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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

११०४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सूतजी कहते हैं— महर्षियो! नन्दिनी अपनी सखियोंसे इस प्रकार बातचीत करके उस व्याघ्रके पास चल दी और जहाँ वह व्याघ्र खड़ा था, वहाँ जा पहुँची।

वहाँ पहुँचकर नन्दिनी बोली—महाव्याघ्र! मैं अपने सत्य और शपथपर स्थित रहकर तुम्हारे पास आ गयी हूँ। अब तुम मेरे मांससे यथेष्ट तृप्तिलाभ करो। सत्यका आश्रय ले प्राणोंका भय छोड़कर पुनः अपने पास आयी हुई नन्दिनीको देखकर वह दुष्टात्मा व्याघ्र भी बड़े भारी वैराग्यको प्राप्त हो गया।

व्याघ्र बोला— सत्यवादिनि! तुम्हारा स्वागत है। सत्यपर स्थित रहनेवाले प्राणियोंका कभी अमंगल नहीं होता। भद्रे! तुमने शपथ खाकर कहा था, मैं आऊँगी, इससे मेरे मनमें यह कौतूहल हो रहा था कि क्या यह सचमुच ऐसा करेगी? परंतु तुमने अपने सत्यकी रक्षा की। महाभागे! मुझ दुरात्मा पापीको उपदेश देकर अनुगृहीत करो, जिससे इहलोक और परलोकमें मेरा कल्याण हो। मेरा ऐसा विश्वास है कि तुम्हें अपने सत्याचरणके प्रभावसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। अतः संक्षेपसे धर्मका सारसर्वस्व मुझे बताओ, जिससे मुझे सत्संगका पूरा-पूरा फल प्राप्त हो।'

नन्दिनी बोली— सत्ययुगमें तपकी, त्रेतामें ध्यानकी, द्वापरमें यज्ञकी और दानकी तथा कलियुगमें एकमात्र दानकी प्रशंसा करते हैं। जो सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंको अभय दान देते हैं, उनका वह दान सब दानोंमें श्रेष्ठ है। उससे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है।^*

व्याघ्र बोला— शुभे! यह अभय दान तो उन प्राणियोंके लिये उपयुक्त हो सकता है, जिनकी जीविका अहिंसासे—अन्न आदिका आहार करके चलती है। हम-जैसे जीवोंका जीवननिर्वाह तो हिंसाके बिना हो ही नहीं सकता। अतः जीवोंकी हिंसा करनेवाले मुझ अधमके लिये भी जो सुखदायक और उत्तम धर्माचरणमें सहायक हो, वैसा उपदेश दो।

नन्दिनीने कहा— यहाँ वनमें एक महान् शिवलिंग है, जिसे पूर्वकालमें बाणासुरने स्थापित किया था। उसीके प्रभावसे आज मैं तुम्हारे संकटसे मुक्त हुई हूँ। तुम प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर उसीकी परिक्रमा और उसीको प्रणाम किया करो। इससे तुम्हें मनोवांछित सिद्धि प्राप्त होगी।

ऐसा कहकर नन्दिनीने व्याघ्रको वनके भीतर ले जाकर उस शिवलिंगका दर्शन कराया। वह उसका दर्शन करके तत्काल ही व्याघ्रकी योनिसे मुक्त हो पूर्ववत् राजा कलशके रूपमें परिणत हो गया। पूर्वकालमें दुर्वासाके दिये हुए शापका और अपने वैभवसम्पन्न राज्यका उन्हें स्मरण हो आया। तब उन श्रेष्ठ राजाने नन्दिनीसे कहा—'भद्रे! मैं हैहयवंशमें उत्पन्न कलश नामक राजा हूँ। पूर्वकालमें मुनिवर दुर्वासाने कुछ कारणवश मुझे शाप दे दिया। जब पुनः मैंने उन्हें प्रसन्न किया तब वे बोले—'नन्दिनी धेनु जब तुम्हें वनमें शिवलिंगका दर्शन करायेगी, तब तुम्हारी मुक्ति हो जायगी। निश्चय तुम नन्दिनी हो, यह बात मुझे अपने शापका अन्त देखकर ज्ञात हुई है। श्रेष्ठ धेनु! यह तो बताओ, यह कौन-सा देश है, जिससे मैं अपने घरका मार्ग ढूँढ़कर पुनः वहाँ जाऊँ।'

नन्दिनी बोली— राजन्! यह सब पापोंका नाश करनेवाला चमत्कारपुर नामक क्षेत्र है, जो सर्वतीर्थमय है और सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है।

राजाने कहा— नन्दिनि! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम जाओ और अपने बालकसे मिलो। गौओंके झुंडमें जाकर अपनी सखियों तथा सुहृदोंका दर्शन करो। मैंने पूर्वकालमें ब्राह्मणोंके मुखसे इस क्षेत्रकी महिमा सुनी थी और इसे सदा देखनेकी


^* तपः कृते प्रशंसन्ति त्रेतायां ध्यानमेव च। द्वापरे यज्ञदाने च दानमेकं कलौ युगे॥
सर्वेषामेव दानानां नास्ति दानमतः परम्। चराचराणां भूतानामभयं यः प्रयच्छति॥
(स्क० पु०, ना० ५१। ६७-६८)

* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * । ११०५

अभिलाषा भी की; परंतु राजकाज तथा भोगमें आसक्त होनेके कारण मैं इसका दर्शन नहीं कर सका। आज जब यह तीर्थ स्वयं ही मुझे प्राप्त हो गया है तो अब मैं इसे छोड़कर नहीं जा सकता। सौभाग्यकी बात है, जो महात्मा दुर्वासाने मुझे वैसा शाप दिया। अन्यथा इस उत्तम क्षेत्रकी प्राप्ति मुझे कैसे होती?

ऐसा कहकर राजाने नन्दिनीको विदा कर दिया और स्वयं दिन-रात उस शिवलिंगका ध्यान करते हुए वे वहीं रहने लगे। उन्होंने भगवान् शिवके लिये कैलासशिखरके समान गगनचुम्बी मन्दिर बनवाया और उन्हींके आगे बैठकर बड़ी भारी तपस्या की। तदनन्तर शंकरजीके प्रभावसे थोड़े ही दिनोंमें परम दुर्लभ सिद्धि प्राप्त कर ली, जो याज्ञिकजनोंके लिये भी दुर्लभ है। जो मनुष्य मार्गशीर्ष मासमें वहाँ भक्तिपूर्वक गीत और नृत्य आदिका आयोजन करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। द्विजवरो! इस प्रकार मैंने तुम्हें कलशेश्वरजीके माहात्म्यका वर्णन सुनाया, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है।

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अगस्त्यकुण्ड, कपिलानदी, वैष्णवीशिला, सिद्धक्षेत्र आदिकी महिमा, नलद्वारा चर्ममुण्डाकी स्तुति तथा नलेश्वरकी महिमा

**सूतजी बोले—**महर्षियो ! उसीके समीप पूर्वभागमें अगस्त्यकुण्ड है, जहाँ परम पुण्यदायिनी और सब पातकोंका नाश करनेवाली बावली है। जो मनुष्य वहाँ फाल्गुनमासके शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको उपवासपूर्वक स्नान करता है, उसे अपनी इच्छाके अनुकूल वस्तुकी प्राप्ति होती है।

अगस्त्यवापीके दक्षिण भागमें कपिला नदी है, जहाँ कपिलमुनिने सांख्यशास्त्रकी सिद्धि प्राप्त की थी। कपिलाके पूर्व भागमें सिद्धक्षेत्र बताया गया है, जहाँ पूर्वकालमें लाखों मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। जो मनुष्य जिस कामनाको लेकर वहाँ तपस्या करता है, वह छः महीनेके भीतर अवश्य ही उसे प्राप्त कर लेता है। ब्राह्मणो! सिद्धक्षेत्रके निम्नभागमें एक शुभकारक वैष्णवीशिला है, जो घूमती रहती है। उसकी आकृति चौकोर है और वह सब पातकोंका नाश करनेवाली है। वह महानदीके जलसे धुली हुई और मनुष्योंको मोक्ष देनेवाली है। उस शिलाके आगे गंगा-यमुना-सरस्वती-संगमरूपा त्रिवेणी बहती हैं, जो भोग और मोक्ष देनेवाली हैं। उसके उत्तरभागमें रुद्रकोटितीर्थ है, जो दाक्षिणात्य महात्माओंद्वारा पूजित है। उसे रुद्रावर्त भी कहते हैं। जो पुरुष रुद्रावर्त क्षेत्रमें श्राद्ध करता है, वह सौ यज्ञोंका फल पाता है। जो वहाँ उपवासपूर्वक रात्रिमें जागरण करता है, वह इच्छानुसार चलनेवाले विमानके द्वारा स्वर्गमें जाता है।

वहीं पूर्वकालमें महात्मा राजा नलने चर्ममुण्डा देवीकी स्थापना की थी। जो मनुष्य महानवमीके दिन भक्तिपूर्वक चर्ममुण्डा देवीका पूजन करता है, वह मनोवांछित पदार्थोंको प्राप्त करके सनातन पद पा लेता है। पहलेकी बात है। वीरसेनके पुत्र नल इस भूमण्डलके राजा थे, जो समस्त सद्गुणोंसे युक्त थे। विदर्भदेशकी राजकुमारी दमयन्ती उनकी पतिव्रता पत्नी थी। एक समय राजा नलने कलियुगसे आविष्ट होकर अपने भाई पुष्करके साथ जूआ खेला। उसमें वे अपना सारा राज्य हार गये। तदनन्तर नल अपनी स्त्रीको साथ लेकर गहन वनके भीतर चले गये। वहाँ उन्होंने यह सोचा 'यदि दमयन्ती राजा भीमके घर चली जाय तो वनवासके कष्टसे मुक्त हो सकती है। इसलिये रातमें इसको सोती छोड़कर मैं दूर चला जाऊँगा जिससे यह साध्वी दमयन्ती मुझसे विलग होकर कुण्डिनपुरको चली जायगी।'

१९०६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

ऐसा निश्चय करके राजा नल सुखसे सोयी हुई दमयन्तीको छोड़कर घोर वनमें चले गये। प्रातःकाल उठकर दमयन्ती जब इधर-उधर देखने लगी तो उसने अपने पास नलको नहीं पाया। तब वह दुःखसे आतुर हो वनमें करुणस्वरसे विलाप करने लगी और धीरे-धीरे कुण्डिनपुरकी राह लेकर अपने पिताके राजमहलमें जा पहुँची। नल भी उस वनको छोड़कर दूसरे बड़े भारी वनमें चले गये और घूमते-घूमते हाटकेश्वरक्षेत्रमें जा पहुँचे। इसी बीचमें महानवमीका दिन आ गया। तदनन्तर नलने वहाँ चर्ममुण्डधारिणी दुर्गाकी मृन्मयी मूर्ति बनाकर उसका पूजन किया और फल-मूलोंका भोग लगाकर देवीको तृप्त किया। तत्पश्चात् वे देवीके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये तथा बड़ी श्रद्धाके साथ स्तुति करने लगे—

**नल बोले—**चर्ममुण्ड धारण करनेवाली श्रेष्ठ देवि! तुम सर्वत्र व्यापक हो, तुम्हारी जय हो। सर्वेश्वर तथा सम्पूर्ण राजाओंके द्वारा वन्दित दक्षकुमारी! तुम प्रत्येक कार्यमें दक्ष हो, शुभे! तुम्हारी जय हो। कालरात्रि! अचिन्त्ये! नवमी और अष्टमीको प्रिय माननेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। त्रिलोचने! त्रिलोचनप्रिये! देवपूजिते! देवि! तुम्हारी जय हो। भयंकर रूप धारण करनेवाली तथा सुन्दर रूपवाली महाविद्ये! महाबले! तुम्हारी जय हो। महोदये! महाकाये! महाव्रते! देवि! तुम्हारी जय हो। नित्यरूपे! जगद्धात्रि! तुम्हारी जय हो। विकराली महाकालिके! तुम्हारी जय हो। सुन्दरि! देवेश्वरि! पाशहस्ते! महाहस्ते! तुम्हें नमस्कार है। मनोहर देहलतासे युक्त तथा प्रिय गीतवाद्यसे प्रसन्न होनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। अनन्ता, चिन्तनीया तथा भगवान् शिवके आधे शरीरमें निवास करनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। तुम्हीं रति, तुम्हीं धृति, तुम्हीं तुष्टि, तुम्हीं गौरी तथा तुम्हीं देवताओंकी स्वामिनी शची हो। तुम्हीं लक्ष्मी, सावित्री और गायत्री हो। देवि! तीनों लोकोंमें स्त्रीरूपमें जो कुछ भी दिखायी देता है, वह सब तुम्हारे ही अंशसे प्रकट हुआ है। इस विषयमें मुझे कोई सन्देह नहीं है। इस सत्यके प्रभावसे तुम इस मूर्तिमें निवास करो। देव-दानववन्दिते! इस भक्तिसे सन्तुष्ट होकर तुम अपना सांनिध्य यहाँ स्थापित करो।

