भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1127

१०९८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


रखा। तदनन्तर राजाका लाड़-प्यार पाकर वह बालक प्रतिदिन बढ़ने लगा, परंतु जन्मसे ही मूक होनेके कारण वह कुछ बोल नहीं सकता था। तत्पश्चात् उस बालकका सातवाँ वर्ष आनेपर राजा बलवर्द्धन मृत्युको प्राप्त हो गये। तब मन्त्रियोंने राजाके उसी पुत्रको राज्यसिंहासनपर बिठाया, क्योंकि उनके दूसरा कोई पुत्र नहीं था। इस प्रकार राज्यसिंहासनपर बैठे हुए बाल्यावस्थासे युक्त उस गूँगे राजाके राज्यमें सब ओर विप्लव होने लगा। जल-जन्तुओंकी भाँति बलवान् लोग सर्वत्र दुर्बलोंको सताने लगे। तब मन्त्रियोंने अपने पुरोहित वसिष्ठजीसे कहा—'महामुने ! इस राजाके बोलनेके लिये कोई उपाय कीजिये। इसकी जड़तासे ही सारी पृथ्वी उजड़ती जा रही। अतः कोई उचित उपाय कीजिये।' तब दीर्घकालतक विचार करके वसिष्ठजीने मन्त्रियोंसे कहा—'हाटकेश्वरक्षेत्रमें सब कामनाओंको देनेवाला सारस्वत नामक तीर्थ है, वहीं यह राजा स्नान करे।'

महर्षि वसिष्ठके कहनेसे राजा अम्बुवीचीने तत्काल जाकर उस तीर्थमें स्नान किया और उसी क्षण वे मधुर स्वरसे बोलनेवाले वक्ता हो गये। राजाने सरस्वतीदेवीका ऐसा प्रभाव जानकर बड़ी श्रद्धाके साथ उनका चिन्तन किया और नदीतटसे मिट्टी लेकर स्वयं ही सरस्वतीदेवीकी चतुर्भुजा मूर्तिका निर्माण किया। वे दाहिने हाथमें मनोहर कमल और नक्षत्रोंके तेजको तिरस्कृत करनेवाली अक्षमाला लिये हुए थीं तथा बायें हाथमें उन्होंने दिव्य जलसे भरा हुआ कमण्डलु और सब विद्याओंकी उत्पत्तिकी स्थानभूत पुस्तक ले रखी थी। ऐसी मूर्तिका निर्माण करके राजाने यत्नपूर्वक उसे शिलापृष्ठपर स्थापित किया और धूप, माला तथा चन्दनसे भक्तिपूर्वक उसकी पूजा की। तत्पश्चात् श्रद्धा-भावसे पवित्र हृदयके द्वारा उनके आगे शुद्ध एवं विनीत होकर नरेशने उच्च स्वरसे देवीकी स्तुति की—'देवि ! सत्-असत् (कारण और कार्य) रूप तथा बन्ध-मोक्षस्वरूप जो कोई भी वस्तु है, वह सब गुप्तरूपसे स्थित रहनेवाली तुम्हारे द्वारा व्याप्त है, ठीक उसी तरह जैसे अग्निके द्वारा ईंधन व्याप्त होता है। तुम्हीं सिद्धिरूपमें सब लोगोंके हृदयमें निवास करती हो। देवेश्वरि ! तुम्हीं जिह्वापर वाणीरूपसे और नेत्रमें ज्योतिःस्वरूपसे विराजमान हो। तीनों लोकोंमें एकमात्र तुम्हीं भक्तिभावसे ग्रहण करनेयोग्य हो। शरणमें आये हुए दीनों और पीड़ितोंकी रक्षामें तुम सदा तत्पर रहती हो। तुम्हीं कीर्ति, तुम्हीं धृति, तुम्हीं मेधा, तुम्हीं भक्ति और तुम्हीं प्रभा कही गयी हो। समस्त प्राणियोंमें निवास करनेवाली कान्ति, क्षुधा और निद्रा भी तुम्हीं हो। तुष्टि, पुष्टि, श्री, प्रीति, स्वधा, स्वाहा, रात्रि, रति, पृथ्वी, गंगा, सत्य, धर्म, मनस्विनी, लज्जा, शान्ति, स्मृति, दक्षा, क्षमा, गौरी, रोहिणी, सिनीवाली (जिसमें चन्द्रमाका दर्शन हो, ऐसी अमावास्या), कुहू (जिसमें चन्द्रमाका दर्शन न हो, ऐसी अमावास्या), राका, (पूर्णिमा), देवमाता अदिति, ब्रह्माणी, विनता, लक्ष्मी, कद्रू, दाक्षायणी, सती, शिवा, गायत्री, सावित्री, कृषि, वृष्टि, श्रुति, कला, वेला, नाडी, त्रुटि, काष्ठा (दिशा), रसना और सरस्वती सब कुछ तुम्हीं हो। इसके सिवा तीनों लोकोंमें और भी जो कुछ है, जो अधिक होनेके कारण मेरे द्वारा नहीं कहा गया हो, वह सब चेष्टायुक्त और चेष्टारहित वस्तुएँ तुम्हारा ही स्वरूप है। गन्धर्व, किन्नर, देवता, सिद्ध, विद्याधर, नाग, यक्ष, गुह्यक, भूत, दैत्य तथा विनायकगण आदि सब तुम्हारे ही प्रसादसे परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। अन्य देवता कष्टपूर्वक आराधना और पूजा करनेपर ही मनुष्यके पाप हरते हैं परंतु तुम केवल नाम लेनेसे सबका उद्धार करती हो।'

राजा अम्बुवीचीके द्वारा इस प्रकार स्तुति की जानेपर देवेश्वरी सरस्वतीदेवीने अत्यन्त हर्षित होकर कहा—भूपाल ! मैं तुम्हारी सुस्थिर भक्ति और इस स्तुतिसे बहुत सन्तुष्ट हूँ। अतः तुम शीघ्र ही मनोवांछित वर माँगो।

राजाने कहा—देवि ! आजसे मेरी प्रार्थना स्वीकार करके आप सदा इस तीर्थमें निवास करें और