भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1129, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1129

११०० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


अन्तमें उन्होंने मुझे त्याग दिया। तब मैं अपनी पत्नीको साथ लेकर परदेशको चल दिया। स्वराष्ट्रदेशको धन-धान्यसे सम्पन्न सुनकर मनमें उसीका चिन्तन करते हुए चला और मार्गमें भिक्षाका अन्न भोजन करता हुआ मैं क्रमशः आगे बढ़ते-बढ़ते आनर्त देशमें चमत्कारपुरके समीप आ पहुँचा। वहाँ मैंने स्वच्छ जलसे भरा हुआ एक सरोवर देखा, जो कमलवनसे सुशोभित था। भूख-प्यास और थकावटसे बहुत कष्ट तो पा ही रहा था, वहाँ पहुँचकर मैंने उस सरोवरके शीतल जलसे स्नान किया। तत्पश्चात् मेरी स्त्रीने मुझसे कहा—'नाथ! इस जलाशयसे कुछ कमल संग्रह कर लीजिये, जिससे आजका भोजन चले। यह पास ही इन्द्रपुरीके समान मनोहर नगर दिखायी देता है, वहाँ चलकर इन कमलोंको बेच लेना चाहिये।' तब मैंने बेचनेके लिये बहुत-से कमल संग्रह कर लिये और चमत्कारपुरमें आकर सब ओर भ्रमण किया। किंतु कोई भी मनुष्य उन कमलोंको खरीदता न था। भूखके मारे मैं दुर्बल हो रहा था। मेरा गला सूख गया था। उस समय सूर्यास्त हो गया। तब मैं वैराग्यभावको प्राप्त होकर स्त्रीके साथ एक टूटे-फूटे मन्दिरमें गया और उन कमलोंको पृथ्वीपर रखकर लेट गया। तदनन्तर आधी रात बीतनेपर मैंने गानेकी ध्वनि सुनी। तब मेरे चित्तमें विचार हुआ कि निस्सन्देह आज यहाँ जागरणका पर्व है। अतः चलूँ, यदि कोई मेरे इन कमलोंको मूल्य देकर ले लेगा तो भोजनकी व्यवस्था हो जायगी। ऐसा निश्चय करके कमल लेकर मैं अपनी पत्नीके साथ जहाँसे गीतकी ध्वनि आ रही थी, उसी ओर चल दिया। वहाँ जानेपर मैंने देवताओंके स्वामी भगवान् महाकालको श्रेष्ठ द्विजोंद्वारा पूजित होते देखा। वे द्विज भगवान्‌के आगे बैठकर जप और गीतमें लगे थे। कोई नृत्य करते, कोई गीत गाते, कोई होम करते और कोई धार्मिक उपाख्यान करते थे। तब मैंने एक व्यक्तिसे पूछा—'यहाँ क्यों जागरण किया जाता है?' उसने बताया कि—'आज भगवान् महाकालकी प्रसन्नताके लिये उपवासपरायण ब्राह्मणोंद्वारा भक्तिभावसे जागरण किया जाता है। आज वैशाखमासकी पुण्यमयी तिथि पूर्णिमा है। इस समय जो मनुष्य भगवान् महाकालके आगे भक्तिपूर्वक जागरण करता है, वह निश्चय ही स्वर्गलोकको प्राप्त होता है।' तब मैंने कहा—'भद्र पुरुष! मेरे पास कमलके फूल हैं। इनको ले लीजिये और बदलेमें मूल्य दीजिये, जिससे मेरा भोजन चले। तब उसने तीन पल सुवर्ण देना चाहा। यह देखकर मैंने सोचा, स्वयं ही क्यों न इन कमलोंसे देवेश्वर महादेवजीकी पूजा करूँ। जान पड़ता है, पूर्वजन्ममें मेरे शरीरसे कोई भी पुण्य नहीं हुआ था, इसीलिये इस जन्ममें मुझे ऐसी दुर्गति भोगनी पड़ती है; किंतु क्या करूँ, मेरी प्रियवादिनी पत्नीका गला भूखके मारे सूखा जा रहा है। इसमें सन्देह नहीं कि यदि अन्न उपलब्ध नहीं हुआ, तो यह कल जीवित नहीं रह सकेगी। इस प्रकार चिन्तामें पड़े हुए मुझसे मेरी विनयशीला पत्नीने मधुर वाणीमें कहा—'नाथ! धनके लोभसे इन कमलोंका विक्रय न कीजिये। आज अपने पास अन्न न होनेसे स्वतः उपवासव्रतका योग लग गया है। भूखके कष्टसे हम अबतक तो जागते ही रहे हैं, शेष रात्रिमें और भी जागरण कर लेंगे। हमने सरोवरमें दिनके समय स्नान करके देवपूजन किया ही था। इस समय भी इन कमलोंसे हम भगवान् महाकालका पूजन करें।' इससे हम दोनोंका परम कल्याण होगा।'

पत्नीके ऐसा कहनेपर हम दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ कमलपुष्पोंसे महादेवजीका पूजन किया। भूखकी पीड़ासे नींद तो हमारे पास आयी नहीं। प्रातःकाल जब सूर्योदय हुआ, उस समय भूखसे पीड़ित होकर उसी स्थानपर मेरी मृत्यु हो गयी। तब मेरी पत्नीने मेरे शरीरको लेकर बड़े हर्षके साथ चिताकी अग्निमें प्रवेश किया। उसी पुण्यके प्रभावसे मैं कान्तिपुरका राजा हुआ और मेरी पत्नी दशार्ण देशके राजाकी