**सूतजी कहते हैं—**राजा नलके इस प्रकार स्तुति करनेपर भक्तवत्सला चतुर्भुजा देवीने प्रत्यक्ष दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—'वत्स! मैं तुम्हारे इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट हूँ। अतः तुम मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'

**राजा नल बोले—**देवि! मैंने प्राणोंसे भी अधिक प्रिय अपनी पत्नी दमयन्तीको हिंसक जन्तुओंसे भरे निर्जन वनमें त्याग दिया था। वह आपकी कृपासे अखण्ड शीलसे युक्त और निर्दोष रूपमें मुझे फिर प्राप्त हो, ऐसा यत्न कीजिये। जो आपके आगे इस स्तोत्रद्वारा स्तुति करे, उसे उसी दिन आप मनोवांछित वस्तु प्रदान करें।

**सूतजी कहते हैं—**तब दुर्गादेवी 'तथास्तु' कहकर अन्तर्धान हो गयीं तथा राजाओंमें श्रेष्ठ नलने उन सभी कामनाओंको प्राप्त कर लिया। चर्ममुण्डाके समीप ही राजा नलके द्वारा स्थापित देवाधिदेव भगवान् महेश्वर विराजमान हैं, जिनका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। माघमासके शुक्लपक्षकी षष्ठीको जो मानव भक्तिपूर्वक नलेश्वरका दर्शन करता है, वह सब रोगोंसे मुक्त हो परम पदको प्राप्त होता है। उन्हीं भगवान् शिवके आगे एक निर्मल जलसे भरा हुआ कुण्ड है। जो रविवारके प्रातःकाल उस कुण्डमें स्नान करता है, वह कुष्ठरोगसे छूटकर पुनः नूतन शरीर प्राप्त कर लेता है।


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  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १९०७ ---|---

गालवको सूर्यदेवकी आराधनासे पुत्रकी प्राप्ति, अर्जुनके द्वारा विभिन्न देवोंकी स्थापना तथा विषकन्या शर्मिष्ठाद्वारा स्थापित शर्मिष्ठा-तीर्थका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—नलेश्वरसे थोड़ी ही दूरपर देवताओंके स्वामी सूर्य साम्बादित्यके नामसे प्रसिद्ध हैं, जिनका दर्शन करके मनुष्य सम्पूर्ण हृदयस्थित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। जो माघ शुक्ला सप्तमी तथा रविवारके योगमें भक्तिपूर्वक उनका दर्शन करता है वह नरकोंको नहीं देखता। प्राचीन कालमें गालव नामवाले एक ब्राह्मण हो गये हैं, जो सदा ही वेदोंके स्वाध्यायमें तत्पर तथा उत्तम स्वभाव और सदाचारसे युक्त थे। उनकी अवस्था ढल गयी तो भी उनके कोई पुत्र नहीं हुआ। इसका उनके मनमें बड़ा दुःख था। तब उन्होंने घरका सारा काम-काज छोड़कर इसी क्षेत्रमें एकाग्रतापूर्वक निवास करते हुए भक्तिभावके साथ सूर्यदेवकी आराधना की। जितेन्द्रिय होकर निराहार रहते हुए उन्होंने पंचरात्रोक्त विधिसे सूर्यदेवको अर्घ्य प्रदान किया और इसी नियमसे प्रतिदिन उनकी आराधना करते रहे। पंद्रहवाँ वर्ष आनेपर भगवान् सूर्य गालवको दर्शन देते हुए बोले—‘विप्रवर! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।’

गालव बोले—सुरश्रेष्ठ! मेरे कोई पुत्र नहीं है। अतः मुझे मेरे वंशकी वृद्धि करनेवाला पुत्र दीजिये।

भगवान् सूर्यने कहा—विप्रवर! तुम्हें वंशकी वृद्धि करनेवाला पुत्र प्राप्त होगा और वह तेजस्वी, यशस्वी, शास्त्रज्ञ तथा वेदोंका पारंगत पण्डित होगा। तुमने साम्बादित्यके समीप जहाँ मुझे अर्घ्य देकर पूजन किया है, यहाँ दूसरा कोई भी जो पुरुष रविवार और सप्तमीके योगमें श्रद्धापूर्वक मेरे इस विग्रहकी पूजा करेगा, उसे वंशवर्द्धक पुत्रकी प्राप्ति होगी। ऐसा कहकर भगवान् सूर्य मौन एवं अन्तर्धान हो गये और गालवजी भी प्रसन्नचित्त हो अपने घरको चले गये। थोड़े ही दिनोंमें उनके यहाँ भगवान् सूर्यके कथनानुसार एक सर्वशुभलक्षणसम्पन्न पुत्र उत्पन्न हुआ। भगवान् सूर्यने वटवृक्षका आश्रय लेकर दर्शन एवं वरदान दिया था। इसलिये गालवने अपने पुत्रका नाम वटेश्वर रखा। वटेश्वरके पुत्रों तथा पौत्रोंको देख लेनेपर महर्षि गालव भारी तपस्या करके सूर्यदेवको प्राप्त हुए। वटेश्वरने भी अपने पिताके द्वारा स्थापित भगवान् सूर्यनारायणके लिये एक परम मनोहर मन्दिर बनवाया।

द्विजवरो! पूर्वकालमें महात्मा विदुरने भी उस क्षेत्रमें भगवान् श्रीसूर्यनारायण, सदाशिव तथा श्रीविष्णुका स्थापन किया है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इन तीनों देवताओंका पूजन करेगा, वह उस परम धामको प्राप्त होगा, जो बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भी अत्यन्त दुर्लभ है।

वहींपर अर्जुनके द्वारा स्थापित किये हुए सर्वमनोरथदायक भगवान् विनायक विराजमान हैं, जो समस्त विघ्नोंका नाश करते हैं। जो मनुष्य चतुर्थीको नक्तव्रत (केवल रातमें भोजन करनेका संकल्प) करके भक्तिभावसे गणेशजीकी पूजा करता है, वह समस्त विघ्नोंसे मुक्त हो मनोवांछित फलको पाता है। वहींपर उत्तम प्रभावसे युक्त भगवान् नर और नारायण भी हैं। जो उन दोनोंका भक्तिपूर्वक द्वादशी तिथिको दर्शन और पूजन करता है, वह जरा-मरणसे रहित परम पदको प्राप्त होता है।

एक समय कुन्तीनन्दन अर्जुन तीर्थयात्रा प्रारम्भ करके हाटकेश्वरक्षेत्रमें आये। वहाँ तीर्थसमुदायसे भरे हुए उस पावन क्षेत्रका दर्शन करके उन्होंने मनोहर मन्दिरमें भगवान् सूर्यको स्थापित किया और उन्हींके आगे नर और नारायणकी भी स्थापना की। फिर उत्तम श्रद्धासे युक्त हो वहाँ गोवर्द्धनको

११०८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

स्थापित किया और वहीं देवाधिदेव नृसिंहदेवकी स्थापना की। इस प्रकार पाँच देवताओंकी स्थापना करके उन्होंने चमत्कारपुरके सब ब्राह्मणोंको बुलवाया और उन्हें बहुत धन दिया। फिर भक्तिपूर्वक प्रणाम करके कहा—'मैंने सब रोगोंका नाश करनेवाले भगवान् सूर्यको यहाँ स्थापित किया है और इनकी सेवा आपलोगोंको सौंपी है। अतः आपको सदैव इनका चिन्तन करना चाहिये।

ब्राह्मण बोले—पाण्डुनन्दन! आप यह सब छोड़कर अपने घरको पधारिये। हम सब लोग आपके श्रेयको बढ़ानेवाला पूजनकर्म करते रहेंगे।

तब अर्जुनने प्रसन्नचित्त हो उन्हें पुनः बहुत धन दिया और उनसे पूछकर विदा ले प्रणामपूर्वक अपने नगरको प्रस्थान किया।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने तुमसे नरादित्यके प्रादुर्भावकी कथा सुनायी। यह सुननेवालोंके पापोंका नाश करनेवाली है।

पूर्वकालमें 'वृक' नामसे प्रसिद्ध एक चन्द्रवंशी राजा हुए थे। वे बड़े ही ब्राह्मणभक्त, शरणागतवत्सल और सर्वलोकहितकारी थे। उनकी पत्नी भी बड़ी पतिव्रता और समस्त सद्गुणोंसे सुशोभित थीं। उन दोनोंको चौथेपनमें एक कन्या हुई। राजाने विद्वान ज्योतिषियोंको बुलाकर पूछा—'मेरी यह कन्या कैसी होगी?'

ज्योतिषी ब्राह्मण बोले—राजन्! सूर्यके चित्रा नक्षत्रपर रहते समय सोमवार और चतुर्दशीके योगमें जो जन्म ग्रहण करती है, वह विषकन्या होती है। ऐसी कन्याका जो पाणिग्रहण करता है, वह पुरुष छः महीनेके भीतर अवश्य मृत्युको प्राप्त होता है। वह जिस घरमें जन्म लेती है, वह कुबेरका ही महल क्यों न हो, उसे छः महीनेके भीतर धनसे रहित कर देती है। अतः आपकी यह पुत्री वास्तवमें विषकन्या है। यह पितृकुल और श्वशुरकुल दोनोंका नाश कर देगी। इस कारण आप इसे त्यागकर सुखी हो जाइये। यदि हमारे कहे हुए हितकर वचनपर आपको श्रद्धा हो तो आप ऐसा ही कीजिये।

राजाने कहा—ब्राह्मणो! मैं इस कन्याको त्याग दूँ या घरमें रखूँ, दोनों ही दशाओंमें मेरे पूर्वशरीरसे किया हुआ कर्म ही फलीभूत होगा। पहलेका शुभ कर्म हो या अशुभ कर्म उसे मिटाया नहीं जा सकता। अतः मैं अपने कर्मको ही आगे रखकर इस कन्याका त्याग नहीं करूँगा। जो जिस-जिस शरीरसे जैसा-जैसा कर्म करता है वह उसी-उसी शरीरसे पुनः सबके फलको भोगता है। अपनी इन्द्रियोंसे पूर्वजन्ममें जो कर्म किया गया है, वह मिट नहीं सकता। उसका फल भोगना ही पड़ेगा और बिना किये हुए किसी कर्मका फल अपने सामने आ नहीं सकता। अतः मेरे सामने जो भी परिणाम आवे, मुझे कोई भय नहीं है। देहधारी जीवके लिये गर्भमें ही आयु, कर्म, धन, विद्या और मृत्यु—इन पाँच वस्तुओंकी सृष्टि कर दी जाती है। जैसे वृक्षों और लताओंमें फल और फूल अपने समयपर आते ही हैं—समयका उल्लंघन नहीं करते, उसी प्रकार पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म भी अपने समयका उल्लंघन नहीं करता। नियत समयपर उसका भोग करना ही पड़ता है। कोई भी पुरुष पूर्वशरीरद्वारा किये हुए कर्मको अपने बल और बुद्धिसे पलट देनेमें समर्थ नहीं है। जो शीघ्रतापूर्वक दौड़ता है, उसके पीछे उसका कर्म भी दौड़ता है। कर्म साथ ही सोता और खड़े होनेपर साथ ही खड़ा होता है। जिसको जहाँ भी सुख या दुःख भोगना है, वह रस्सीसे बँधा हुआ-सा बलपूर्वक वहाँ खिंचकर पहुँच जाता है। जैसे तेल समाप्त हो जानेपर दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार कर्मोंका नाश हो जानेपर जीव मोक्षको प्राप्त हो जाता है। ऋतुकालमें पुरुषके द्वारा गर्भमें स्थापित किये हुए अचेतन वीर्यके एक बिन्दुका आश्रय लेकर जीव अपने कर्मके साथ वृद्धिको प्राप्त होता है। जिस उदरमें कितने ही अन्न-पान डाले जायें, नष्ट हो जाते हैं, भक्ष्य पदार्थ पच जाता है; वहीं पड़ा हुआ वह गर्भ क्यों नहीं नष्ट हो जाता। इसलिये लोकमें देहधारियोंका

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | ११०९

किया हुआ शुभाशुभ कर्म ही सुख-दुःखके रूपमें प्राप्त होता है, ऐसा मेरा निश्चय है। अरक्षित वस्तु भी दैव (प्रारब्धकर्म)-से सुरक्षित होकर बच जाती है और सुरक्षित भी दैवसे हत होकर नष्ट हो जाती है। वनमें त्यागा हुआ अनाथ बालक भी जीवित रहता है और घरमें बड़े प्रयत्नसे पाला-पोसा जानेवाला शिशु भी मृत्युको प्राप्त हो जाता है।

