भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1131

११०२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

धेनु बोली—मैं अपने लिये विलाप नहीं करती, भगवान् शिवकी पूजाके लिये आनेपर यदि मेरी मृत्यु भी हो गयी तो यह मेरे लिये शुभदायक ही होगी। किंतु मेरा बछड़ा, जो गोकुल (गौओंके झुंड)-में बँधा हुआ है, मेरे लौटनेकी राह देखता होगा। वह अभी दूध पीकर ही जीता है। सोचती हूँ, वह मेरे बिना कैसे जीवित रहेगा। महाव्याघ्र! बेटेके लिये मेरे हृदयमें स्नेह उमड़ आया है, अतः आज तुम मुझे छोड़ दो। मैं उसे अपनी सखियोंको सौंपकर फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगी।

व्याघ्र बोला—तुम मृत्युके मुखमें आ गयी हो, अब यदि किसी प्रकार निकल जाओगी तो फिर उसी मृत्युके समीप कैसे लौट आओगी?

नन्दिनीने कहा—व्याघ्र! मैं शपथ खाकर कहती हूँ कि तुम्हारे पास लौट आऊँगी। ब्राह्मणकी हत्या करने और माता-पिताको छलनेसे जो पाप होता है, उसी पापसे मैं लिप्त होऊँ यदि पुनः लौटकर न आऊँ। रजस्वला स्त्रीसे सम्पर्क करनेवाले तथा नंगे सोनेवाले पुरुषोंको जो पाप लगता है, मैं उसी पापसे लिप्त होऊँ यदि मैं लौटकर न आऊँ। गौ, कन्या और ब्राह्मणोंको कलंकित करनेवाले लोगोंको जो पाप लगता है, उस पापसे मैं भी लिप्त होऊँ यदि पुनः लौटकर न आऊँ।

इन शपथोंको सुनकर व्याघ्रने कहा—यदि ऐसी बात है तो घरको जाओ और अपने पुत्रको जी भरकर देख लो। फिर उसे सखियोंको सौंपकर लौट आना। तदनन्तर नन्दिनी जहाँ उसका बछड़ा था उस स्थानपर गयी।

माताको रँभाती हुई देखकर बछड़ा बोला—माँ! आज तुम्हारा मन उद्विग्न क्यों हो रहा है?

नन्दिनी बोली—बेटा! पहले दूध पी लो, जिससे तृप्त होनेपर मैं तुमसे सब बात बताऊँ। उसकी बात सुनकर बछड़ेने यथोचित दूध पी लिया।

तत्पश्चात् बछड़ेने इस प्रकार कहा—माँ! आज जंगलमें जो कुछ घटना हुई है वह सब बताओ, जिसे सुनकर मेरा चित्त शान्त हो।

नन्दिनी बोली—वत्स! आज मैं घोर वनमें अपनी इच्छाके अनुसार घूमती चली गयी थी। वहाँ एक व्याघ्रने मुझे घेर लिया। वह मुझे खा लेना चाहता था, किंतु मैंने शपथके द्वारा उसे यह विश्वास दिलाया कि मैं गौओंके झुंडमें अपने बच्चेको देखकर फिर लौट आऊँगी। अनेक शपथ करनेपर उसने मुझे छोड़ा है। अतः अब फिर मैं वहीं जाऊँगी।

बछड़ेने कहा—माँ! आज तुम जहाँ जाओगी, वहीं मैं भी चलूँगा। यदि तुम्हारे साथ व्याघ्र मुझे भी मार डालेगा तो मातृभक्त पुरुषोंकी जो गति होती है, वही निश्चयपूर्वक मुझे भी मिलेगी। बालकोंके लिये माताके समान दूसरा कोई बन्धु नहीं है, माताके समान कोई रक्षक नहीं है और माताके सदृश दूसरी कोई गति नहीं है। माताके समान कोई पूज्य गुरु नहीं, माताके समान स्नेही सखा नहीं और माताके समान इहलोक या परलोकमें कोई देवता नहीं है*। ऐसा मानकर श्रेष्ठ पुरुषोंको सदा अपनी माताके प्रति भक्ति रखनी चाहिये। जो पुत्र मातृभक्तिको ही प्रजापतिनिर्मित परम भक्ति मानकर सदा उसका आचरण करते हैं, वे परम गतिको प्राप्त होते हैं। अतः तुम इस गोकुलमें रहो, मैं ही व्याघ्रके समीप जाऊँगा और मैं अपने प्राण देकर तुम्हारे प्राणोंकी रक्षा करूँगा।

नन्दिनीने कहा—बेटा! आजके दिन मेरी ही मृत्यु नियत है, तुम्हारी नहीं; फिर तुम अपने प्राणोंसे मेरे प्राणोंकी रक्षा कैसे कर सकते हो? वत्स! तुम्हें तो अपनी माँके उपदेशका ही पालन करना चाहिये। वनमें भ्रमण करते समय कभी तुम प्रमाद न कर बैठना। अधिक लोभ होनेसे इहलोक और परलोकमें भी देहधारीका नाश हो जाता है। लोभसे मोहित पुरुष समुद्रमें, घोर


* नास्ति मातृसमः पूज्यो नास्ति मातृसमः सखा। नास्ति मातृसमो देव इहलोके परत्र च॥ (स्क० पु०, ना० ५१। १७)