिके अनुसार उसमें स्वर्णमय लिंग स्थापित किया और उसीकी पूजा प्रारम्भ की। वहाँ उस लिंगकी तीनों लोकोंमें ख्याति फैल गयी। दूर-दूरसे लोग आकर उस उत्तम लिंगकी पूजा करने लगे। यह देखकर दूसरे ब्राह्मणोंने यह विचार किया कि 'हमलोग भी भगवान् सदाशिवको आराधनाद्वारा सन्तुष्ट करें। शूलपाणि शिवके अड़सठ क्षेत्र बताये गये हैं, जहाँ ये परमेश्वर तीनों कालमें निवास करते हैं। हम सब लोग प्रयत्न करें तो उन सभी क्षेत्रोंका समूह यहाँ आ जायगा।' तदनन्तर जितने श्रेष्ठ ब्राह्मण थे, उन सबने दुष्कर तपस्या प्रारम्भ की। सहस्रों वर्ष आराधना करनेपर भी जब उन्हें कोई फल नहीं प्राप्त हुआ तब वे सभी ब्राह्मण क्षुब्ध हो उठे और बोले—'हम बाल्यावस्थासे ही भगवान् शंकरजीकी आराधना करते हुए वृद्ध हो गये, परंतु हमें अबतक परमेश्वर शिवका दर्शन नहीं हुआ, इसलिये अब हम सब लोगोंको अग्निमें प्रवेश कर जाना चाहिये।' ऐसा निश्चय करके उन सबने अग्नि प्रज्वलित की और एकाग्रचित्त होकर वे पुत्रोंके साथ ज्यों ही उसमें प्रवेश करने लगे त्यों ही भगवान् शंकरने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिया और हँसकर कहा—'द्विजवरो! ऐसा दुःसाहस न करो। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो उसे माँगो।'
ब्राह्मण बोले—सुरश्रेष्ठ ! आपके जो अड़सठ क्षेत्र परम धन्य कहे जाते हैं और आदिशिवलिंगोंकी स्थितिके कारण जिन्हें परम पूजनीय माना जाता है, वे सभी क्षेत्र यहाँ प्रतिष्ठित हों।
यह सुनकर भगवान् शंकरने सोचा 'मेरे मनमें भी सदा यह कार्य करनेका विचार होता है कि मैं अपने सभी क्षेत्रोंको किसी एक स्थानपर एकत्र करूँ, क्योंकि कलिकाल बड़ा भयंकर होगा। उस समय पृथ्वीपर प्रायः जितने तीर्थ और क्षेत्र हैं, सब नष्ट हो जायेंगे।' ऐसा विचारकर भगवान् शंकरने उन सभी ब्राह्मणोंसे कहा—'विप्रवरो! तुमलोग मन्दिर बनवाओ और उसमें अपने-अपने गोत्रको आगे रखकर उत्तम शिवलिंग स्थापित करो, जिससे उन शिवलिंगोंमें मैं संक्रमण कर सकूँ।' तब उन सभी ब्राह्मणोंने हर्षमें भरकर मनोहर भूमिभागोंको देखकर वहाँ कैलासशिखरके समान उच्च और दिव्य अड़सठ मन्दिर बनवाये तथा उन मन्दिरोंमें भाँति-भाँतिके उत्तम शिवलिंगोंकी स्थापना की और विभिन्न क्षेत्रोंमें जो-जो नाम प्रसिद्ध हैं उनके वही-वही नाम रखे।
इस प्रकार समस्त क्षेत्र और शिवमन्दिर वहाँ सदैव निवास करते हैं।
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अड़सठ क्षेत्रों और उनमें भी प्रधान आठ क्षेत्रोंके नाम तथा उनके कीर्तनका महत्त्व