ऐसा निश्चय करके राजाने ज्योतिषियोंके सलाह देनेपर भी उस विषकन्याका परित्याग नहीं किया। पिताने उसका नाम शर्मिष्ठा रख दिया। इसी समय क्रोधमें भरे हुए राजाके शत्रुओंने उनके राज्यको सब ओरसे सताना आरम्भ किया। तब राजा भी चतुरंगिणी सेनाके साथ बाहर निकले और उन्होंने शत्रुओंके साथ घोर युद्ध किया जो यमराजके लोककी जनसंख्या बढ़ानेवाला था। दसवें दिन राजा वृकको शत्रुओंने सब ओरसे घेरकर मार डाला। इनके मारे जानेपर शेष सैनिक भयसे पीड़ित हो अपने नगरको भाग गये।

इसी समय समस्त पुरवासियोंने शोकपरायण हो उस दुष्टा विषकन्याको लक्ष्य करके कठोर वचनोंमें कहा—इसी पापिनके दोषसे राजाकी मृत्यु हुई है। अतः इसे शीघ्र ही बाँध लिया जाय और जबतक इस नगरका क्षय न हो जाय तबतक ही इसे यहाँसे बाहर निकाल दिया जाय।

पुरवासियोंकी ये नाना प्रकारकी बातें सुनकर विषकन्याको बड़ा वैराग्य हुआ। उसने अपनी निन्दा की और भय तथा शोकमें डूबी हुई वह रातमें निकलकर वनमें चली गयी। वहाँ प्राणत्याग करनेका निश्चय करके वह आगे बढ़ती जा रही थी कि हाटकेश्वरक्षेत्रमें जा पहुँची। उस महान् क्षेत्रमें विषकन्याने देखा, वह बहुतेरे तपस्वीजनोंसे भरा हुआ है, चित्तमें अत्यन्त आह्लाद उत्पन्न करता है। इतनेमें ही उसे अपने पूर्वजन्मकी बातका स्मरण हो आया—'अहो! पूर्वकालमें जब मैं चाण्डाल-जातिकी स्त्री थी, यहीं मैंने एक गायकी प्यास बुझायी थी। उसीके प्रभावसे मैं राजाके पवित्र भवनमें उत्पन्न हुई। अतः अब मुझे यहीं रहना चाहिये। पूर्वजन्ममें गौके लिये किये हुए जलदानके माहात्म्यका विचार करके उसने निर्मल जलसे भरे हुए एक सरोवरका निर्माण किया, जो कि समुद्रके समान विस्तृत और मनोहर कमल-वनसे सुशोभित था। वहाँ बहुतसे हंस, वक और चक्रवाक आदि पक्षी सब ओर रहने लगे। तत्पश्चात् राजकन्याने उस सरोवरके समीप कैलासशिखरके समान ऊँचा एक सुन्दर मन्दिर बनवाया जो देखनेमें बड़ा ही मनोहर था। उसीमें भक्तिभावसे भगवती पार्वतीकी स्थापना करके शास्त्रोक्त व्रतका आश्रय ले राजकुमारी शर्मिष्ठाने देवीके आगे बड़ी भारी तपस्या की। केवल वायु पीकर पार्वतीके नामका जप करती हुई उसने अपने चित्तको निरन्तर उन्हींके चिन्तनमें लगा दिया था। इस प्रकार देवीकी आराधनामें उसका दीर्घकाल व्यतीत हो गया। किंतु उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति नहीं हुई। उसका सिर सफेद बालोंसे भर गया, मुखपर झुर्रियाँ पड़ गयीं, तो भी शिववल्लभा पार्वतीदेवी सन्तुष्ट नहीं हुईं। यह देखकर जब वह अत्यन्त व्याकुल हो गयी, तब एक ही क्षणमें दुग्ध, कुन्द और चन्द्रमाके समान उज्ज्वल एक वृषभ प्रकट हुआ। उसकी पीठपर भगवान् शंकरके साथ पार्वतीदेवी विराजमान थीं। उनकी चार भुजाएँ थीं, मुखपर प्रसन्नता छा रही थी और उनका दिव्य रूप अलौकिक था। उनके वस्त्र और आभूषण सभी श्वेतवर्णके थे, मस्तकपर अर्धचन्द्राकार मुकुट शोभा पा रहा था। इन चिन्होंसे गिरिराजकुमारी पार्वतीदेवीको पहचानकर विषकन्याने बारंबार प्रणाम करके इस प्रकार उनकी स्तुति की।

विषकन्या बोली— देवदेवेश्वर! आपको नमस्कार है। सबमें निवास करनेवाली देवि! आपको नमस्कार है। समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली, जरा-मरणसे रहित तथा सत्यस्वरूपा पार्वती! आपको नमस्कार है। देवि! इन्द्र आदि देवता भी आपके स्वरूपका यथार्थतः वर्णन करना

११९०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

नहीं जानते। फिर मुझ-जैसी मनुष्यकन्या आपके विषयमें क्या कह सकती है? पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशस्वरूप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, देवता, असुर और मनुष्य आदि प्राणियोंसहित जिनके श्रीअंगोंसे प्रकट हुआ है, जिनका जन्म देनेमें ब्रह्मा, नाश करनेमें महेश्वर और पालन करनेमें विष्णु भी समर्थ नहीं हैं, उन सर्वेश्वरीदेवीकी मैं कैसे स्तुति कर सकूँगी। जिनमें अणिमा आदि आठ गुणोंवाला ऐश्वर्य स्वभावतः विद्यमान है तथा जिनका ऐश्वर्य लोकमें सबसे बढ़कर और सबके लिये अत्यन्त स्पृहणीय है। जिनके अनेक स्वरूपोंका ध्यानपरायण मुनिगण निरन्तर भक्तिपूर्वक ध्यान करते और उस ध्यानके प्रभावसे सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त होते हैं। मोक्षप्राप्तिके लिये दृढ़ निश्चय रखनेवाले योगी पुरुष अपने हृदयमें जिनके स्वरूपका चिन्तन करके भावरूप पुष्पोंके द्वारा उसकी अर्चना करते हैं, उन महामहेश्वरीदेवीका स्तवन मैं मानवी होकर कैसे कर सकती हूँ?<br><br>पार्वतीदेवीने कहा—पुत्रि! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम मनोवांछित वर माँगो।<br><br>विषकन्या बोली—देवि! मैंने पतिकी प्राप्तिके लिये तपस्याका यह उद्योग किया था, किंतु अब तो मैं बूढ़ी हो गयी। अतः पति लेकर क्या करूँगी। अब तो इतनी ही प्रार्थना है कि आप | संसारकी समस्त नारी-जातिके हितके लिये इस आश्रममें सदा निवास करें।<br><br>देवीने कहा—भद्रे! आजसे मैं तुम्हारे इस श्रेष्ठ एवं शुभ आश्रममें निवास करूँगी। इससे तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। माघशुक्ला तृतीयाको जो स्त्री अथवा पुरुष यहाँ स्नान करेंगे, उन्हें मेरे प्रसादसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होगी। स्त्री हो या पुरुष, इस सरोवरमें स्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो जायँगे। भद्रे! जो कन्या यहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करेगी, उसे निःसन्देह श्रेष्ठ पतिकी प्राप्ति होगी। जो मनुष्य यहाँपर फलोंका दान करेंगे, उनके सभी मनोरथ सफल होंगे।<br><br>ऐसा कहकर पार्वतीदेवीने उस विषकन्याका अपने हाथसे स्पर्श किया। उसी क्षण वह वृद्धावस्थासे मुक्त होकर दिव्यरूपसे सुशोभित हो गयी। तदनन्तर उस विषकन्याको अपनी सेविका बनाकर पार्वतीदेवी उसे कैलासपर्वतपर ले गयीं। तभीसे उस तीर्थको शर्मिष्ठातीर्थ कहते हैं, जो सब पातकोंका नाश करनेके लिये तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। माघमासके शुक्ल पक्षकी तृतीयाको सब उपाय करके मनुष्य उस तड़ागमें स्नान करे। यह परम पवित्र, आयुवर्द्धक, सर्वपापनाशक तथा मनुष्योंको मोक्ष देनेवाला स्त्रीतीर्थ है, जिसका वर्णन मैंने आपलोगोंसे किया है।


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चमत्कारीदेवीकी महिमा, कार्तिकेयजीके द्वारा शक्तिस्थापना तथा भानुमती-दुर्योधनके विवाहमें सम्मिलित कौरव, पाण्डव एवं यादवोंद्वारा शिवलिंगस्थापन

सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! पूर्वकालमें महाराज चमत्कारके द्वारा जिनकी श्रद्धापूर्वक स्थापना की गयी थी, वे चमत्कारीदेवी वहीं विद्यमान हैं। कौमारव्रत धारण करनेवाली उन्हीं देवीने लाखों मायामय रूप धारण करनेवाले महिषासुरका वध किया था। महात्मा राजा चमत्कारने जब चमत्कारपुरका निर्माण किया, उस समय नगरकीतथा उस नगरमें निवास करनेवाले समस्त ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये भक्तिभावित चित्तसे चमत्कारीदेवीको स्थापित किया था। जो महानवमीके दिन चमत्कारीदेवीका विधिपूर्वक पूजन करता है, उसे एक वर्षतक कहीं भूत, प्रेत, पिशाच, शत्रुगण, रोग, चोर तथा दुष्टोंसे भय नहीं होता। शुक्ल पक्षकी अष्टमीमें पवित्र होकर जो मनुष्य जिस-जिस
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११११

कामनाका चिन्तन करते हुए उनकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह उस कामनाको निःसन्देह प्राप्त कर लेता है और जो पुरुष निष्कामभावसे चमत्कारीदेवीका पूजन करता है, वह निश्चय ही देवीके प्रसादसे सुखस्वरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है। उन परमेश्वरीकी आराधना करके पूर्वकालमें बहुतसे राजा, ब्राह्मण तथा योगीजन सिद्धिको प्राप्त हो चुके हैं। जो एक वर्षतक प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक चमत्कारीदेवीकी परिक्रमा करता है, वह पशु-पक्षियोंकी योनिमें नहीं जाता है।

स्वामिकार्तिकेयने तारकासुरका वध करके अपनी शक्तिको उसी चमत्कार नामक श्रेष्ठ नगरमें स्थापित किया, जिससे रक्तशृङ्ग पर्वत अत्यन्त दृढ़ हो जाय। उसके बाद उन्होंने प्रसन्न होकर अम्बावृद्धा, आम्रा, माहित्था और चमत्कारी—इन चार देवियोंसे कहा—'आप सब लोग मिलकर इस श्रेष्ठ पर्वतको सुस्थिर बनाये रखें जिससे यह प्रलयकालमें भी अपने स्थानसे विचलित न हो। यह उत्तम नगर सदा मेरे नामसे प्रसिद्ध हो और यहाँके सब ब्राह्मण सदा आप चारों देवियोंको पूजा देंगे।' स्वामिकार्तिकेयजीकी इस बातसे प्रसन्न होकर उन देवियोंने 'बहुत अच्छा' कहकर अपने त्रिशूलका अग्रभाग लगाकर उस पर्वतको सब ओरसे सुदृढ़ कर दिया। जो मनुष्य चैत्र मासके शुक्ल पक्षकी षष्ठी तिथिमें भक्तिभावसे स्वामिकार्तिकेयजीका पूजन करता है, उसे मयूरवाहन स्कन्दजी सन्तोष प्रदान करते हैं। इस प्रकार परम बुद्धिमान् स्कन्दने रक्तशृंग तथा चमत्कार नगरकी रक्षाके लिये वहाँ अपनी शक्ति स्थापित की है।

पूर्वकालमें बलभद्रजीके भानुमती नामसे प्रसिद्ध एक पुत्री थी, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा रूप और उदारता आदि गुणोंसे विभूषित थी। बलभद्रजीने श्रीकृष्णसे सलाह लेकर उस कन्याका विवाह परम बुद्धिमान् राजा दुर्योधनके साथ निश्चित किया। तदनन्तर हस्तिनापुरसे भीष्म, द्रोण आदि कौरवदलके लोग बारात लेकर शीघ्रतापूर्वक द्वारकापुरीकी ओर प्रस्थित हुए। पाँचों पाण्डव भी परिवारसहित दुर्योधनके साथ द्वारकापुरीको चले। क्रमशः यात्रा करते हुए वे समस्त कौरव तथा पाण्डव धन-धान्यसे सम्पन्न आनर्त देशमें आ पहुँचे, जहाँ सब पापोंका नाश करनेवाला त्रिभुवनविख्यात हाटकेश्वरक्षेत्र है। वहाँ कौरवोंके पितामह भीष्मजीने राजा धृतराष्ट्रसे कहा—'वत्स! यह भगवान् हाटकेश्वरका उत्तम क्षेत्र है जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। बहुत दिन हुए मैंने इसका दर्शन किया था। अतः हमलोग आजसे पाँच दिनोंतक यहाँ निवास करें और शुद्ध चित्तवाले मुनियोंके जो-जो पुण्यदायक मन्दिर और तीर्थ यहाँ हैं, उन सबका दर्शन करें।'

