भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1125
१०९६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

आकर स्नान किया करती थी। किसी समय वैसा ही योग आनेपर मुनीश्वर विश्वामित्र भी कहींसे घूमते हुए उस तीर्थमें आ गये। इधर मेनका भी देवदर्शनके लिये स्वर्गलोकसे आयी और भगवान्‌की पूजा करके स्वर्गमें जाने लगी। तबतक उसकी दृष्टि वहाँ इधर-उधर घूमते हुए मुनिवर विश्वामित्रपर पड़ी। उन्हें देखते ही मेनका कामके अधीन हो गयी और शीघ्रतापूर्वक उनके समीप गयी। उस अदृष्टपूर्व सुन्दरीको देखकर मुनिने पूछा—'कल्याणी! तुम्हारा शुभ हो। मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् विष्णुके चरणोंमें तुम्हारी अविचल भक्ति हो। बाले! क्या तुम सदाचार और विनयसे युक्त होकर सदा प्रिय वचन बोलती हुई अपने पतिके चरणारविन्दोंकी सेवामें संलग्न रहती हो? क्या तुम्हें सदा अपने पतिकी प्रियतमा होनेका सौभाग्य प्राप्त है? क्या पतिके सामने अथवा परोक्षमें भी तुम दान आदिसे अपने बन्धु-बान्धवों तथा सुहृदोंका सत्कार करती हो? क्या तुम पतिके सो जानेपर सोती और उनके जागनेसे पहले ही उठ जाती हो? क्या प्रातःकाल उठकर तुम प्रतिदिन अपने घरमें स्वयं ही झाड़ू लगाती हो? क्या देवताओंको नमस्कार करके घरके गुरुजनोंको प्रतिदिन प्रणाम करती हो और उन सबको अपनी शक्तिके अनुसार अन्न और जल देकर स्वयं सबसे पीछे भोजन करती हो? क्या जलजन्तुओंकी रक्षा करती हुई अपने सघन वस्त्रसे पानीको सात बार छानकर पीती हो? कभी सूर्यास्तके समय तो तुम भोजन नहीं करतीं? अपने सेवकों, कुटुम्बीजनों तथा विशेषतः साधु-संतोंको दिये बिना तो तुम भोजन नहीं करतीं? क्या तुम दयाभावसे युक्त होकर शरीरको क्लेश देनेवाले जूँ, खटमल और मच्छर आदिका भी पुत्रकी भाँति पालन करती हो? क्या साधु-पुरुषोंके मुखसे प्रतिदिन भक्तिपूर्वक कल्याणमय धर्मका उपदेश सुनती हो और सुनकर आदरके साथ उसका पालन भी करती हो? क्या पवित्र शास्त्र-कथा सुनकर तुम शास्त्रका, वाचकका तथा उसकी विशेष व्याख्या करनेवाले विद्वान्‌का भी पूजन करती हो? क्या तुम मुनीश्वरोंद्वारा प्रतिपादित पुराण और शास्त्र-ग्रन्थोंको अच्छे पत्रपर सुन्दर अक्षरोंमें लिखाकर उन्हें साधु-पुरुषोंको अर्पण करती हो? क्या प्रतिदिन शिवमन्दिरमें अपनी शक्तिके अनुसार तुम संगीत, वाद्य आदिकी व्यवस्था करती और भेंट-पूजा उपहार चढ़ाती हो? क्या तुम साधु-पुरुषोंको उनका पूरा शरीर ढँकनेके उपयुक्त वस्त्र अर्पण करती हो? तुम दूसरोंके घरमें विशेषतः रातके समय व्यर्थ घूमनेके लिये तो नहीं जातीं? कहीं पतिके भूखे होते हुए भी तुम स्वयं तो भोजन नहीं कर लेतीं? क्या तुम प्रयत्नपूर्वक पतिकी आज्ञाका उल्लंघन करनेके दोषसे अपनेको बचाती हो? कभी पतिके कुपित होनेपर तुम उनकी बातोंका उत्तर तो नहीं देतीं? उनके क्रोधरूपी पापका निवारण करनेके लिये उनसे मीठे और प्रिय वचन तो बोलती हो न? तुम पतिके परदेश जानेपर मैले वस्त्र धारण करती और दीन, दुर्बल तथा म्लानवदन रहती हो न? कभी मन्दिरके पृष्ठभागमें तुम जूठा और फूटा बर्तन तो नहीं रखतीं? रात्रिमें जागरणकालमें तुम कथाके स्थान, झरना, एकान्त प्रदेश, नदीतट और वनमें कभी अकेली तो नहीं जातीं? शुभे! तुम कुलटा स्त्रियोंसे तथा दाइयों, मालिनों और धोबिनोंसे तो कभी मैत्री नहीं रखतीं? अपने मुखमण्डलमें तुम कुंकुमकी बेंदी तो लगाती हो न?

मेनका बोली—मुने! आपने जिनके धर्मोंका वर्णन किया है, वे दूसरी स्त्रियाँ हैं। हम तो स्वेच्छाचार विहार करनेवाली देवलोककी अप्सराएँ हैं। महाभाग! आप किस देशसे आये हैं? आपके दर्शनसे मेरा मन विचलित हो रहा है, मुझ अनुरागिणीको आप स्वीकार करें। अन्यथा मेरे प्राण नहीं रहेंगे। यदि ऐसा हुआ तो आपको स्त्रीवधका पाप लगेगा।

विश्वामित्रने कहा—भद्रे! हम तो शिव-शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार चलनेवाले ब्रह्मचारी