| पार्वतीजीने भगवान् शंकरसे पूछा—प्रभो! आप किन-किन तीर्थोंमें किन-किन नामोंसे कीर्तन करनेयोग्य हैं? यह सब पूर्णरूपसे बतावें।<br><br>भगवान् शिवने कहा—देवि! १ काशीमें महादेव (विश्वनाथ), २ प्रयागमें महेश्वर, ३ नैमिषारण्यमें देवदेव, ४ गयामें प्रपितामह (ब्रह्मा), ५ कुरुक्षेत्रमें स्थाणु, ६ प्रभासमें शशिशेखर, ७ पुष्करमें अजागन्धि, ८ विश्वेश्वरमें विश्व, ९ अट्टहासमें महानाद, १० महेन्द्रमें महाव्रत, | ११ उज्जयिनीमें महाकाल, १२ मरुकोटमें महोत्कट, १३ शंकुकर्णमें महातेज, १४ गोकर्णमें महाबल, १५ रुद्रकोटिमें महायोग, १६ स्थलेश्वरमें महालिंग, १७ हर्षितमें हर्ष, १८ वृषभध्वजमें वृषभ, १९ केदारमें ईशान, २० मध्यमकेश्वरमें शर्व, २१ सुपर्णमें सहस्रांशु, २२ कार्तिकेस्वरमें सुसूक्ष्म, २३ वस्त्रापथमें भव, २४ कनखलमें उग्र, २५ भद्रकर्णमें शिव, २६ दण्डकमें दण्डिन्, २७ त्रिदण्डामें ऊर्ध्वरेत, २८ कृमिजांगलमें चण्डीश, |
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२९ एकाग्रमें कृत्तिवास, ३० छागलेयमें कपर्दी, ३१ कालिंजरमें नीलकण्ठ, ३२ मण्डलेश्वरमें श्रीकण्ठ, ३३ काश्मीरमें विजय, ३४ मरुकेश्वरमें जयन्त, ३५ हरिश्चन्द्रमें हर, ३६ पुरश्चन्द्रमें शंकर, ३७ वामेश्वरमें जटि, ३८ कुक्कुटेश्वरमें सौम्य, ३९ भस्मगात्रमें भूतेश्वर, ४० अमरकण्टकमें ॐकार, ४१ त्रिसन्ध्यामें त्र्यम्बक, ४२ विरजामें त्रिलोचन, ४३ अर्केश्वरमें दीप्त, ४४ नेपालमें पशुपति, ४५ दुष्कर्णमें यमलिंग, ४६ करवीरमें कपाली, ४७ जलेश्वरमें त्रिशूली, ४८ श्रीशैलमें त्रिपुरान्तक, ४९ अयोध्यामें नागेश्वर, ५० पातालमें हाटकेश्वर, ५१ कारोणमें नकुलीश, ५२ देविकामें उमापति, ५३ भैरवमें भैरवाकार, ५४ पूर्वसागरमें अमर, ५५ सप्तगोदावरीतीर्थमें भीम, ५६ निर्मलेश्वरमें स्वयम्भू, ५७ कर्णिकारमें गणाध्यक्ष, ५८ कैलाशमें गणाधिप, ५९ गंगाद्वारमें हिमस्थान, ६० जललिंगमें जलप्रिय, ६१ वडवाग्निमें अनल, ६२ बदरिकाश्रममें भीम, ६३ श्रेष्ठस्थानमें कोटीश्वर, ६४ विन्ध्याचलमें वाराह, ६५ हेमकूटमें विरूपाक्ष, ६६ गन्धमादनमें भूर्भुव, ६७ लिंगेश्वरमें वरद तथा ६८ लंकामें नरान्तकका कीर्तन करना चाहिये।
देवि! इस प्रकार यहाँ अड़सठ क्षेत्रोंमें प्रसिद्ध नामोंका मैंने तुमसे वर्णन किया है। ये पढ़ने और सुननेवालोंके सब पातकोंका नाश करनेवाले हैं। अतः बुद्धिमान् पुरुषोंको विशेषतः शिवकी दीक्षा लेनेवाले पवित्रजनोंको तीनों कालोंमें इन सब नामोंका प्रयत्नपूर्वक कीर्तन करना चाहिये। जिस घरमें ये अड़सठ नाम लिखे हुए रखे रहते हैं, वहाँ भूत, प्रेत, रोग, व्याधि, सर्प, चोर तथा राजा आदिकी कभी कोई बाधा उपस्थित नहीं होती है।