भीष्मजीके ऐसा कहनेपर राजा धृतराष्ट्रने अपने सौ पुत्रोंके साथ शीघ्रतापूर्वक उस उत्तम क्षेत्रमें गये। वहाँ कोई उपद्रव न होने पाये, इस विचारसे राजाने अपनी सेनाको तो वहाँ जानेसे रोक दिया और स्वयं पाँचों पाण्डवों तथा सौ पुत्रोंसहित भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शकुनि, कर्ण तथा अन्य राजाओंके साथ उस क्षेत्रमें भ्रमण किया। उन सभी क्षत्रियोंने वहाँ रहकर श्रद्धापूत हृदयसे सम्पूर्ण धर्मकार्योंका अनुष्ठान किया। तदनन्तर वे सब लोग वहाँके देवस्थानों, तीर्थों, ब्राह्मणों तथा उत्तम व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी जनोंकी प्रशंसा करते हुए धृतराष्ट्रके साथ अपनी छावनीपर लौट आये। वहाँसे कौरव तथा पाण्डव द्वारकापुरीको गये। वहाँ पहुँचकर हर्षमें भरे हुए उन सब लोगोंने राजकुमारी भानुमतीके साथ महाराज दुर्योधनका विवाह कराया। उस समय नाना प्रकारके बाजे बजे, वेदमन्त्रोंका उच्चारण हुआ, मनोहर गीत गाये गये तथा सहस्रों वन्दीजनोंने स्तुतिपाठ किया। इस प्रकार आठ दिनोंतक यदुवंशियों और कौरवोंने मिलकर बड़ा भारी उत्सव मनाया। नवें दिन भीष्म आदि कौरवों तथा पाण्डवोंने स्नेहपूर्वक कमलनयन श्रीकृष्णसे कहा—'पुण्डरीकाक्ष! हमलोग आपके और बलरामजीके स्नेहपाशमें इतने बँधे हुए हैं

१११२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
कि आपलोगोंका आश्रय किसी प्रकार छोड़ना नहीं चाहते तथापि अब हमें अपने नगरको जाना चाहिये। अतः आप और बलभद्रजी हमें विदा दें।'<br><br>भगवान् श्रीकृष्णने कहा—आपलोगोंको यहाँ रहते हुए न तो वर्ष बीता है, न मास बीता है और न पक्ष ही व्यतीत हुआ है। फिर इतने ही दिनोंमें घर जानेकी उत्कण्ठा कैसे उदित हो गयी? हमारी तो यही इच्छा है कि कौरव, पाण्डव तथा हम सब लोग मिलकर विविध प्रकारसे मनोरंजन करते हुए सदा यहीं टिके रहें। यदि आपका हमलोगोंपर स्नेह हो, तो ऐसा ही करें।<br><br>भीष्मजी बोले—श्रीकृष्ण! आपने जो बात कही है वह सर्वथा योग्य है, परंतु आपके निकट आते हुए हमलोगोंने आनर्त देशमें अत्यन्त अद्भुत हाटकेश्वरक्षेत्रका दर्शन किया था। वहाँ सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी महात्मा राजाओंके द्वारा स्थापित किये हुए अनेकानेक शिवलिंगोंको देखा था। अतः हमारे मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ है कि हमलोग भी वहाँ जाकर अपने-अपने नामसे पृथक्-पृथक् शिवलिंगकी स्थापना करें। इसलिये प्रभो! आप अपने चित्तको दृढ़ करके आज्ञा दीजिये कि हमलोग जायँ। आपके दर्शनकी लालसासे हम फिर यहाँ आते-जाते रहेंगे।<br><br>श्रीभगवान्ने कहा—मैं उस परम पवित्र पापनाशक क्षेत्रको जानता हूँ। मेरे सामने अनेकों तापसों तथा दूसरे-दूसरे तीर्थयात्रियोंने भी उसके माहात्म्यकी सदा ही चर्चा की है। अतः आपके साथ हमलोग भी उस क्षेत्रको देखनेकी अभिलाषासे वहाँ शिवलिंगस्थापनाके लिये चलेंगे।<br><br>सूतजी बोले—इस बातको सुनकर कौरव और पाण्डव बड़े हर्षको प्राप्त हुए। फिर सब लोगोंने एक ही साथ हाटकेश्वरक्षेत्रको प्रस्थान किये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने क्षेत्रसे कुछ दूर ही सेनाका पड़ाव डाला और मुख्य-मुख्य कौरव, पाण्डव तथा यादव चमत्कारपुरमें गये। वहाँ जा उस क्षेत्रके समस्त ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हेंभाँति-भाँतिके भूषण और वस्त्र देते हुए उन सबने कहा—'द्विजवरो! हम सब लोग यहाँ अपनी-अपनी शक्तिके अनुसार पृथक्-पृथक् शिवलिंगस्थापना और मन्दिरनिर्माणका कार्य करना चाहते हैं। इसलिये आप लोग शीघ्र आज्ञा दें, जिससे कार्य प्रारम्भ किया जाय। आप ही लोग सब कर्मोंमें होता होंगे। बाहरका दूसरा कोई ब्राह्मण नहीं रहेगा।'<br><br>उनका यह वचन सुनकर उन ब्राह्मणोंने आपसमें विचार करके यह निश्चय किया कि 'इनको हम अवश्य भूमि देंगे, जिससे हमें धनकी भी प्राप्ति होगी और इस स्थानकी भी शोभा बढ़ जायगी।' ऐसा विचार करके कौरवों, यादवों तथा पाण्डवोंसे वे इस प्रकार बोले—'यह क्षेत्र अत्यन्त छोटा है और अन्य राजाओंके मन्दिरोंसे भरा हुआ है; इसलिये हमें कुछ कहते नहीं बनता। आपलोगोंमें जो प्रधान-प्रधान व्यक्ति हों, वे ही यहाँ पृथक्-पृथक् अत्यन्त मनोहर मन्दिरोंका निर्माण करें।' उनका यह कथन सुनकर धृतराष्ट्र आदि प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंने वहाँ सुन्दर मन्दिरोंका निर्माण किया।<br><br>राजा धृतराष्ट्रने अपने सौ पुत्रोंके साथ एक सौ एक शिवलिंग स्थापित किये। समस्त पाण्डवोंने अपने-अपने नामसे पाँच शिवलिंगोंकी स्थापना की। तत्पश्चात् गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी तथा भानुमतीने चार पार्वतीमूर्तियोंकी स्थापना की। तदनन्तर विदुर, शल्य, युयुत्सु, कलिंग, बाह्लीक, कर्ण, वृषसेन, शकुनि, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामाने भी पृथक्-पृथक् सुन्दर मन्दिर बनवाकर बड़ी भक्तिसे एक-एक उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की। सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णने एक ऊँचे शिखरवाले मनोहर मन्दिरका निर्माण कराकर उसमें उत्तम शिवलिंगको स्थापित किया। तत्पश्चात् सात्वत, साम्ब, बलभद्र, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध आदि मुख्य-मुख्य यादवोंने भी शिवलिंग स्थापित किये। रुक्मिणीके दस पुत्र चारुदेष्ण आदिने भी श्रद्धापूर्वक दस शिवलिंगोंकी स्थापना की। इस प्रकार वे
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सब कौरव, पाण्डव और यादव प्रसन्नतापूर्वक शिवलिंगोंकी स्थापना करके कृतकृत्य हो गये। उन्होंने चिरकालतक उस तीर्थमें रहकर चमत्कारपुरके ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान देकर धनाढ्य बना दिया। इसके बाद वे सब लोग अपने-अपने स्थानको चले गये। जो पुरुष भक्तिभावसे उन शिवलिंगोंकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।


स्कन्दस्वामी और देवयजनकी महिमा तथा तीनों सूर्य-विग्रहोंके दर्शनका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—प्राचीन कल्पमें जब देवताओंने हाटकेश्वर नामक शिवलिंगकी स्थापना की, तब भगवान् शिवने ब्रह्माजीके लिये यह क्षेत्र प्रदान किया था। उस समय वहाँके ब्राह्मणोंकी कलिकाल आदि दोषोंसे रक्षा करनेके लिये महादेवजीने अपने पुत्र कार्तिकेयको ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे वहाँ रहनेकी आज्ञा दी। पिताकी आज्ञासे कार्तिकेयजीने वहाँ निवास किया। जो कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रके योगमें स्वामिकार्तिकेयजीका दर्शन करता है, वह सात जन्मोंतक धनाढ्य एवं वेदवेत्ता ब्राह्मण होता है। उस तीर्थमें कार्तिकेयजीका मन्दिर बहुत ही ऊँचा और मनोहर है; उस मन्दिरकी चर्चा सुनकर स्वर्गके देवता भी कौतूहलवश वहाँ उतर आये और उन्होंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस पवित्रतम नगर एवं मन्दिरका दर्शन किया तथा उस मन्दिरके उत्तर एवं पूर्व दिशामें विधिपूर्वक यज्ञकर्मका अनुष्ठान किया। यज्ञ-होम करके सब देवताओंने वहाँके ब्राह्मणोंको दक्षिणा दी और उस स्थानका उत्तम फल पाकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। तबसे उस स्थानका नाम देवयजन हुआ। अन्य स्थानोंपर सौ यज्ञ करके मनुष्य जिस फलको पाता है, उसीको वहाँ दक्षिणासहित एक ही यज्ञ करके पा लेता है।

उस तीर्थमें तीन सूर्यविग्रह हैं—प्रथमका नाम मुण्डीर, दूसरेका कालप्रिय तथा तीसरेका मूलस्थान है, जो सब रोगोंका नाश करनेवाले हैं। भगवान् सूर्य प्रातःकाल मुण्डीरमें, मध्याह्नके समय कालप्रियमें तथा सन्ध्याके समय मूलस्थानमें जाते हैं। उस समय जो मनुष्य इन तीनों सूर्यविग्रहोंमेंसे एकका भी भक्तिपूर्वक दर्शन करता है, वह निःसन्देह मोक्षको प्राप्त होता है।

समुद्रके निकट विटंकपुर नामक एक उत्तम स्थान है, जो समुद्रकी उत्ताल तरंगोंसे आवृत होनेके कारण ऊँची चहारदीवारीसे सुशोभित प्रतीत होता है। उस नगरमें एक ब्राह्मण था, जो पूर्वकर्मके फलसे युवावस्थामें ही कोढ़ी हो गया था। उसकी पत्नी अच्छे कुलमें उत्पन्न, सती-साध्वी एवं सुशीला थी। वह अपने कोढ़ी पतिको ही कामदेवके समान सुन्दर देखती थी। पतिके अच्छे होनेके लिये ब्राह्मणी भाँति-भाँतिकी बहुमूल्य एवं हितकर ओषधियाँ ले आती और उसके घावोंपर लेप करती थी। एक समय उस श्रेष्ठ ब्राह्मणके घरमें कोई उत्तम अतिथि आया, जो कि बहुत थका-माँदा था। घरपर आये हुए उस ब्राह्मणको देखकर उसकी सती स्त्रीने भक्तिपूर्वक अनेक उपचारोंसे उसे सन्तुष्ट किया। जब वह स्नान, भोजन और आचमन करके शय्यापर विश्राम करने लगा, तब उससे गृहस्थ ब्राह्मणने पूछा—'विप्रवर! आप कहाँसे आये हैं और इस समय कहाँ जाते हैं?'

