संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०९९
आपकी यह पूजनीय प्रतिमा त्रिभुवनविख्यात होकर इस तीर्थमें मेरी सुस्थिर कीर्तिके रूपमें विद्यमान रहे। जो यहाँ स्थित रहनेवाली आपकी आराधना जिस निमित्तसे भी करे, उसकी भक्तिके अनुसार उस कामनाको आप शीघ्र ही पूर्ण करती रहें।
सरस्वती बोलीं—राजन्! जो इस शुभ सलिलमें स्नान करके अष्टमी और चतुर्दशी तिथिको यहाँ मेरी पूजा करेगा, उसकी मनोवांछित कामनाओंको मैं पूर्ण करूँगी।
सूतजी कहते हैं—इस प्रकार परमेश्वरी सरस्वतीदेवी सब लोगोंके हितके लिये तभीसे वहाँ निवास करने लगीं। जो मनुष्य अष्टमी और चतुर्दशीको उपवास करके श्वेतपुष्प और चन्दन आदिके द्वारा वहाँ उनका पूजन करता है, वह जन्म-जन्ममें उत्तम वक्ता एवं मेधा (धारणाशक्ति)-से सम्पन्न होता है। सरस्वतीके प्रसादसे उसके वंशमें भी कोई मूर्ख नहीं पैदा होता। जो सरस्वतीदेवीके आगे धर्मकथा श्रवण करता है, वह उनके प्रभावसे तीन युगोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है। जो सरस्वतीदेवीके मन्दिरमें सदा श्रद्धापूर्वक विद्यादान करता है, वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता है। जो वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणको धर्मशास्त्रकी पुस्तक दान करता है, वह भी अश्वमेधयज्ञका फल पाता है। जो सरस्वतीदेवीके आगे खड़ा होकर वेदपाठ करता है, वह सम्पूर्ण अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है।
महाकालके समीप जागरणकी महिमा, राजा रुद्रसेनका पूर्ववृत्तान्त
सूतजी कहते हैं—पूर्वकालमें इक्ष्वाकु-कुलको आनन्दित करनेवाले रुद्रसेन नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे। सब गुणोंसे सम्पन्न कान्तिपुरी उनकी राजधानी थी और उनकी परम प्रिय धर्मपत्नीका नाम पद्मावती था। राजा रुद्रसेन वैशाखमासकी पूर्णिमाको सदैव रानी पद्मावतीके साथ थोड़ी-सी सेना लेकर चमत्कारपुरके क्षेत्रमें भगवान् महाकालका दर्शन करनेके लिये जाते और भगवान् महादेवके आगे स्त्रीसहित श्रद्धापूर्वक बैठकर रात्रिमें जागरण करते थे। उपवास करके महादेवजीका चिन्तन करते हुए रात बिताते थे। फिर प्रातःकाल उठकर स्नान करके धुले हुए वस्त्र पहन पवित्र हो ब्राह्मणों एवं तपस्वी जनोंको दान देते थे। साथ ही अन्य सहस्रों दीनों, अन्धों और कंगालोंको अन्न-वस्त्र बाँटते थे। इस प्रकार प्रतिवर्ष वे वैशाख पूर्णिमाको वहाँकी यात्रा करते और महाकाल देवके सामने रातभर जागते थे। इससे उनका सदा अभ्युदय होने लगा और शत्रु अपने-आप नष्ट होने लगे। एक समय उसी अवसरपर जब राजा हाटकेश्वरक्षेत्रमें आये तब उन्होंने देखा, महाकाल देवके समक्ष अनेकानेक देशों और दिशाओंसे श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ आये हुए हैं। वे सब वेदपाठमें तत्पर हैं और परस्पर देवों, ऋषि-मुनियों एवं प्राचीन राजर्षियोंकी कथा-वार्ता कर रहे हैं। राजाने क्रमशः उन सबको प्रणाम किया और स्वयं भी उनसे अभिनन्दित होकर एक ओर बैठ गये। कथा समाप्त होनेपर मुनीश्वरोंने पूछा—‘राजन्! तुम प्रतिवर्ष वैशाखी पूर्णिमाको दूर देशसे यहाँ आकर केवल रातमें महादेवजीके सामने जागरण करते हो। तीर्थोंमें जो स्नान, दान आदि अन्य क्रियाएँ बतायी गयी हैं, उन सबको छोड़कर पहले तुम इस जागरण-कार्यकी ओर ही ध्यान देते हो, अतः इसका फल क्या है, सो हम-लोगोंसे बताओ।’
राजाने कहा—विप्रवरो! आपलोगोंने जो कुछ पूछा है, वह यद्यपि गोपनीय रहस्यकी बात है, तथापि मैं आपसे कहूँगा। प्राचीन कालकी बात है, मैं वैदिश नगरके वैश्यकुलमें उत्पन्न हुआ था। मेरे पास धनका सर्वथा अभाव था। मेरे भाई-बन्धु पग-पगपर मेरा निरादर करते थे और