देवि! इन सब तीर्थोंमें आठ बहुत उत्तम हैं। जिनमें स्नान करनेवाला मनुष्य सब तीर्थोंमें स्नानका फल प्राप्त करता है। नैमिषारण्य, केदार, पुष्कर, कुरुजांगल, काशी, कुरुक्षेत्र, प्रभास तथा हाटकेश्वर—इन आठ तीर्थोंमें जिसने श्रद्धापूर्वक स्नान किया है, उसने सब तीर्थोंमें स्नान कर लिया।
पार्वतीजीने पूछा—महादेव! कलिकालमें मनुष्य किसी प्रकार इन सब क्षेत्रोंमें स्नान करनेमें समर्थ न हो सकेंगे। अतः इन आठों तीर्थोंका भी जो सारभूत तीर्थ हो, उसका वर्णन कीजिये।
महादेवजी बोले—देवेश्वरि! इन आठोंमें भी सबसे उत्तम हाटकेश्वरक्षेत्र है, जहाँ मेरी आज्ञासे सब क्षेत्र निवास करते हैं। अन्य जितने तीर्थ हैं, वे भी कलिकाल आनेपर यहीं स्थित होते हैं। अतः मोक्षकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको सब प्रकारसे यत्न करके इसी क्षेत्रका सेवन करना चाहिये।
सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! इस प्रकार मैंने आप लोगोंसे अड़सठ क्षेत्रोंका उनके नाम और देवताओंसहित वर्णन किया है, जैसा कि महादेवजीने पार्वतीजीसे किया था। जो श्रद्धापूर्वक इन सबके नामोंका पठन और कीर्तन करता है, वह उनमें स्नान करनेका पुण्य प्राप्त कर लेता है।
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भगवान् शिवके दिये हुए मन्त्रद्वारा नागरब्राह्मणोंपर आये हुए सर्पोंके उपद्रवका निवारण
सूतजी कहते हैं—कुछ कालके अनन्तर चमत्कारपुरमें मौद्गल्यवंशमें देवरात नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण हुए। उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम क्रथ रखा गया। क्रथ युवावस्थामें पहुँचनेपर बड़ा उद्दण्ड निकला, उसे अपने पुरुषार्थका सदैव बड़ा गर्व रहता था। एक समय वह वनमें घूमता हुआ श्रावण शुक्ला पंचमीको नागतीर्थमें गया। वहाँ उसने नागराजके अत्यन्त तेजस्वी पुत्र रुद्रमालको देखा, जो अपनी माताके साथ वहाँ आया था। क्रथने सर्पके उस छोटे-से
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बच्चेको साधारण जलसर्प समझा और उसे डंडेसे मार डाला। मारे जाते समय उस सर्पबालकने बड़ा आर्तनाद किया—'हा माता! हा तात! मैं निरपराध मारा गया।' साँपके मुखसे मनुष्योंका-सा यह शब्द सुनकर क्रथ भयसे थर्रा उठा और शीघ्र ही घर भाग गया। तदनन्तर नागमाता जब जलाशयसे बाहर निकली, तब उसने तीरपर अपने पुत्रको मरा हुआ देखा। लाठीके प्रहारसे उसके सारे अंग फटकर लहूलुहान हो रहे थे। पुत्रकी ऐसी दशा देखकर माता मूर्च्छित हो गयी। फिर सचेत होनेपर शोकके कारण उसने बहुत देरतक विलाप किया। तदनन्तर