पथिक बोला—द्विजश्रेष्ठ! मैं कान्तिपुरका रहनेवाला हूँ, मुझे भी तुम्हारी ही भाँति कुष्ठरोगने दबा लिया था। तब मैंने सुना कि इस पृथ्वीपर समस्त रोगोंका नाश करनेवाले तीन सूर्यविग्रह हैं। सुनकर उन्हींका दर्शन करनेके लिये मैं हाटकेश्वरक्षेत्रमें गया और मुण्डीर स्वामीके पास पहुँचकर वहीं ठहर गया। उस स्थानपर सूर्यदेवका विधिपूर्वक पूजन करनेसे मेरा सब रोग जाता रहा और शरीर परम सुन्दर

१११४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


हो गया। इस समय मैं वहींसे लौटकर आ रहा हूँ। द्विजश्रेष्ठ! तुम भी उस तीर्थमें जाकर वहाँके तीनों सूर्यविग्रहोंके दर्शन करो, जिससे कुष्ठरोगका नाश हो जाय। आज मुझे तुम्हारे घरमें अपने ही घरका-सा आराम मिला है। अब मैं अपने नगरको जाऊँगा।

पथिककी यह बात सुनकर गृहस्थ ब्राह्मणने अपनी पत्नीके मुखकी ओर देखा। वह बोली—'प्राणनाथ! इन्होंने बहुत अच्छी सलाह दी है, अतः जहाँ वे तीनों सूर्यविग्रह हैं, उस स्थानपर शीघ्र ही चलिये। प्रभो! मैं भी आपके साथ सेवामें संलग्न रहकर चलूँगी।' तदनन्तर उस ब्राह्मणने अपनी स्त्रीके साथ मुण्डीर स्वामीके निकट प्रस्थान किया और बड़े क्लेशसे किसी तरह वह हाटकेश्वरक्षेत्रमें पहुँचा तथा अपनी पत्नीसे बोला—'प्रिये! मैं रोग और भूखसे बहुत कष्ट पा रहा हूँ, अतः मुण्डीर स्वामीके समीपतक चलनेमें असमर्थ हूँ। इसलिये यहींपर अपना शरीर त्याग दूँगा। तुम कोई अच्छा साथ ढूँढ़कर घर लौट जाओ।'

स्त्री बोली—प्राणवल्लभ! आपके भोजन किये बिना मैंने कभी भोजन नहीं किया है। एकान्तमें भी जबतक आप जगे हैं, मैंने कभी नींद नहीं ली है। अतः आज इस महाक्षेत्रमें आकर जब आप परलोक जानेके लिये उद्यत हैं, तब आपको त्यागकर मैं घर कैसे लौट सकती हूँ? आपके बिना बन्धु-बान्धवों, गुरुजनों तथा अन्य सुहृदोंको कैसे मुँह दिखाऊँगी? इसलिये नाथ! मैं आपके साथ ही अग्निमें प्रवेश करूँगी। यह बात मैं शपथ खाकर कहती हूँ। महामते! जितने उपवास आपने किये हैं, उतने ही मुझे भी हुए हैं। इस दशामें आपको छोड़कर मैं घर कैसे जा सकती हूँ।

अपनी पत्नीका ऐसा निश्चय जानकर ब्राह्मणने चिता तैयार करवायी और अपनेको जला डालनेके लिये वह पत्नीके साथ ही चितापर बैठा। फिर मन-ही-मन भगवान् सूर्यका ध्यान करके उसने ज्यों ही आग अपने हाथमें ली, त्यों ही तीन महातेजस्वी पुरुष उसके सामने उपस्थित हो गये। वे ही भगवान् सूर्यके तीनों विग्रह थे। उनका दर्शन करके ब्राह्मण उसी क्षण कोढ़के रोगसे मुक्त तथा सुन्दर कान्तिसे सुशोभित तरुण हो गया। इस प्रकार उस क्षेत्रके तीनों सूर्य बहुत प्रसिद्ध हैं। उनके दर्शनसे भी सबको अभीष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती है।


चन्द्रदेवके मन्दिरके निर्माणका महत्त्व, अम्बावृद्धाके दर्शनकी महत्ता, शन्तनुके राज्यमें अवर्षण, अग्नितीर्थका प्राकट्य और अग्निको ब्रह्माका वरदान

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रमें परम शुभदायक चन्द्रमाका भी मन्दिर है, जिसके दर्शनसे ही मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। चन्द्रग्रहणके समय अथवा सोमवारके दिन जो वहाँ चन्द्रदेवका दर्शन करता है, वह पापी हो तो भी नरकको नहीं देखता। यह समस्त संसार सोममय है, अतः सोमके प्रतिष्ठित होनेसे सम्पूर्ण त्रिलोकी ही प्रतिष्ठित हो जाती है। ये अन्न आदि सब ओषधियाँ, ये खेतोंमें लहरानेवाले सस्य, जिनके आश्रयसे समस्त जीव जीवन धारण करते हैं, सब सोममय ही हैं। ब्रह्मा आदि देवता क्रमशः सोमको पाकर परम तृप्तिको प्राप्त होते हैं, अतः सोम श्रेष्ठ माने गये हैं। अग्निष्टोम आदि यज्ञ भी सोममें ही प्रतिष्ठित हैं। इस कारण सोम सम्पूर्ण देवताओंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। वे देवता और दैत्य दोनोंके पूज्य हैं। जिस प्रकार पृथ्वीपर अन्य देवेश्वरोंके मन्दिर बनाये जाते हैं, वैसे ही निशानाथ चन्द्रमाका भी मन्दिर बनवाना चाहिये। जिन मनुष्योंने भूतलपर निशानाथ चन्द्रदेवका मन्दिर बनाया है, वे पुण्यराशिका संचय करके मोक्षपदको प्राप्त हो चुके हैं।

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १११५

हाटकेश्वरक्षेत्रमें जो निशानाथ चन्द्रमाका मन्दिर है, उसे महाराज अम्बरीषने बनवाया था। उसीके उत्तर भागमें चन्द्रमाका एक दूसरा मन्दिर भी है, जो महाराज धुन्धुमारके द्वारा स्थापित किया गया है। उसके प्रभावसे वे दोनों राजा जन्म-मृत्युरहित परम सिद्धिको प्राप्त हुए। इसी प्रकार प्रभासक्षेत्रमें महाराज इक्ष्वाकुने श्रद्धापूर्वक चन्द्रमाके तीसरे मन्दिरकी प्रतिष्ठा की है। पृथ्वीपर इन तीन मन्दिरोंको छोड़कर दूसरा कोई चन्द्रमाका मन्दिर नहीं है। चन्द्रमाका यह उत्तम माहात्म्य बताया गया, जो पढ़ने और सुननेवालोंके समस्त पापोंका नाश करनेवाला है।

जिस समय महाराज चमत्कारने इस चमत्कारपुरका निर्माण किया था। उसी समय उस नगरकी रक्षाके लिये ब्राह्मणोंकी सम्मतिसे उन्होंने देवियोंकी भी स्थापना की थी। उन दिनों राजा चमत्कारके दो कन्याएँ थीं। जिनमें एकका नाम था—अम्बा और दूसरीका वृद्धा। उन दोनोंका पाणिग्रहण काशिराजने गृह्यसूत्रमें बतायी हुई विधिके अनुसार देवता, ब्राह्मण और अग्निके समीप किया। एक समय काशीनरेशका यवनोंके साथ घोर युद्ध हुआ। जिसमें भयानक यवनोंके द्वारा प्रतापी काशिराज भृत्य, सेना तथा वाहनोंसहित मारे गये। अम्बा और वृद्धा यह दुःखद वैधव्य पाकर मनोवांछित फल देनेवाले हाटकेश्वरक्षेत्रमें गयीं और देवीके आराधनमें संलग्न हो शुभदायक तप करने लगीं। इसी समय प्रतापी नरेश चमत्कारने उनके लिये कैलास-शिखरके समान ऊँचा मन्दिर बनवाया। तबसे लेकर उस महान् अभ्युदयशाली क्षेत्रमें वे दोनों अम्बा-वृद्धाके नामसे प्रसिद्ध हुईं। वे दोनों देवियाँ सदा नगररक्षाके कार्यमें तत्पर रहती हैं। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर उन दोनोंका मुख देखता है, उसको एक वर्षतक किसी प्रकारका दोष नहीं प्राप्त होता। जो वर्षके आदि अथवा अन्तमें उन दोनोंकी प्रसन्नताके लिये पूजा करता है, उसे भूतलपर किसी प्रकारका छिद्र नहीं प्राप्त होता। जो पुरुष यात्राके समय उन दोनोंके लिये पूजन करता है, वह मनोवांछित फल पाकर शीघ्र अपने घर लौटता है। जो महानवमीके दिन श्रद्धापूर्वक अम्बा-वृद्धाकी प्रसन्नताके लिये पूजा करता है, वह अकण्टक होकर रहता है।

पूर्वकालमें प्रतीप नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। वे बड़े ही शूरवीर तथा ब्रह्मज्ञानी थे। उनका जन्म चन्द्रवंशमें हुआ था। राजा प्रतीपके दो पुत्र हुए, जो समस्त शुभलक्षणोंसे सुशोभित थे। उनमें पहलेका नाम देवापि और दूसरेका शान्तनु था। कुछ कालके बाद नृपश्रेष्ठ प्रतीप जब ब्रह्मलीन हो गये, तब देवापिने राज्यका त्याग करके तपस्याके लिये वनको प्रस्थान किया। तब उनके छोटे भाई शान्तनुको सब मन्त्रियोंने पिता-पितामहोंके राज्यपर बिठाया। राजा शान्तनुके राज्य करते समय इन्द्रने बारह वर्षोंतक वृष्टि रोक दी। इससे सब लोग बड़ी कठिनाईमें पड़ गये और भूखसे पीड़ित रहने लगे। यदि दैवयोगसे किसीके पास कहीं थोड़ा भी कच्चा या पका अन्न दिखायी देता तो उसे दूसरे बलवान् लोग बलपूर्वक छीन लेते थे। सारे वृक्ष और जलाशय सूख गये। गंगा आदि नदियोंमें भी बहुत थोड़ा जल रह गया। इस प्रकार वर्षा बंद होनेपर धर्मका मार्ग नष्ट हो गया। सम्पूर्ण जगत् हड्डियोंसे भर गया। कोई भी यज्ञ, स्वाध्याय तथा व्रतका पालन नहीं करता था। तब अग्निदेव इन्द्रपर क्रोध करके भूमण्डलवासियोंके लिये अदृश्य हो गये। इसी समय ब्रह्मा और विष्णुको आगे करके सब देवता अग्निकी खोज करनेके लिये पृथ्वीपर घूमने लगे। इधर अग्निदेव हाटकेश्वरक्षेत्रमें ब्रह्माजीके स्थानसे ईशानकोणमें स्थित गम्भीर जलाशयके भीतर प्रवेश कर गये। देवता उन्हें खोजते हुए वहाँ आ पहुँचे। देवताओंको आया देख अग्निदेव उस स्थानसे निकले। तब महात्मा ब्रह्माजीने पूछा—'अग्ने ! तुम देवताओंको देखकर क्यों अन्यत्र चले जाते हो ? तुम्हीं सबके आदि हो और तुम्हीं इन सबके मुखरूपसे जगत्में प्रतिष्ठित हो। तुममें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यको प्राप्त होती है, सूर्यसे वृष्टि होती है और वृष्टिसे अन्न उत्पन्न होता

१९१६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

है। फिर अन्नसे प्रजाका जीवन चलता है, इसलिये तुम्हीं जगत्के धाता और विधाता हो। तुम्हारे सन्तुष्ट रहनेपर सम्पूर्ण जगत् सुरक्षित रहता है और तुम्हारे कुपित होनेपर इसका नाश हो जायगा। अग्निष्टोम आदि सम्पूर्ण यज्ञ तुममें ही प्रतिष्ठित हैं और सम्पूर्ण भूत-प्राणी तुम्हारे ही आश्रयसे जीवित रहते हैं। अग्निदेव ! तुम समस्त भूतोंके भीतर सदा विचरते हो, क्योंकि उदरस्थित अन्न और जलका पाचन तुम्हीं करते हो। अतः सम्पूर्ण देवताओंपर कृपा करो और अपने क्रोधका कारण बताओ। तुम क्यों सबको त्यागकर चले गये थे?'

सूतजी कहते हैं—ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर अग्निदेवने क्रोध त्याग दिया और प्रेमसे कहा—'कमलोद्भव ! इन्द्रने वृष्टि रोक दी, जिससे अन्न आदि ओषधियोंका सर्वनाश हो गया। अतः उन्हींपर क्रोध करके मैं संसारको छोड़कर अदृश्य हो गया था।' यह सुनकर ब्रह्माजीने कहा—'इन्द्र ! अग्निदेव ठीक ही कहते हैं, तुम संसारमें वर्षा क्यों नहीं करते?'

इन्द्रने कहा—पितामह ! अपने बड़े भाईका उल्लंघन करके शन्तनु समूची पृथ्वीका राजा बन बैठा है। इसीलिये मैंने उसके राज्यमें वर्षा रोक दी है। अब आप ही प्रमाण हैं, कहिये मैं क्या करूँ?

