भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1124
  • नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०९५ ---|---

जायगा।' ऐसा कहकर श्रीहरिने दानवेन्द्रका वध करनेके लिये इन्द्रके साथ अपने सुदर्शन चक्रको भी भेजा। इन्द्रने उस चक्रके साथ जाकर युद्धमें सम्पूर्ण दानवोंका संहार कर डाला। दानवराज वाष्कलि भी चक्रसे मस्तक कट जानेके कारण वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा। और भी बहुत-से शूरवीर बलोन्मत्त दानव युद्धमें मारे गये। इस प्रकार दैत्यसेनाका संहार करके सुदर्शन चक्र पुनः भगवान् विष्णुके हाथमें आ गया। वे इन्द्र आदि देवता भी निर्भय होकर पुनः भगवान् विष्णुके समीप आये और उन्हें प्रणाम करके बोले—'देवेश! आपके प्रभावसे हमारे सब शत्रु मारे गये और त्रिलोकीका अकण्टक राज्य फिर हमें प्राप्त हो गया। अब हमारे लिये सदैव कल्याण करनेवाला तथा हमारे शत्रुओंको भय पहुँचानेवाला जो कर्तव्य हो, उसका उपदेश कीजिये।'

श्रीभगवान्ने कहा—मुझे तो सम्पूर्ण लोकोंका हित करनेके लिये पवित्र जलसे भरे हुए इस कुण्डमें अब सदैव निवास करना है। अतः तुम्हें प्रतिवर्ष यहाँ आकर प्रयत्नपूर्वक चातुर्मास्यमें होनेवाले 'अशून्यशयन' व्रतका पालन करना चाहिये, जिससे तुम्हारे शत्रु होंगे ही नहीं। दूसरा भी जो मनुष्य भक्तिपूर्वक यहाँ आकर मेरी पूजा करेगा, वह साधुपुरुषोंके लोकको प्राप्त होगा। इन्द्र! अब तुम स्वर्गमें जाकर राज्य करो। जब फिर आवश्यकता हो, तब यहीं आकर मुझसे मिलना।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर इन्द्र भगवान् विष्णुको प्रणाम करके चले गये और भगवान् लोकहितके लिये वहीं रहने लगे। द्विजवरो! जो मनुष्य अत्यन्त श्रद्धापूर्वक भक्तिभावसे उन जलशायी विष्णुकी पूजा करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। सब देवताओंने मिलकर वहाँ द्वारका निर्माण की है। वहाँ चौमासेमें भगवान् विष्णुका पूजन करके मनुष्य मनोवांछित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। अतः सर्वथा प्रयत्न करके सब मनुष्योंको उस द्वारकाकी पूजा करनी चाहिये।


विश्वामित्रका मेनकासे वार्तालाप, सती स्त्रियोंके पालन करनेयोग्य धर्मका वर्णन, विश्वामित्रका वैराग्य, दोनोंका परस्पर शाप और तीर्थजलमें स्नानसे उद्धार

सूतजी कहते हैं—विप्रवरो! उस क्षेत्रमें एक दूसरा कुण्ड भी है, जो विश्वामित्र ऋषिके द्वारा प्रकट किया गया है। वह समस्त कामनाओंको देनेवाला है।

ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! विश्वामित्र मुनिका वह निर्मल तीर्थ किस समय वहाँ प्रतिष्ठित हुआ है?

सूतजी बोले—द्विजवरो! वहाँ पहलेसे ही एक साधारण झरना था, जो पृथ्वीपर माहात्म्यसे युक्त होकर बहता था। फिर उसीमें देवनदी गंगा वहाँ स्वयं आकर स्थित हुई, जिसमें स्नान करनेवाला पुरुष तत्काल सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य वहाँ पितरोंके उद्देश्यसे श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसका वह श्राद्ध पितरोंको अक्षय तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है। उस उत्तम तीर्थमें जो कुछ दान, होम और जप आदि सत्कर्म किया जाता है, उसका अनन्त फल होता है।

एक समयकी बात है। व्याधके बाणसे घायल हुई एक मृगी उस देवनदीके जलमें घुसी और वहीं उसकी मृत्यु हो गयी। उस पुण्यजलके प्रभावसे वही मृगी स्वर्गलोकमें मेनका नामक अप्सरा हुई। वह अप्सरा उस तीर्थके प्रभावका स्मरण करती हुई चैत्र शुक्ला तृतीयाको रविवार और भरणी नक्षत्रका योग होनेपर सदा वहाँ