नागिन उस मरे हुए पुत्रको लेकर नागराजके समीप गयी। वे भी अपने पुत्रको मरा हुआ देखकर शोकसे व्याकुल हो गये। उस समय नागराजके दुःखसे दुःखी हो समस्त नाग वहाँ एकत्र हो गये। सबने प्राचीन कथाओं और दृष्टान्तोंद्वारा नागराजको समझा-बुझाकर शान्त किया। तत्पश्चात् उन्होंने पुत्रका दाह-संस्कार किया, किंतु जलदानके समय समस्त नागों और सर्पोंसे कहा—'जबतक मेरे पुत्रका विनाश करनेवाले उस दुष्ट पुरुषको स्त्री, पुत्र एवं भृत्योंसहित नष्ट नहीं कर दिया जायगा, तबतक मैं अपने पुत्रको जलांजलि नहीं दूँगा।'
ऐसा कहकर नागराजने उस पापात्मा द्विजकी खोज करायी, जिसने डंडेसे उनके पुत्रका वध किया था। उसके बाद उन्होंने पार्श्ववर्ती नागोंसे कहा—'मेरे हितैषियो ! तुम हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाओ और मेरे पुत्रका नाश करनेवाले क्रथको स्त्री-पुत्र और कुटुम्बसहित शीघ्र नष्ट करके समस्त चमत्कारपुरको खा जाओ।' नागराजकी यह आज्ञा पाकर सर्पोंने पहले तो सोते समय देवरातके पुत्रको डँसा। फिर उसके समस्त परिवारको काट खाया। तदनन्तर अन्यान्य बाल, वृद्ध और कुमारोंको भी उन्होंने डँस लिया। चमत्कारपुरमें साँपोंके काटनेसे ब्राह्मणोंके घर-घर दारुण हाहाकार मच गया था। कितने ही मनुष्य घर-द्वार छोड़कर दूरस्थ जंगलोंमें भाग गये। इस प्रकार चमत्कारपुरको सर्पोंने मनुष्योंसे सूना कर दिया। तब नागराज शेषने पुत्रके मारे जानेका दुःख छोड़कर अपने पुत्रको जलदान दिया !
सर्पोंका ऐसा उत्पात होनेपर उनसे डरे हुए बहुत-से ब्राह्मण जो सब दिशाओंमें भाग गये थे, परस्पर मिलकर उस वनमें गये, जहाँ त्रिजात नामक ब्राह्मण तपस्या करता था। वह भगवान् शंकरसे वर पाकर भी बड़ी भारी तपस्यामें संलग्न था। उसने अपनी जन्मभूमिके लोगोंको रोते देख स्वयं भी दुःखका अनुभव किया और उन्हें आश्वासन देते हुए कहा—'ब्राह्मणो ! आज मैं भगवान् शिवसे ऐसी प्रार्थना करूँगा, जिससे उन दुष्टचित्तवाले नागोंका संहार हो जाय।' ऐसा कहकर त्रिजातने परमेश्वर शिवसे प्रार्थना की—'देव ! इस समय मुझे वर दीजिये।' शिवजीने कहा—'शीघ्र माँगो।'
तब त्रिजातने कहा—भगवन् ! नागोंने हमारे समस्त नगरको निर्जन कर दिया है। अतः उन सबका विनाश हो।