ब्रह्माजी बोले—इस उल्लंघनका फल तो उस राजाने पा लिया। अब मेरे कहनेसे तुम शीघ्र ही वर्षा करो, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् अकाल और क्षुधाद्वारा नष्ट होनेसे बच जाय।

तब इन्द्रने शीघ्रतापूर्वक पृथ्वीपर वर्षा करनेके लिये पुष्करावर्तक नामवाले मेघोंको आज्ञा दी। आज्ञा पाते ही उन्होंने बिजली चमकाते और गर्जते हुए क्षणभरमें पृथ्वीको जलसे परिपूर्ण कर दिया। तत्पश्चात् देवताओंसहित ब्रह्माजीने अग्निसे कहा—'पावक ! तुम अग्निहोत्रमें ब्राह्मणोंके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हो जाओ और मुझसे मनोवांछित वर माँगो।'

अग्नि बोले—यह पवित्र जलाशय भूतलपर अग्नितीर्थ कहलाये। जो प्रातःकाल उठकर श्रद्धापूर्वक इसमें स्नान करनेके पश्चात् अग्निसूक्तका जप करके आदरके साथ आपका दर्शन करे, उसको आप मेरे अनुरोधसे पूर्णतः सन्तुष्ट करें।

ब्रह्माजीने कहा—अग्ने ! जो वेदवेत्ता द्विज प्रातःकाल उठकर यहाँ स्नान और अग्निसूक्तका जप करनेके पश्चात् मेरा दर्शन करेगा, उसे अग्निष्टोम यज्ञका सम्पूर्ण फल प्राप्त होगा।

अग्निदेव बोले—लोकेश्वर ! बारह वर्षोंतक मुझे कभी तृप्ति नहीं प्राप्त हुई। मर्त्यलोक भूखसे पीड़ित था; अतः मुझे कहीं कुछ नहीं मिला। इसलिये पुनः यहाँ अन्नमय यज्ञ हो।

ब्रह्माजी बोले—हुताशन! यहाँ जो कोई ब्राह्मण निवास करते हैं, वे वसुधाराकी आहुतिसे तुम्हें रात-दिन भक्तिपूर्वक तृप्त करते रहेंगे। इससे तुम पूर्णतः पुष्ट हो जाओगे और उनके भी मनोवांछित मनोरथ पूर्ण होंगे। संक्रान्तिके समय जो वसुधारा प्रदान करनेवाले ब्राह्मण तुम्हारे मुखमें आहुति डालेंगे, उनके जीवभरके अज्ञानजनित पाप नष्ट हो जायँगे। तुम्हारे सन्तुष्ट होनेपर आगे चलकर उशीनर देशमें शिवि नामसे सुविख्यात राजा होंगे, जो श्रद्धापूर्वक द्वादशवार्षिक (बारह वर्षोंतक चालू रहनेवाला) यज्ञ करके वसुधारा देकर तुम्हें वर्षों तृप्त करते रहेंगे। इससे तुम्हें उत्तम पुष्टि प्राप्त होगी। भूतलपर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ सब मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे। आजसे लेकर शान्तिक या पौष्टिक जो भी कर्म होगा, वसुधारासे युक्त होगा और तुम्हें परम तृप्ति प्रदान करनेवाला होगा।

अग्निदेवसे ऐसा कहकर लोकपितामह ब्रह्माजी इन्द्र, विष्णु और शिव आदि देवताओंके साथ ब्रह्मलोकको गये। वहाँसे सब देवता अपने-अपने धामको चले गये। अग्निदेव ब्राह्मणोंके अग्निहोत्र गृहमें प्रकट हुए और विधिपूर्वक प्राप्त वसुधारा होम ग्रहण करने लगे। इस प्रकार हाटकेश्वरक्षेत्रमें परम उत्तम अग्नितीर्थ प्रसिद्ध हुआ, जहाँ प्रातः स्नान करके मनुष्य दिनभरके पापसे मुक्त हो जाता है।

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* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १११७

ब्रह्मकुण्ड तथा गोमुखतीर्थकी उत्पत्तिकथा एवं महिमा

सूतजी कहते हैं—महात्मा मार्कण्डेयजीने जिस समय ब्रह्माजीका स्थापन किया था, उसी समय वहाँ पवित्र जलसे युक्त एक कुण्डका भी निर्माण किया और उसके माहात्म्यके विषयमें इस प्रकार कहा—'कार्तिक मासमें चन्द्रनक्षत्र कृत्तिकाके योगमें जो यहाँ भलीभाँति भीष्मव्रतका पालन करेगा, वह उत्तम ब्रह्मलोकमें जायगा।' ऐसा कहते हुए मार्कण्डेयजीके उस वचनको किसी पशुपाल (चरवाहे)-ने सुना और श्रद्धासे प्रेरित होकर उसने कार्तिक मासमें भीष्मपंचक-व्रतका विधिपूर्वक पालन किया। जब कृत्तिका नक्षत्रसे युक्त पूर्णिमा आयी तब उसमें स्नान करके ब्रह्माजीकी पूजा की। उसके बाद पुरुषोत्तम भगवान् विष्णुका भी विधिपूर्वक पूजन किया। तदनन्तर काल आनेपर उसकी मृत्यु हो गयी और वह इसी नगरमें ब्राह्मणके घरमें उत्पन्न हुआ। उस समय उसे अपने पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण बना हुआ था। एक दिन उसने लोगोंके पूछनेपर बताया कि किसी समय महामुनि मार्कण्डेयके मुखसे मैंने ब्रह्मकुण्डका माहात्म्य सुना और कार्तिक मासमें उस शुभदायक कुण्डके जलमें विधिपूर्वक स्नान किया था। उसीके प्रभावसे इस जन्ममें मैं ब्रह्मर्षि चन्द्रात्रेयके वंशमें उत्पन्न हुआ हूँ और पूर्वजन्मकी सब बातोंको भी स्मरण करता हूँ। कार्तिक पूर्णिमाको कृत्तिकानक्षत्रका योग होनेपर यहाँका महत्त्व बढ़ जाता है, इस बातको मैं अनुभव कर चुका हूँ। इसीलिये सदा उत्तम भीष्मपंचक-व्रतका पालन करता हूँ।

इस प्रकार उसकी बात सुनकर अन्य सब श्रेष्ठ ब्राह्मण भी श्रद्धापूर्वक भीष्मपंचक-व्रतका पालन करने लगे। तभीसे उत्तर दिशामें वह कुण्ड इस पृथ्वीपर ब्रह्मकुण्डके नामसे विख्यात हुआ। जो ब्राह्मण सदा उसमें स्नान करता है, वह प्रत्येक जन्ममें श्रेष्ठ ब्राह्मण ही होता है।

वहीं एक गोमुख नामसे प्रसिद्ध अतिशय शोभायमान तीर्थ है, जो सब पातकोंका नाश करनेवाला है। पूर्वकालमें चमत्कारपुरके भीतर गौओंका पालन करनेवाला एक ब्राह्मण था, जो कुष्ठरोगसे पीड़ित हो अत्यन्त दुर्बल हो गया था। किसी समय उसी मार्गसे उसकी गौओंका झुंड आ निकला। वे सभी गौएँ प्याससे कष्ट पा रही थीं। उस दिन ज्येष्ठ मासकी एकादशी तिथिमें चित्रा नक्षत्रका योग था और मध्याह्नकाल हो गया था। यद्यपि वहाँ घास बहुत उगी थी, फिर भी गरमी और प्यासके कष्टसे किसी भी धेनुने उस घासकी ओर देखातक नहीं। उनमेंसे एक गौने दूरसे ही घासके उस पुंजको देखा और अत्यन्त हर्षमें भरकर तुरंत ही वहाँ जा दाँतोंसे उखाड़कर खींचा। इतनेमें ही उस घासके नीचेसे जलकी धारा निकल आयी। उस प्याससे कष्ट पाती हुई गायने घासको खा धीरे-धीरे दुग्धके समान स्वच्छ एवं मधुर प्रतीत होनेवाले उस जलको जी भरकर पीया। जब वह वेगपूर्वक जल पी रही थी, उसी समय पृथ्वीपर वहाँ जलसे भरे हुए अनेक लंबे-चौड़े गड्ढे प्रकट हो गये। तदनन्तर दूसरी सैकड़ों गौओंने भी उस अत्यन्त निर्मल अमृतरसके समान मधुर जलका पान किया। जैसे-जैसे गौएँ आकर जल पीती थीं, वैसे-ही-वैसे उनके मुखके स्पर्शसे वे गड्ढे बढ़ते जाते थे। इस प्रकार जब सभी गौओंने पानी पीकर प्यासको बुझा लिया, तब वह प्यासा गोपालक ब्राह्मण जलमें घुसा। अपने अंगोंको धोकर और जल पीकर ज्यों ही वह जलसे बाहर निकला त्यों ही अपने शरीरको उसने सूर्यके समान तेजस्वी देखा। इससे उसको बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने घर जाकर सब लोगोंके सामने वहाँका सब वृत्तान्त कह सुनाया। तब वहाँके सब लोग, विशेषतः रोगी मनुष्य, उस दिव्य जलके पास गये और सबने एकाग्रचित्त होकर वहाँ स्नान किया। स्नान करते ही सब लोग तत्काल

११९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

रोगों और पापोंसे मुक्त हो गये। तबसे वह जल गोमुख तीर्थके नामसे विख्यात हुआ; क्योंकि वह गौओंके मुखसे प्रकट हुआ था।

ऋषि बोले—सूतनन्दन! उस स्थानसे जो वैसा माहात्म्यपूर्ण जल प्रकट हुआ, इसका क्या कारण है?

सूतजीने कहा—महर्षियो! यहाँ पूर्वकालमें महाराज अम्बरीषने तप किया था। तपस्याका कारण यह था कि राजाको वृद्धावस्थामें एक पुत्र हुआ। उसका नाम सुवर्चा था। पूर्वजन्मके कर्मके फलसे बाल्यावस्थामें ही राजकुमार सुवर्चा कोढ़ी हो गये। इससे राजाको बड़ा दुःख हुआ। तब वे सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले हाटकेश्वरक्षेत्रमें गये और पुत्रके रोगका निवारण करनेके लिये उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की। इससे सन्तुष्ट होकर भगवान् विष्णुने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और आदरपूर्वक कहा—'वत्स! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ, तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे माँगो।'

राजाने कहा—केशव! मेरा पुत्र बाल्यावस्थामें ही कुष्ठरोगसे पीड़ित हो गया है। आप इसके रोगका निवारण करें।

उनके ऐसा कहनेपर भगवान् विष्णुने एकाग्रमनसे पातालगंगाका स्मरण किया। भगवान्‌के स्मरण करनेपर पातालगंगा एक छोटा-सा विवर बनाकर तत्काल ऊपर आ गयीं। तब श्रीहरिने राजासे कहा—'तुम्हारा पुत्र इस उत्तम गंगाजलमें स्नान करे।' यह आज्ञा पाकर अम्बरीषने अपने पुत्रको श्रीहरिके सामने ही पातालगंगाके जलमें नहलाया। वहाँ स्नान करनेमात्रसे ही वह बालक उसी क्षण कुष्ठरोगसे मुक्त हो बालसूर्यके समान तेजस्वी हो गया। तब उसने भगवान्‌को नमस्कार किया। इस बातको कोई जानता नहीं था, इसलिये वह सर्वपापहारी जल वहाँ गुप्त ही रहा। वही पुनः गोमुखद्वारा पृथ्वीपर प्रकट हुआ। आज भी उस जलके स्पर्शसे वहाँका धरातल अत्यन्त पवित्र है। जो पुरुष रविवारको सूर्योदयके समय वहाँ स्नान करता है, उसके गलगण्ड (घेघा) आदि सब रोग तत्काल नष्ट हो जाते हैं। पापजनित बड़ी भयंकर व्याधियाँ भी निवृत्त हो जाती हैं। फोड़े और चेचक आदिके उपद्रव भी शान्त हो जाते हैं। जो मनुष्य निष्कामभावसे भक्तिपूर्वक इस तीर्थमें स्नान करता है, वह देवदेव चक्रपाणि श्रीहरिके लोकमें जाता है। जिस दिन भगवान् विष्णुने वहाँ गंगाको प्रकट किया था, उस दिन सूर्य वृषराशिपर स्थित थे और चन्द्रमा चित्रानक्षत्रकी शोभा बढ़ा रहे थे तथा भगवान् विष्णुकी एकादशी तिथि भी विद्यमान थी। फिर गायके मुखसे जिस दिन घासोंका समूह उखाड़ा गया और गंगा भूतलपर प्रकट हुईं, उस दिन भी पूर्वोक्त योग ही था। अतः वही वहाँके लिये उत्तम पर्व है।


परशुरामद्वारा लोहयष्टिकी स्थापना और उसकी महिमा, देवीकुण्डका माहात्म्य, देवीकी कृपासे अजको दिव्यास्त्रोंकी प्राप्ति तथा पातालगमन

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! जिस समय परशुरामजीने रामकुण्डमें जाकर अपने पितरोंका तर्पण किया और यज्ञमें सारी पृथ्वी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको देकर वे क्रोधरहित हो गये, उस समय समुद्र-स्नानके लिये हर्षपूर्वक प्रस्थित हुए। उस यात्राके समय भी उन्होंने अपने हाथमें सूर्यके समान तेजस्वी कुठार ले रखा था। तब समस्त ऋषि-मुनियोंने परशुरामजीसे कहा—'महाभाग राम! आप पुण्यकार्य करनेके लिये जाते समय भी जो हाथमें शस्त्र धारण करते हैं, यह उचित नहीं जान पड़ता। जबतक आपके हाथमें कुठार रहेगा, तबतक आपका क्रोध शान्त नहीं होगा। इसलिये इसे त्याग दीजिये।'

मुनियोंकी यह बात सुनकर परशुरामजीने हाथ जोड़कर विनीतभावसे कहा—विप्रवरो!

