संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * ११०१
पुत्री हुई, जिसे अपने पूर्वजन्मकी बातोंका भी स्मरण था। दशार्णराजने इसका स्वयंवर रचाया और उसमें इसने मुझे पहचानकर मुझको ही वरण किया और मैंने भी इसे अपने पूर्वजन्मकी पत्नी समझकर अपनाया। इसी कारणसे मैं प्रति वर्ष वैशाख पूर्णिमाको यहाँ आकर अपनी धर्मपत्नीके साथ महाकालदेवके सामने जागरण और पुष्प, धूप तथा चन्दन आदिके द्वारा उनका पूजन करता हूँ। ब्राह्मणो! उस समय तो मैंने बिना श्रद्धाके ही जागरण किया था तथापि महादेवजीकी कृपासे मुझे ऐसा फल प्राप्त हुआ। अब मैं जो श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त विधिसे जागरण कर रहा हूँ, इसका फल भगवान् मुझे कितना उत्तम देंगे, यह मैं नहीं जानता।
यह सुनकर वहाँ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने राजाको अनेक बार साधुवाद दिया और इस प्रकार कहा—'भूपाल! आपने ठीक कहा है, भगवान् महाकालके प्रसादसे इस भूतलपर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। इसीलिये हमलोग भी प्रतिवर्ष श्रद्धासे यहाँ रात्रिजागरण करेंगे।' तदनन्तर राजा और उन ब्राह्मणोंने बड़े हर्षके साथ गीत, वाद्य, नृत्य, धर्मकथा आदि कार्योंको करते हुए महाकालजीके समीप रातभर जागरण किया। प्रातःकाल उठकर राजाने महाकालका पूजन किया और उन सब ब्राह्मणोंसे आज्ञा लेकर सेनासहित अपनी पुरीको प्रस्थान किया। तत्पश्चात् समयानुसार शरीरका अन्त होनेपर उन्होंने जरा और मृत्युसे रहित परम पदको प्राप्त कर लिया।
सूतजी कहते हैं—महर्षियों! इस प्रकार मैंने आप लोगोंके समक्ष भगवान् महाकालके उत्तम माहात्म्यका वर्णन किया है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है।
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कलशेश्वरका माहात्म्य, नन्दिनी धेनुके द्वारा व्याघ्रयोनिको प्राप्त हुए राजा कलशका शापसे उद्धार
सूतजी कहते हैं—महर्षियो! उसी क्षेत्रमें एक महापुण्यदायक कुण्ड है, जिसके तटपर कलशेश्वर-देवका निवास है। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्राचीन कालमें कलश नामसे प्रसिद्ध एक यदुवंशी राजा थे। वे विधिपूर्वक यज्ञ करनेवाले और सब लोगोंके हितमें तत्पर थे। एक समय महर्षि दुर्वासाके शापसे उन्हें व्याघ्र होना पड़ा था। व्याघ्ररूपमें वनमें रहते हुए वे बहुतसे ब्राह्मणोंको मारकर खा जाते थे। इस प्रकार उनका बहुत समय व्यतीत हो गया। कुछ कालके पश्चात् उस देशमें गौओंका एक मनोरम झुंड आ निकला, जिसके साथ बहुत-से गोप-गोपी थे। उस झुंडमें एक नन्दिनी नामक धेनु थी, जिसके थन बहुत मोटे थे और जो घड़ों दूध देती थी। वह धेनु घासके लोभसे आगे बढ़ती हुई एक कुंजके भीतर गयी तो वहाँ उसने भगवान् शंकरका लिंगमय स्वरूप देखा, जो बारह सूर्योंके समान तेजस्वी प्रतीत होता था। गौने बड़ी श्रद्धाके साथ वहाँ खड़ी होकर उस शिवलिंगको स्नान करानेके लिये उसपर बहुत दूधकी धारा बहायी। उसका यह नियम प्रतिदिन चालू रहा, किंतु इस बातको कोई नहीं जानता था। एक दिन उस स्थानपर तीखी दाढ़वाला वह व्याघ्र आया और दैवयोगसे नन्दिनी गायपर उसकी दृष्टि पड़ गयी। तब गौओंके समुदायमें बँधे हुए अपने छोटे बछड़ेकी याद करके वह गाय करुणस्वरमें विलाप करने लगी। फिर उसने मन-ही-मन कहा—'जिस सत्य एवं शिवभक्तिसे प्रेरित होकर मैं भगवान् शिवको स्नान करानेके लिये यहाँ आयी थी, उसीके प्रभावसे मुझे अपने बछड़ेसे मिलनेका अवसर प्राप्त हो।' इस प्रकार नन्दिनी जब करुण विलाप कर रही थी उस समय व्याघ्रने हँसकर कहा—'अरी! अब तो तू पूर्णतः मेरे वशमें है, क्यों व्यर्थ प्रलाप करती है?'