भगवान् शिव बोले—ब्रह्मन् ! मैं तुम्हें एक सिद्ध मन्त्र बताऊँगा, जिसके उच्चारणमात्रसे सर्पोंका विष नष्ट हो जाता है। महाभाग ! तुम इन सम्पूर्ण ब्राह्मणोंके साथ वहाँ जाकर उच्च स्वरसे सब ओर इस मन्त्रको सुनाओ। इस मन्त्रको सुनकर जो नीच नाग पाताललोकमें नहीं चले जायँगे, वे विषरहित हो जायँगे। विप्रवर ! गर कहते हैं विषको, जहाँ गर नहीं है, वह नगर है। तुम मेरे प्रसादसे वहाँ 'नगर'-'नगर' का उच्चारण करो। इस शब्दको सुनकर भी जो अधम नाग वहाँ ठहरेंगे, वे सुखपूर्वक मारनेयोग्य हो जायँगे। आजसे वह स्थान इस पृथ्वीपर नगरके नामसे विख्यात होगा और तुम्हारी कीर्तिका विस्तार करेगा। दूसरा कोई भी शुद्ध वंशमें उत्पन्न हुआ जो नागर ब्राह्मण नगरनामक मन्त्रसे तीन बार जलको अभिमन्त्रित करके कालसर्पसे डसे हुए तथा मृत्युके वशमें पड़े हुए
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मनुष्यके मुखमें स्वयं डाल देगा, वह उसे जीवित कर देगा। अन्यत्र रहनेवाला भी जो कोई मनुष्य सोते समय इस तीन अक्षरवाले मन्त्रका सदा स्मरण करेगा, वह सर्पके विषसे मुक्त होगा। अजीर्ण और ज्वरसम्बन्धी रोग भी इस मन्त्रके प्रभावसे तुरंत नष्ट हो जायेंगे।
ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् त्रिजात भी मरनेसे बचे हुए ब्राह्मणोंके साथ चमत्कारपुरमें गया। वहाँ सबने 'नगरम्' 'नगरम्' का उच्चारण करते हुए उस क्षेत्रमें प्रवेश किया, जो घोर एवं क्रूर सर्पोंसे व्याप्त हो रहा था। भगवान् शिवसे प्राप्त हुए उस सिद्ध मन्त्रको सुनकर सब सर्प विष और तेजसे रहित होकर भाग चले। कुछ तो बिमौटमें छिप गये और कितने ही पाताललोकमें भाग गये। बचे-खुचे सर्पोंको वहाँके ब्राह्मणोंने डंडोंसे मार डाला। इस प्रकार सब सर्पोंको उजाड़कर पीडारहित हुए ब्राह्मणोंने त्रिजातको आगे रखकर स्थानीय सब आवश्यक कृत्योंको पूर्ण किया। ब्रह्मर्षियो! इस तरह देवाधिदेव भगवान् शिवकी दयासे कालान्तरमें वह नगर पुनः बसा और 'नगर' नामसे प्रसिद्ध हुआ।
## चमत्कारपुरमें पुनर्वास करनेवाले ब्राह्मणोंकी संख्या
**सूतजी कहते हैं—** ब्रह्मर्षियो! इस प्रकार उस स्थानका उद्धार करके त्रिजातने वहाँ देवाधिदेव भगवान् शिवके लिये एक मन्दिर बनवाया और उसमें त्रिजातेश्वर नामसे उनकी प्रतिष्ठा की। तत्पश्चात् वह श्रद्धापूर्वक दिन-रात भगवान् शिवकी आराधनामें संलग्न रहकर कुछ कालके अनन्तर शरीरसहित शिवलोकको चला गया। उपमन्यु, क्रौंच, कैशोर्य तथा त्रैवण—इन चार गोत्रोंके ब्राह्मण उस नगरमें फिर लौटकर नहीं गये। उन्हींके साथ शुक आदि गोत्र भी सर्पभयसे भाग गया था। वह भी वहाँ नहीं आया। शेष गोत्रोंके ब्राह्मण जो वहाँ रह गये थे, उनका परिचय देता हूँ। कौशिक गोत्रके छब्बीस, कश्यप गोत्रके सत्तासी, लक्ष्मण गोत्रके इक्कीस, भरद्वाज गोत्रके तीन, कुण्डन गोत्रके चौदह, रैतिक गोत्रवाले बीस, पराशर गोत्रके आठ, गर्ग गोत्रके बाईस, हारीत गोत्रके तेईस, और्वभार्गव गोत्रके पच्चीस, गौतम गोत्रके छब्बीस, दाल्भ्य