भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1126, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1126
* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०९७

हैं। समस्त व्रतधारियों और विशेषतः शिवभक्तोंका मूलधर्म हैं— ब्रह्मचर्यव्रतका पालन। अतः हम-जैसे लोगोंसे तुम फिर कभी ऐसी बात न कहना। व्रतधारी और शिवभक्त पुरुष सौ वर्षोंसे अधिक कालतक जो तपस्या करता है, वह एक बारके स्त्रीप्रसंगसे नष्ट हो जाती है। जो पापात्मा स्त्रीको स्वीकार करता है, उसका शिवोपासना-सम्बन्धी व्रत व्यर्थ हो जाता है। भगवान् शिवके भक्तोंको स्त्रियोंके साथ बातचीत करनेसे भी पाप लगता है, इसलिये तुम शीघ्र ही इस स्थानसे चली जाओ। तुम जीवित रहो या मर जाओ, परंतु मैं तुम्हारी इस बातको नहीं मानूँगा। व्रती पुरुषोंको स्त्रीवधकी अपेक्षा स्त्री-संगमसे ही अधिक पाप लगता है। स्त्रीवध करनेपर तो व्रती पुरुषोंके लिये विद्वानोंने प्रायश्चित बतलाया है, परंतु उनके संगमसे जो दोष होता है, उसका कोई प्रायश्चित ही नहीं कहा है। इसलिये तुमको यहाँसे चले जाना चाहिये। केवल व्रती पुरुषोंको ही स्त्रीसंगमसे पाप लगता है— ऐसी बात नहीं है। जो व्रतसे बाह्य हैं, ऐसे मनुष्य भी स्त्रियोंमें आसक्त होनेपर नीचे गिर जाते हैं। अतः समागमकी बात तो दूर रहे, जो बुद्धिमान् अपना कल्याण चाहे, वह स्त्रियोंके साथ वार्तालाप भी न करे।

सूतजी कहते हैं—विश्वामित्रजीकी यह बात सुनकर क्रोधमें भरी हुई मेनकाने उन्हें शाप दिया— 'ओ दुर्मते! मैं तुम्हारे प्रति अनुरक्त थी, फिर भी तुमने मेरा त्याग किया है; इसलिये आज ही तुम वृद्धावस्थासे जर्जर शरीरवाले हो जाओ। तुम्हारे बाल सफेद हो जायँ और शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जायँ।' उसके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्र उसी क्षण वैसे ही हो गये। तब वे भी कमण्डलुसे जल लेकर उसे शाप देनेको उद्यत हुए और इस प्रकार बोले—'ओ नीच! तुमने निर्दोष होनेपर भी मुझे शाप दिया है, इसलिये तुम भी शीघ्र ही जरावस्थासे जर्जर अंगवाली हो जाओ।' ऋषिके वचनसे वह भी तत्काल वैसी ही हो गयी। उस वृद्ध शरीरसे मेनकाने पुनः जाकर वहाँके जलाशयमें स्नान किया। स्नान करते ही वह पुनः पूर्ववत् रूप-लावण्यसे सम्पन्न हो गयी। यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर ऋषि विश्वामित्रने भी तुरंत जाकर वहाँ स्नान किया और वे भी पूर्ववत् हो गये। उस तीर्थके माहात्म्यसे मेनका और विश्वामित्र दोनों रूप तथा उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न हो गये और प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरेसे विदा लेकर अपने अभीष्ट स्थानको चले गये। उस तीर्थका ऐसा माहात्म्य जानकर महर्षि विश्वामित्रने वहाँ देवाधिदेव महादेवजीका लिंग स्थापित किया और उस उत्तम तीर्थमें बड़ी भारी तपस्या की। उन्होंने उस सरोवरको और विस्तृत किया। वहाँ स्नान करके जो पुरुष उस उत्तम विश्वामित्रेश्वर लिंगका पूजन करता है, वह भगवान् शिवके लोकमें जाता है। आज भी उस तीर्थमें गंगाजलके समान पवित्रजल दिखायी देता है, जो सब पापोंको हर लेनेवाला है। जो श्रद्धायुक्त पवित्र हृदयसे वहाँ स्नान करता है, वह सर्वदेवपूजित विष्णुलोकको जाता है।


सरस्वतीतीर्थकी महिमा, राजा अम्बुवीचिकी मूकताका निवारण तथा राजाके द्वारा सरस्वतीदेवीका स्तवन

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें एक-दूसरा परम सुन्दर सारस्वततीर्थ है। वहाँ स्नान करनेवाला गूँगा मनुष्य भी बोलनेमें पटु हो जाता है तथा वह ब्रह्मलोकतकके सभी लोकोंमें अपनी रुचिके अनुसार जाता है। प्राचीनकालमें बलवर्द्धन नामसे विख्यात एक राजा थे, जो समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वीको अपनी भुजाओंके बलसे जीतकर उसका उपभोग करते थे। उनके एक सर्वलक्षणसम्पन्न पुत्र हुआ। पिताने बारहवें दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको बुलाकर उसका नाम अम्बुवीचि

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