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १११९

यह कुठार अक्षय है और भगवान् शंकरके तेजसे प्रकट हुए लोहका बना हुआ है। साक्षात् विश्वकर्माने इसका निर्माण किया है। ऐसे दिव्य शस्त्रको त्यागकर मैं क्षात्रधर्ममें तत्पर होकर भी कैसे दिग्दिगन्तमें जा सकता हूँ? मेरे छोड़े हुए इस कुठारको यदि दूसरा कोई ग्रहण कर लेगा, तो वह मेरेद्वारा वध्य होगा। अतः यदि इसे छोड़ भी दूँ, तो मेरे मनमें शान्ति नहीं रहेगी। मैं इसे तभी छोड़ सकता हूँ, जब आपलोग इसकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करें।

ब्राह्मणोंने कहा—महाभाग! यदि तुम इस कुठारको हमें रक्षाके लिये सौंपते हो, तो इसका खण्ड-खण्ड करके दो। तभी हम यत्नपूर्वक इसकी रक्षा करेंगे। उस दशामें कोई इसे लेगा भी नहीं।

मुनियोंकी यह बात सुनकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने उस कुठारको तोड़कर लोहेकी छड़ी बनवा दी और उसे उन ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक सौंप दिया।

ब्राह्मण बोले—राम! आपके कुठारकी बनी हुई इस लोहेकी छड़ीको हमलोग बड़े यत्नसे रखेंगे। जैसे कुमार कार्तिकेयकी शक्तिमयी कीर्ति यहाँ प्रतिष्ठित है, उसी प्रकार आपकी लोहयष्टिमयी कीर्ति भी यहाँ प्रतिष्ठित हो गयी। जो राज्यभ्रष्ट राजा इस लोहदण्डकी आराधना करेगा, वह शीघ्र ही अपने राज्यको पाकर प्रतापी होगा। जो द्विज सदा विद्याके लिये इस लोहयष्टिकी पूजा करेगा, वह उत्तम विद्या पाकर सर्वज्ञताको प्राप्त होगा। जो पुत्रहीन पुरुष अथवा स्त्री आपके इस लोहदण्डकी पूजा करेंगे, वे पुत्रवान् होंगे। जो आश्विन मासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी तिथिको उपवास करके इसकी पूजा करेगा, वह समस्त मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त करेगा।

ऐसा सुनकर परशुरामजीने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको प्रणाम करके तुरंत ही समुद्रकी ओर प्रस्थान किया और वे ब्राह्मण भी उस लोहयष्टिके लिये उत्तम मन्दिर बनवाकर उसमें उसकी स्थापना करके एकाग्रचित्त हो उसकी पूजा करने लगे। इससे उन्होंने अपने देवदुर्लभ मनोरथोंको भी प्राप्त कर लिया।

सूतजी कहते हैं—प्राचीनकालमें अज नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं। उनका सत्पुरुषोंमें भी बड़ा सम्मान था। वे माता-पिताकी भाँति सब लोगोंका हित करनेवाले थे। उन्होंने पिता-पितामहका राज्य पाकर मन-ही-मन यह विचार किया कि 'मुझे ऐसा कर्म करना चाहिये, जिसे संसारके दूसरे राजाओंने अबतक न किया हो और जो भविष्यमें होनेवाले हैं, वे भी जिसे न कर सकें। राजाओंके लिये सर्वोत्तम धर्म यही है कि प्रजाका भलीभाँति पालन करे, जिससे प्रजावर्गके लोग सुखपूर्वक रह सकें। राजालोग लोभमें आकर जैसे-जैसे प्रजासे अधिक कर लेने लगते हैं, वैसे-वैसे प्रजाके हृदयमें क्षोभ उत्पन्न हो जाता है। राजा कर लिये बिना हाथी, घोड़े और पैदल आदि सेनाकी रक्षा नहीं कर सकते और यदि सेना न रहे तो नीच-से-नीच भी मनुष्य उन्हें दबा लेंगे। इसीलिये सब राजा प्रजाजनोंसे कर लेते हैं। अतः मुझे हाथी, घोड़े और पैदल आदिके बिना ही केवल तपस्याकी शक्तिसे अपने राज्यको निष्कण्टक बनाये रखना चाहिये।'

ऐसा सोचकर वे कर न लेकर सदा प्रजाको प्रसन्न रखने लगे। दूसरे राजाओंसे भी कर लेना उन्होंने बंद कर दिया और अपने पुरोहित मुनिवर वसिष्ठको आदरपूर्वक बुलाकर पूछा—'ब्रह्मन्! इस भूतलपर सबसे उत्तम तीर्थ कौन है, जहाँ थोड़े ही समयमें भगवान् शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु प्रसन्न हो जाते हैं। उसे शीघ्र बताइये। जिससे मैं वहाँ जाकर सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये तपस्या करूँ।'

वसिष्ठजी बोले—नृपश्रेष्ठ! हाटकेश्वरक्षेत्र मनीषियोंको शीघ्र ही उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला तथा सब पातकोंका नाशक है। वही सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ है। इसी प्रकार देवताओंमें भी भगवती चण्डिका ही ऐसी हैं, जो श्रद्धालु मनुष्योंद्वारा

१९२०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आराधना करनेपर शीघ्र सन्तुष्ट होती हैं। इसलिये उसी क्षेत्रमें जाकर तुम श्रद्धापूर्वक देवीकी आराधना करो। ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए पवित्र व्रतमें तत्पर रहो। नियमपूर्वक रहते हुए नियमित भोजन एवं त्रिकाल स्नान करो।

वसिष्ठजीके बताये अनुसार राजा अजने हाटकेश्वरक्षेत्रमें देवीकी आराधना की। गन्ध, पुष्प और अनुलेपन आदि उपचारोंके द्वारा निरन्तर पूजामें तत्पर हुए राजापर देवी चण्डिका प्रसन्न हुईं और बोलीं—'वत्स ! मैं तुम्हारे इस व्रत और पूजाविधानसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसे माँगो। मैं उसे शीघ्र पूर्ण करूँगी।'

राजाने कहा—देवि! मैंने सम्पूर्ण लोकोंके हितकी इच्छासे इस व्रत और तपस्याका आश्रय लिया है। जिससे सब लोगोंको सुख मिले, ऐसी कृपा कीजिये। मुझे बहुत-से ऐसे ज्ञानयुक्त विचित्र-विचित्र अस्त्र दीजिये, जो स्वेच्छानुसार सर्वत्र विचर सकें। जो इस भूतलपर स्थित और मेरे पासकी भी सब वस्तुओंको भी स्वतः जान लें। लोकमें परस्त्रीसंगम आदि जो अपराध हों, उन सबको स्वयं जानकर अपराधके अनुसार जो स्वतः दण्ड दे दें, जिससे लोकमें संकरता न फैलने पावे। इसके सिवा मुझे भाँति-भाँतिके मन्त्र दीजिये, जिनसे मैं सबकी रोग-व्याधियोंको शीघ्र निवारण कर सकूँ। जिससे मेरे राज्यमें रहनेवाले सब मनुष्य सुखी, नीरोग, पुष्ट, निर्भय तथा शोकरहित हो जायँ।

देवी बोलीं—राजन् ! तुमने यह एक ऐसा बड़ा अद्भुत कर्म प्रारम्भ किया है, जिसे अबतक न तो किसीने किया है और न आगे कोई करेगा। तथापि मैं तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूँगी। मैं तुम्हें समस्त ज्ञानयुक्त शस्त्र देती हूँ और वैसे ही प्रभावशाली मन्त्र देती हूँ। इन मन्त्रोंसे बड़े-बड़े भयंकर रोग भी तुम्हारे द्वारा रोक दिये जायँगे, परंतु मेरे मन्त्रोंसहित उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको तुम सदा सुरक्षित रखना। यदि वे तुम्हारी दृष्टिसे कहीं दूर निकल जायँगे तो मनुष्योंको बहुत अधिक पीड़ा देंगे। राजन् ! तुम जब स्वर्गलोकको जाओ तब इन समस्त मन्त्रों और अस्त्र-शस्त्रोंको यहाँ मेरे सम्मुख जलमें स्थापित कर देना, जिससे सब व्यवहार पूर्ववत् नीतिके अनुकूल चल सके।

'बहुत अच्छा' कहकर राजाने देवीकी आज्ञा शिरोधार्य की। फिर तो उनके सामने वे ज्ञान-वैभवसे युक्त नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र प्रकट हुए, जिनके लिये उन्होंने देवीसे प्रार्थना की थी। साथ ही, व्याधिनाशक मन्त्र भी उनके ज्ञानमें आ गये, जिनके द्वारा सब रोग स्वेच्छानुसार ग्रहण किये और छोड़े जाते हैं तथा जिनके द्वारा दृष्टिमें आये हुए सब मनुष्योंका सुखपूर्वक पालन होता है।

तत्पश्चात् राजाने देवीके प्रसादको ग्रहण करके अपनी पत्नी इन्दुमति और पुत्र दशरथको छोड़कर शेष समस्त पदार्थों और हाथी-घोड़े आदि उपकरणोंको ब्राह्मणोंकी सेवामें दान कर दिया। रोग-व्याधियोंको मन्त्रोंके द्वारा दूर करके वे डंडा लेकर अजापालनकी तरह स्वयं प्रजापालन करने लगे। उनके राज्यमें कोई छिपकर भी अपराध नहीं कर पाता था। यदि कोई प्रमादवश पृथ्वीपर पाप करता तो उसे तत्काल ही तदनुकूल दण्ड मिल जाता था। राजाके वे दिव्यास्त्र किसीके दृष्टिमें न आकर भी वध अथवा बन्धन आदि दण्ड तत्काल देते थे। अन्य राजाओंके राज्यमें तो जो मनुष्य गुप्त पाप करते थे, उन्हींके पापोंका यमराज दण्ड देते थे; परंतु राजा अजके राज्यमें उन दिव्यास्त्रोंके भयसे डरा हुआ कोई भी मनुष्य पाप नहीं करता था। अतः वे सभी पापमुक्त एवं पवित्र शरीरवाले हो गये। रोगोंका नियन्त्रण हो जानेके कारण सब मनुष्योंको उत्तम सुख प्राप्त होता था। इस प्रकार संसारसे जब पापका भय निवृत्त हो गया, तब यमलोकके सभी नरक सूने हो गये। कोई भी पुरुष नरकमें नहीं

  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११२१

जाता था। सत्ययुगमें लोगोंका जैसा व्यवहार था, वैसा ही त्रेतामें भी हुआ।

एक समय भगवान् शंकर व्याघ्रका शरीर धारण करके बार-बार गर्जना करते हुए जहाँ राजा अज थे, वहीं उपस्थित हो गये। विकराल शरीर धारण करनेवाले उस व्याघ्रको देखकर राजाने भगवतीके दिये हुए सूर्यके समान तेजस्वी अस्त्रका प्रहार किया। क्रमशः देवीसे प्राप्त हुए अन्यान्य अस्त्रोंका भी प्रयोग किया, परंतु उन सभी अस्त्रोंको भगवान् शंकरने धीरे-धीरे अपने मुखमें ग्रहण कर लिया। तब अस्त्रोंके अभावसे राजाने व्याघ्ररूपधारी भगवान् शिवसे द्वन्द्वयुद्ध किया। उनके शरीरका स्पर्श होते ही भगवान् शिवने व्याघ्रशरीर त्याग दिया और भस्मांगराग-विभूषित, चन्द्रार्धमुकुटमण्डित दिव्यरूप धारण कर लिया। उनके गलेमें मुण्डमाला शोभा पा रही थी। उन्होंने खट्वांग तथा सर्पमय आभूषण धारण कर रखे थे। भगवान् शिवको इस रूपमें प्रत्यक्ष देखकर रानीसहित राजा अजने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। तत्पश्चात् उनकी स्तुति करके वे विनीतभावसे हाथ जोड़कर खड़े हो गये और आनन्दाश्रु बहाते हुए हर्षगद्गद वाणीमें बोले—'प्रभो! मैंने अज्ञानवश जो आपका तिरस्कार किया और आपके ऊपर अस्त्र चलाया, वह सब अपराध कृपया क्षमा करें।'

