संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वहाँ कैसे प्राप्त हुए हैं और किस विधिसे उनकी पूजा की जाती है?
**सूतजीने कहा—**पूर्वकालमें वाष्कलि नामसे प्रसिद्ध दानवोंका राजा था। वह बड़ा बलवान् तथा सम्पूर्ण देवता, गन्धर्व, नाग एवं राक्षसोंके लिये भी अजेय था। उस महाबली दानवने सम्पूर्ण भूमण्डलको अपने वशमें करके दैत्योंकी सेना साथ ले देवलोकपर भी चढ़ाई की। वहाँ देवताओं और असुरोंमें एक-दूसरेका संहार करनेवाला बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। अन्तमें दानवराज वाष्कलिने सेना तथा सामग्रीसहित देवराज इन्द्रपर विजय पायी। तब इन्द्रने देवताओंके साथ स्वर्गका सिंहासन छोड़कर श्वेतद्वीपनिवासी भगवान् विष्णुकी शरण ली, जहाँ शेषनागकी शय्यापर श्रीहरि योगनिद्राको स्वीकार करके शयन करते हैं और देवी लक्ष्मी उनके युगल चरणारविन्दोंकी सेवामें संलग्न रहती हैं। वहाँ पहुँचकर देवताओंने सब ओरसे वैदिक सूक्तोंद्वारा भगवान् विष्णुका भक्तिपूर्वक स्तवन किया। तदनन्तर जगदीश्वर भगवान् श्रीहरि शय्यासे उठकर इन्द्रसे बोले—'सहस्राक्ष! इस समय तीनों लोकोंमें कुशल तो है न? तुम सम्पूर्ण देवताओंको साथ लेकर यहाँ कैसे आये हो?'
**इन्द्रने कहा—**भगवन्! दैत्यराज वाष्कलि भगवान् शंकरसे वरदान पाकर बड़ा बलवान् हो गया है। वह देवताओंद्वारा युद्धमें अजेय है। उसने युद्धभूमिमें मुझे परास्त कर दिया है। मधुसूदन! इस समय वह स्वर्गलोकमें निवास करता है। इसी कष्टसे मैं सम्पूर्ण देवताओंके साथ आपकी शरणमें आया हूँ। प्रभो! पूर्वकालमें हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपुके भयसे तथा अन्यान्य दुरात्मा दैत्योंके आतंकसे भी आपने हम सब देवताओंकी रक्षा की है; अतः इस महाबली दानव वाष्कलिसे भी आज हमारी रक्षा कीजिये। देवेश! आपको छोड़कर हम देवताओंके लिये दूसरा कोई उत्तम आश्रय नहीं है।
**श्रीभगवान् बोले—**इन्द्र! समय आनेपर मैं स्वयं उस दानवको दण्ड दूँगा। अतः जबतक वह समय नहीं आता, तबतक तुम कहीं तीर्थभूमिमें रहकर बड़ी भारी तपस्या करो।
**इन्द्रने कहा—**जगदीश्वर! मैं उस दैत्यका नाश करनेके लिये किस क्षेत्रमें तपस्या करूँ, यह आप ही बतावें।
**भगवान् विष्णु बोले—**इन्द्र! चमत्कारपुरका क्षेत्र सिद्धिदायक है, अतः तुम वहीं जाकर उसके वधके लिये तपस्या करो।
**इन्द्रने कहा—**केशव! हम दानवराज वाष्कलिसे डरे हुए हैं, अतः आपके बिना वहाँ नहीं जायेंगे। इसलिये आप स्वयं भी वहाँ चलिये। आपसे सुरक्षित होकर ही मैं वहाँ भारी तपस्या कर सकूँगा।
भगवान् विष्णुने 'एवमस्तु' कहकर देवताओं और लक्ष्मीजीके साथ चमत्कारपुरके क्षेत्रमें पदार्पण किया। उस समय सब देवताओंने अपने लिये पृथक्-पृथक् आश्रम बनाया। भगवान् विष्णुने वहाँके प्राचीन एवं सुविस्तृत कुण्डमें क्षीरसागरका आवाहन किया और श्वेतद्वीपकी भाँति वहाँ भी वे शयन करने लगे। उस समय सब देवता उनके चारों ओर विनीतभावसे खड़े हो उनकी स्तुति करते थे। तदनन्तर आषाढ़ कृष्णा द्वितीया (पूर्णिमान्त मासकी गणनाके अनुसार श्रावण कृष्णा द्वितीया)—का शुभ दिवस आनेपर बृहस्पतिजीने इन्द्रसे कहा—'पुरन्दर! आज अशून्यशयना नामवाली द्वितीया है। यह भगवान् विष्णुकी अत्यन्त प्रिय तिथि है।'
यह सुनकर देवराज इन्द्रने शास्त्रोक्त विधिसे व्रत करके उस दिन जलशायी विष्णुका पूजन किया और इसी प्रकार चार महीनोंतक प्रत्येक द्वितीयाके दिन वे श्रीहरिका पूजन करते रहे। इससे वे दिव्य तेजसे सम्पन्न हो गये। उन्हें तेजस्वरूपमें देखकर भगवान् विष्णु बड़े प्रसन्न हुए और बोले—'इन्द्र! अब तुम सम्पूर्ण देवताओंके साथ वाष्कलिका वध करनेके लिये जाओ, तुम्हारी विजय होगी। देवशत्रुओंको मारनेके लिये मेरा यह सुदर्शन चक्र भी तुम्हारे साथ