गोत्रके बीस, माण्डव्य गोत्रके तेईस, बह्वृच गोत्रवाले भी तेईस, सांकत्य गोत्रके दस, आंगिरस गोत्रके पाँच, अत्रि तथा शुक्लात्रेय कुलके ब्राह्मण दस-दस, वत्स गोत्रके पाँच, कुत्सगोत्रके सोलह, शाण्डिल्यभार्गवके पाँच, मुद्गल गोत्रके बीस तथा बौधायन और कौशल गोत्रके तीस-तीस ब्राह्मण वहाँ आकर बसे थे। अथर्वकुलके पचपन, मौनसके सतहत्तर, यजुर्वेदी तीस, च्यवन गोत्रके सत्ताईस, अगस्त्य गोत्रके तैंतीस, जैमिनि कुलके दस, नैवृत पचपन, पाठीन सत्तर, गोभिल और काक्व पाँच-पाँच, औशनस और दाशार्ह तीन-तीन, लोकाख्य साठ, ऐणिश, बहत्तर, कापिष्ठल, शार्कर और दत्त—ये सतहत्तर, शार्कव सौ, दार्घ्य सतहत्तर, कात्यायन, अधिष्ठ और वैदिश—ये तीन-तीन, कृष्णात्रेय पाँच, दत्तात्रेय पाँच, नारायण, शौनकेय तथा जाबाल—ये सौ-सौ, गोपाल, जामदग्न्य, शालिहोत्र, कर्णिक, भागुरायण, मातृक तथा त्रैणव आदि—ये भी सौ-सौकी संख्यामें ही क्रमशः वहाँ लौट आये। इन्हीं ब्राह्मणोंके अड़तालीस^१ संस्कार होते हैं, जो पूर्वकालमें ब्रह्माजीके द्वारा बताये गये हैं।
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१. अड़तालीस संस्कारोंके नाम इस प्रकार बताये जाते हैं—१ गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ विष्णुबलि, ५ जातकर्म, ६ नामकरण, ७ उपनिष्क्रामण, ८ अन्नप्राशन, ९ कर्णवेध, १० चौल, ११ अक्षरारम्भ, १२ उपनयन, १३ व्रत,
१९३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
इस प्रकार चौंसठ गोत्रोंके श्रेष्ठ ब्राह्मण महात्मा त्रिजातद्वारा वहाँ लाये गये। वे सब मिलकर लगभग पंद्रह सौ ब्राह्मण एकत्र हुए थे। सभी वहाँ समान भागके उपभोक्ता हुए। सबकी समान स्थिति मानी गयी। क्रमशः सबका वंश बढ़ने लगा और उनके सहस्रों पुत्र, पौत्र, नप्ता, दौहित्र तथा भागिनेयोंसे पुनः सारा नगर भर गया। जो मनुष्य सदा भक्तिभावसे इस चरित्रका पाठ करता है, इस पृथ्वीपर उसकी सन्तानका कभी नाश नहीं होता।
रैवत और क्षेमंकरीद्वारा रैवतेश्वर तथा कात्यायनीकी स्थापना
सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! पूर्वकालमें तक्षक नाग सौराष्ट्र देशके राजाके यहाँ पुत्ररूपमें उत्पन्न हुआ। वहाँ उसका नाम रैवत था। उन्हीं दिनों आनर्तदेशमें राजा प्रभंजन राज्य करते थे। उनका बहुत-से राजाओंके साथ वैर बँध गया था। इसलिये शत्रु उनका देश उजाड़ते और पशुओंको बलपूर्वक हर ले जाते थे। अतः उन शत्रुओंके साथ उनका सदैव युद्ध होता रहता था। उसी समय उनकी धर्मपत्नी प्रियंवदाने ऋतुस्नाता होकर गर्भधारण किया। समयानुसार कमलके समान नेत्रोंवाली एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जिसने रातके अन्धकारमें भी अपनी अंगकान्तिसे सूतिकागृहको प्रकाशित कर दिया था। राजा प्रभंजनने पुत्रकी ही भाँति उस कन्याके जन्मका उत्सव मनाया। सब ओर गीत और वाद्योंकी मधुर ध्वनि छा रही थी। तेरहवें दिन भूपालने ब्राह्मणोंके आगे कन्याका नामकरण-संस्कार किया। उसका नाम क्षेमंकरी हुआ। वह 'यथा नाम तथा गुण' थी। धीरे-धीरे जब कन्या बड़ी हुई, तब वैवाहिक शुभ लग्नमें राजाने सौराष्ट्रनाथ रैवतके साथ उसका विवाह कर दिया। उन दोनों नवदम्पतिसे रेवती नामवाली एक कन्या उत्पन्न हुई, जिसका विवाह बलरामरूपमें अवतीर्ण हुए नागराज शेषके साथ हुआ था। राजा रैवत और क्षेमंकरीसे प्रौढ़ा अवस्था आ जानेपर भी कोई वंशप्रवर्तक पुत्र नहीं हुआ। इसके कारण उन दोनोंके मनमें बड़ा दुःख था। वे अपना सारा राज्य मन्त्रियोंको सौंपकर पुत्रके लिये तप करनेके उद्देश्यसे तपोभूमिमें चले गये। वहाँ विन्ध्याचल पर्वतपर अपने लिये आश्रम बनाकर दोनों एकाग्रचित्तसे रहने लगे और कात्यायनी देवीकी स्थापना करके उनकी आराधनामें संलग्न हो गये। कात्यायनी देवी वही हैं, जिन्होंने कौमार-व्रत धारण करके महिषासुरका वध किया था। देवीने उन दोनोंकी आराधनासे सन्तुष्ट होकर उन्हें एक वंशवर्द्धक पुत्र प्रदान किया, जो क्षेमजितके नामसे प्रसिद्ध हुआ। पुत्र पाकर सौराष्ट्रराज रैवत अपनी राजधानीको लौट आये और उन्होंने बड़े हर्षके साथ उसका लालन-पालन किया। क्षेमजित जब युवावस्थाको प्राप्त हुआ, तब राजाने उसे अपने स्थानपर अभिषिक्त किया और स्वयं वे सब कुछ त्यागकर पत्नीके साथ हाटकेश्वरक्षेत्रमें चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान् शंकरका मनोहर मन्दिर बनवाया और एकाग्रचित्त होकर रैवतेश्वर नामवाले शिवलिंगकी स्थापना की, जो दर्शनमात्रसे समस्त देहधारियोंके पापोंको नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें राजा रैवतने जिन दुर्गादेवीका स्थापन किया था, उन्हींका
१४ समावर्तन, १५ विवाह, १६ उपाकर्म, १७ उत्सर्जन, १८ से २४ तक सात प्रकारके पाकयज्ञ—१ हुत, २ प्रहुत, ३ आहुत, ४ शूलगव, ५ बलिहरण, ६ प्रत्यवरोहण, ७ अष्टका होम, २५ से ३१ तक सात हविर्यज्ञसंस्था—१ अन्वाधान, २ अग्निहोत्र, ३ दर्शपौर्णमास, ४ चातुर्मास्य, ५ आग्रयणेष्टि, ६ निरूढ पशुबन्ध, ७ सौत्रामणि, ३२ से ३८ तक सात सोमयज्ञसंस्था—१ अग्निष्टोम, २ अत्यग्निष्टोम, ३ उक्थ्य, ४ षोडशी, ५ वाजपेय, ६ अतिरात्र, ७ आप्तोर्याम, ३९ वानप्रस्थ, ४० संन्यास, ४१ दया, ४२ अनसूया, ४३ शौच, ४४ अनायास, ४५ मंगल्य, ४६ अकार्पण्य, ४७ अस्पृहा, ४८ अन्त्येष्टि।