भगवान् शिव बोले—बेटा! तुम्हारा अलौकिक कर्म देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ, अतएव उस तिरस्कारको मैंने अपनी स्वाभाविक क्षमासे ही क्षमा कर दिया है। राजन्! तुमने जैसा राज्य किया, जिस प्रकार प्रजाकी रक्षा की, वैसी राज्यव्यवस्था अबतक न तो किसीने की थी और न कोई आगे करेगा ही। अतः तुम अभी अपनी इन रानीके साथ इसी शरीरसे पाताललोकमें चलो।

राजाने कहा—भगवन्! मैं अयोध्या नामक महापुरीमें अपने पुत्र दशरथको राजसिंहासनपर बिठाकर उसे मन्त्रियोंके अधीन सौंपकर आपकी आज्ञाका पालन करूँगा। जिन्होंने सन्तुष्ट होकर मुझे अस्त्र-शस्त्र तथा यन्त्रसमुदाय दिये थे, उन महादेवीने यह आज्ञा की थी कि 'जब तुम दुस्त्यज मर्त्यलोकका त्याग करने लगो, तब मेरे कुण्डमें इन सबको डाल देना।' अतः आप उन सब अस्त्र-शस्त्रोंको मुझे पुनः लौटा दें, जिससे मैं देवीके ऋणसे उऋण हो जाऊँ।

उनके ऐसा कहनेपर भगवान् त्रिपुरारिने राजाको वे दिव्य अस्त्र-शस्त्र लौटा दिये और आज्ञा देते हुए कहा—राजन्! तुम्हारा पुत्र स्वयं ही राजा हो जायगा। वह वीरता, उदारता और शम आदि गुणोंसे सम्पन्न हो तुम्हारे वंशको धारण करनेमें समर्थ होगा। तुम आज ही मेरे साथ इस देवीकुण्डके पवित्र जलमें प्रवेश करके मेरे धामको चलो। आज माघ शुक्ला चतुर्दशीका दिन है। दूसरा कोई भी जो पुरुष इस तिथिको देवीकी भक्तिपूर्वक पूजा करके इस जलमें गोता लगाकर प्राण त्याग करेगा, वह पाताललोकमें, जहाँ हाटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध मेरा दिव्य विग्रह है, वहाँ पहुँच जायगा। नृपश्रेष्ठ! जो इस तीर्थमें केवल स्नानमात्र करेगा, उसके एक सौ आठ रोगोंमेंसे एक भी न होगा।

ऐसा कहकर भगवान् शिवने रानी तथा उन अस्त्र-शस्त्रोंके सहित राजाको साथ लेकर उस देवीकुण्डके जलमें प्रवेश किया और वहाँसे उन्हें अपने धाममें पहुँचा दिया। उसी मानवशरीरसे राजा अज अपनी रानीके साथ आज भी अजर-अमर होकर वहाँ पातालमें रहते हैं और हाटकेश्वर भगवान्‌की श्रद्धापूर्वक आराधना करते हैं।

इस प्रकार हाटकेश्वरक्षेत्रमें माहेश्वरी देवीका प्रादुर्भाव हुआ है, जिसे राजा अजने श्रद्धापूर्ण हृदयसे स्थापित किया था।

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११२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

राजवापीके प्रसंगमें राजा दशरथका प्रभाव, शनैश्चरग्रहकी पराजय, इन्द्रके साथ राजाकी मैत्री और उनके यहाँ श्रीराम आदिके प्राकट्यकी कथा

सूतजी कहते हैं—राजा अजके पाताललोकमें गमन करनेके पश्चात् उनके पुत्र दशरथ राजा हुए। मन्त्रियोंने उनको आगे रखा और सदा सम्मान दिया। ये वे ही राजा दशरथ थे, जो प्रतिदिन इन्द्रलोकमें जाते और इन्द्रके साथ क्रीडा करते थे। इन्होंने रोहिणीका भेदन करनेवाले शनैश्चरग्रहको परास्त किया था तथा इनके घरमें साक्षात् भगवान् विष्णुने प्रसन्न होकर रावणका विनाश करनेके लिये अवतार लिया था। राजा दशरथने भी हाटकेश्वरक्षेत्रमें जाकर आराधनाद्वारा भगवान् विष्णुको सन्तुष्ट किया और सुन्दर मन्दिर निर्माण करके वहीं उनको स्थापित किया। वहाँ राजा दशरथकी वापी प्रसिद्ध है, जिसे उन्होंने स्वयं तैयार कराया था। उसे लोकमें 'राजवापी' कहते हैं। जो लोग पंचमीको तथा विशेषतः पितृपक्षमें वहाँ श्राद्ध करते हैं वे सत्पुरुषोंके प्रिय होते हैं।

किसी समय ज्योतिषके विद्वानोंने राजासे यह कहा कि 'शनैश्चर ग्रह रोहिणीका भेदन करेगा और यदि ऐसा हुआ तो संसारमें बारह वर्षोंतक घोर अनावृष्टि होगी, सर्वत्र अकाल पड़ जायगा। उस समय सम्पूर्ण भूमण्डल मनुष्योंसे शून्य हो जायगा।' उनकी यह बात सुनकर राजा दशरथके मनमें शनैश्चरके प्रति बड़ा क्रोध हुआ। राजाको इन्द्रने एक कामग विमान दे रखा था। उसीपर बैठकर दशरथने शनैश्चरपर आक्रमण किया और अपने महान् धनुषको खींचकर उसपर तीखे बाणका सन्धान किया तथा नीचे मुख किये स्थित हुए शनैश्चरके सामने खड़े होकर कहा—'शनैश्चर! मेरे कहनेसे तुम रोहिणीका मार्ग त्याग दो, अन्यथा इस मन्त्रप्रेरित दिव्यास्त्रसे मारकर मैं तुम्हें यमलोक पहुँचा दूँगा।'

उनकी यह भयङ्कर बात सुनकर शनैश्चर देवको बड़ा विस्मय हुआ और वे बोले—महाभाग! तुम कौन हो जो मेरा मार्ग रोकते हो? यह मार्ग तो किसीके द्वारा गम्य नहीं है, देवता और असुर भी यहाँ नहीं आ सकते, फिर तुम कैसे चले आये?

राजाने कहा—मैं सूर्यवंशमें उत्पन्न महाराज अजका पुत्र दशरथ नामक राजा हूँ और क्रोधपूर्वक तुम्हें रोहिणीके मार्गसे हटानेके लिये आया हूँ।

शनैश्चर बोले—राजन्! तुम्हारे साथ तो मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, फिर क्यों तुम अतिशय क्रोधमें आकर मेरा मार्ग रोकना चाहते हो?

राजाने कहा—अभी-अभी ज्योतिषियोंने मुझे बताया है कि तुम (शनैश्चर) रोहिणीचक्रका भेदन करनेवाले हो और यदि तुमने उसका भेदन कर दिया तो इन्द्र वर्षा रोक देंगे। वृष्टि रुक जानेसे पृथ्वीपर अन्न नहीं पैदा होगा और अन्नके अभावसे भूतलके समस्त प्राणी नाशको प्राप्त हो जायँगे। जब सब प्राणियोंका नाश हो जायगा, तब यज्ञ कौन करेगा? फलतः अग्निष्टोम आदि सम्पूर्ण क्रियाएँ पृथ्वीसे उठ जायँगी और ऐसा होनेपर प्रलय मच जायगा। सूर्यनन्दन! इसीलिये मैंने तुम्हारी राह रोकी है।

शनिदेव बोले—बेटा! अपने घरको लौट जाओ। इच्छा हो तो मुझसे भी तुम कोई वर माँगो; मैं तुम्हारे पराक्रमसे सन्तुष्ट हूँ। मैं अपनी दृष्टिसे जिसे देख लूँ, वह भस्म हो जाता है। इसीलिये अपनी दृष्टि सदा नीची किये रहता हूँ। तुमने प्रजावर्गके हितके लिये मेरे भयको त्याग दिया है, अतः तुम्हारे लिये मैं रोहिणीका भेदन नहीं करूँगा।

राजाने कहा—शनिदेव! आपका दिन प्राप्त होनेपर जो मनुष्य अपनी शरीरमें तेल लगाता है, उसको अपना दूसरा दिन आनेतक आप कभी

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पीड़ा न दें। जो आपके सन्तोषके लिये यथाशक्ति लोहा और तिल आदि दान करता है, उसकी एक वर्षतक आप प्रत्येक कष्ट और संकटसे रक्षा करें। सूर्यनन्दन! जब आप कुण्डलीमें पीडाकारक स्थानमें स्थित हों, उस समय जो भक्तिपूर्वक आपके दिवसमें तिल, लोह आदि दान करके विधिवत् शान्तिकर्म और पूजा करे, उसकी साढ़े सात वर्षोंतक आप सदा रक्षा करते रहें, यही मेरे लिये आप वरदान दें।<br>सूतजी कहते हैं—तब शनैश्चरदेवने 'तथास्तु' कहकर राजाकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और वे मौन हो गये। तभीसे राजा दशरथकी बात मानकर शनैश्चरदेव कभी रोहिणीमण्डलका भेदन नहीं करते हैं। इस समाचारको सुनकर इन्द्रदेव बहुत प्रसन्न हुए और राजा दशरथसे मिलकर आदरपूर्वक बोले—'राजन्! तुमने यह बड़ा अद्भुत पराक्रम किया है, दूसरा कोई तो इस बातकी कल्पना भी अपने मनमें नहीं ला सकता। अतः इस पुरुषार्थसे मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ। तुम्हारे मनमें जो कोई अभिलाषा हो उसके अनुसार मुझसे वर माँगो।'<br>राजा बोले—सुरश्रेष्ठ! आपके साथ सदा मेरी मैत्री बनी रहे। यही प्रार्थना करता हूँ।<br>इन्द्रने कहा—राजेन्द्र! ऐसा ही होगा। तुम्हारे साथ मेरी सदैव शाश्वत मैत्री बनी रहेगी। ठीक वैसी ही, जैसी वसु देवताकी मैत्री है। तुम सदैव सन्ध्याके समय मेरे पास आते रहना, जिससेसदैव आपसका मैत्रीभाव बढ़ता रहे।<br>ऐसा कहकर देवराज इन्द्र स्वर्गलोकमें चले गये। राजा दशरथ भी शनैश्चरके भयसे सम्पूर्ण जगत्‌की रक्षा करके हर्षपूर्वक अयोध्यापुरीके भीतर अपने भवनमें लौट आये। तबसे प्रायः नित्य ही सायंकालकी उपासना करके राजा दशरथ इन्द्रलोकको चले जाते थे। वहाँपर देवर्षियोंके मुखसे विचित्र अर्थवाली कथाएँ सुनकर और स्वयं भी कहकर अपने घर लौट आते थे। एक समय इन्द्रसे प्रेरित होकर महाराज दशरथने महर्षि वसिष्ठके द्वारा पुत्रके लिये पुत्रेष्टि नामक यज्ञ कराया। तदनन्तर बड़ी रानी कौशल्याने परम धर्मात्मा पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको जन्म दिया। राजाकी सबसे छोटी रानी कैकेयीने भरत नामक पुत्र उत्पन्न किया और मझली रानी सुमित्राने दो महाबली पुत्रोंको जन्म दिया। जिनके नाम लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे। इनके सिवा सुमित्रासे एक सुन्दरी कन्या भी उत्पन्न हुई, जिसे पुत्रहीन राजा लोमपादको दत्तक पुत्रीके रूपमें दे दिया गया। इस प्रकार पितरोंसे उऋण होकर कृतकृत्य हो राजा दशरथने स्वर्गलोककी यात्रा की। उनके बाद श्रीरामचन्द्रजी चक्रवर्ती राजा हुए, जिन्होंने देवताओंके लिये कण्टकरूप दुर्धर्ष रावणका वध किया और हाटकेश्वरक्षेत्रमें रामेश्वर एवं लक्ष्मणेश्वरकी स्थापना करके मूर्तिमती सीतादेवीको भी प्रतिष्ठित किया था।
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श्रीरामके द्वारा लक्ष्मणका त्याग, लक्ष्मणका परमधाम-गमन, श्रीरामका किष्किन्धा, लंका एवं हाटकेश्वरतीर्थमें जाना और रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर एवं सीता आदिकी प्रतिमा स्थापित करना

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! कमलनयन भगवान् श्रीरामचन्द्रजी लोकापवादके कारण सीताजीका परित्याग करके अयोध्याका राज्य करने लगे। उन्होंने दूसरी किसी स्त्रीको पत्नीरूपमें किसी तरह भी स्वीकार नहीं किया। यज्ञकार्यकीसिद्धिके लिये भी पत्नीके स्थानपर सीतादेवीकी स्वर्णमयी प्रतिमाको ही बिठाया। श्रीरामने ग्यारह हजार वर्षोंतक ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए निष्कण्टक राज्य किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजीके भवनमें एक देवदूत आया और बोला—'भगवन् !