भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1122, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1122
* नागरखण्ड-पूर्वार्ध *१०९३

दे। इससे अवश्य ही मन्त्रकी सिद्धि होती है। सौम्य कार्योंमें पीली सरसों और चमेलीके फूलोंसे हवन होता है। हवनके पश्चात् ब्राह्मणभोजन कराना चाहिये तथा रौद्र कार्योंमें लाल फूल एवं गुग्गुलसे होम कराना फलप्रद माना गया है। हवनके बाद कुमारी कन्याओंको भोजनादिसे तृप्त करना चाहिये। यह सत्ययुगके लिये उत्तम मन्त्रसाधन बताया गया है। त्रेतायुगमें एक चतुर्थांश कम किया जाता है, द्वापरमें आधा और कलियुगमें चतुर्थांश साधन आवश्यक है। इस प्रकार मन्त्र-सिद्धि प्राप्त करके उस पीठमें अपनी इच्छाके अनुसार सत्य साधन करे। ऐसा करनेसे मनुष्य शापानुग्रहमें समर्थ, तेजस्वी, सब प्राणियोंके लिये अजेय और साधुसम्मानित हो जाता है।

सूतजी कहते हैं—मेरे पिताजी वह सब बात सुनकर दुर्वासा मुनि चित्रेश्वर पीठमें चले गये और वहाँ उन्होंने सब मन्त्रोंका क्रमशः साधन किया।

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धुन्धुमारेश्वरकी स्थापना और महिमा, जलशायी विष्णु तथा अशून्यशयन-व्रतका महत्त्व, वाष्कलि दैत्यका वध

सूतजी कहते हैं—वहीं राजा धुन्धुमारके द्वारा स्थापित किया हुआ शिवलिंग है, जिसे उन्होंने अति मनोहर सर्वरत्नमय मन्दिर बनवाकर प्रतिष्ठित किया है। उस तीर्थमें आश्रम बनाकर राजाने बड़ी भारी तपस्या की। जिसके प्रभावसे भगवान् शिव उनके द्वारा स्थापित शिवलिंगमें विराजमान हुए। उस मन्दिरके समीप उन महात्मा राजाने एक बावली बनवायी, जो अत्यन्त निर्मल जलसे परिपूर्ण, सब तीर्थोंके समान महत्त्व रखनेवाली और मंगलकारक थी। राजा धुन्धुमार सूर्यवंशमें उत्पन्न हुए थे। वे बृहदश्वके पुत्र थे। उन्होंने मरुप्रदेशके जंगलमें निवास करनेवाले धुन्धु नामक महादैत्यको मारा था। इसलिये वे तीनों लोकोंमें धुन्धुमारके नामसे विख्यात हुए। उनका दूसरा नाम कुवलयाश्व भी था। चमत्कारपुरका क्षेत्र परम पावन है, ऐसा जानकर उन्होंने उसी क्षेत्रमें भगवान् शंकरका चिन्तन करते हुए भारी तपस्या की। रत्ननिर्मित प्रासादमें उत्तम महालिंगकी स्थापना करके भेंट, पूजा और उपहार आदिके द्वारा तथा पुष्प, धूप और चन्दन आदि सामग्रियोंसे भगवान् शिवका पूजन किया। इससे प्रसन्न होकर महादेवजीने वृषभपर आरूढ़ होकर गौरीदेवी तथा गणोंके साथ राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'तुम मनोवांछित वर माँगो।'

धुन्धुमारने कहा—सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी शिव! आप कृपापूर्वक अपने इस लिंगमय विग्रहमें सदैव निवास करें।

श्रीभगवान् बोले—नृपश्रेष्ठ! चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथिको मैं गौरीदेवीके साथ सदैव यहाँ निवास करूँगा। उस समय इस बावलीमें स्नान करके जो मेरा दर्शन करेगा, वह मेरे लोकमें जायगा।

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये तथा राजा प्रसन्नचित्त हो वहीं निवास करने लगे। अन्तमें वे मुक्तिके भागी हुए।

वहीं चित्रशिला तीर्थके उत्तर भागमें जलशायी भगवान् विष्णुका सुविख्यात स्थान है, जो महापातकोंका नाश करनेवाला है। जो हरिशयनी तथा हरिबोधिनी एकादशीको उपवास करके उस तीर्थमें श्रीहरिकी पूजा करता है, वह वैकुण्ठधामको जाता है। भगवान् श्रीहरिके शयन करनेपर जो कृष्ण पक्षकी द्वितीया तिथि (श्रावण आदि मासोंकी कृष्णा द्वितीया) आती है, उसका नाम 'अशून्य-शयना' है। यह तिथि भगवान् विष्णुको बहुत प्रिय है। उस दिन जो वहाँ शास्त्रोक्त विधिसे भगवान् जलशायी (विष्णु)-का पूजन करता है, वह श्रीहरिके धामको जाता है।

ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! भगवान् जलशायी

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