संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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है, स्वागत है। आपको जो अभीष्ट हो, वह वस्तु बतावें; मैं उसे दूँगा।
सूर्यदेव बोले—ब्रह्मन्! मैं सूर्य हूँ, ब्राह्मणके रूपसे आपके सामने आया हूँ। पर्वतोंमें श्रेष्ठ सुमेरुगिरिके प्रति ईर्ष्या होनेके कारण विन्ध्यपर्वत मेरा मार्ग रोककर खड़ा है; इसलिये आप साम आदि उपायोंसे उस पर्वतको रोकें। जिससे मेरी गति भंग होनेके कारण अतिकाल न होने पावे।
अगस्त्यजीने कहा—दिवाकर! मैं उस बढ़ते हुए कुल पर्वतको रोक दूँगा। आप अपने स्थानको पधारिये।
उनकी आज्ञा पाकर सूर्यदेव अपने लोकको चले गये। इधर अगस्त्य मुनि शीघ्र ही जाकर विन्ध्याचल पर्वतसे आदरपूर्वक बोले—‘पर्वतश्रेष्ठ! तुम मेरी आज्ञासे शीघ्र ही लघु रूप धारण करो। इस समय मेरा विचार दक्षिणके तीर्थोंमें स्नान करनेको हुआ है। किंतु यह कार्य तुम्हारे ही अधीन है, इसलिये जैसा उचित जान पड़े वैसा करो।’ महर्षि अगस्त्यका यह वचन सुनकर विन्ध्यपर्वत तत्काल विनीतभावसे नीचा हो गया। तब उस पर्वतको पार करके दक्षिण किनारे पहुँचकर अगस्त्यजीने कहा—‘गिरिश्रेष्ठ! जबतक मैं पुनः लौट न आऊँ, तबतक तुम्हें सदा इसी स्थितिमें रहना चाहिये।’ अगस्त्य मुनिके शापसे डरा हुआ वह श्रेष्ठ पर्वत पुनः लौट आनेकी प्रतीक्षामें बढ़ नहीं सका। विप्रवरो! अगस्त्य मुनि तभीके गये हुए आजतक उस मार्गसे नहीं लौटे। वे अब भी दक्षिण दिशामें ही स्थित हैं। उन्होंने लोपामुद्राको भी वहीं बुला लिया और सूर्यदेवका आवाहन करके आदरपूर्वक कहा—‘उष्णरश्मे! आपके कहनेसे मैंने अपना आश्रम छोड़ दिया है परंतु वहाँ मैंने जो शिवलिंग स्थापित किया है, उसकी नित्यपूजा आपको करनी चाहिये।’
सूर्यदेव बोले—मुने! मुझे स्वीकार है, मैं तुम्हारे द्वारा स्थापित शिवलिंगका पूजन करूँगा और दूसरा कोई भी जो पुरुष उस दिन उस शिवलिंगकी पूजा करेगा, वह मेरे लोकमें आकर पुण्यका भागी होगा।
सूतजी कहते हैं—इसी कारण भगवान् सूर्य चैत्रमासके शुक्लपक्षकी चतुर्दशी तिथिको उस स्थानपर सदैव उपस्थित होते हैं।
दुर्वासा-लोमहर्षण-संवाद, मन्त्रसिद्धिकी विधि
ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! मन्त्रका जप किस प्रकार सिद्ध होता है?
सूतजी बोले—महर्षियो! पूर्वकालमें दुर्वासा मुनिके सम्मुख इस विषयका वर्णन करते हुए पिताजीके मुखसे जो कुछ मैंने सुना है, वह बतलाता हूँ।
दुर्वासाजीने पूछा—सूतजी! मैं किसी अभीष्ट मन्त्रको सिद्ध करना चाहता हूँ, उसकी सिद्धिके लिये जो शास्त्रोक्त विधान हो, वह बताइये।
लोमहर्षण बोले—मुने! मन्त्रोंका साधन सबके लिये कष्टदायक, दोषयुक्त तथा अनेक प्रकारके विघ्नोंसे व्याप्त रहता है। अतः यदि आप मन्त्रके लिये सिद्धि चाहते हैं तो चमत्कारपुरके क्षेत्रमें चले जाइये। वहाँ महर्षि अगस्त्यजीके द्वारा निर्मित चित्रेश्वरी पीठ है। वह हृदयस्थित मन्त्रोंकी तत्काल सिद्धि करनेवाला पीठ बताया गया है। वहाँ न तो कोई विघ्न आता है और न किसी प्रकारका दोष ही प्राप्त होता है। देवताओंके वरदानसे वहाँ कोई भी मन्त्र सिद्ध हुए बिना नहीं रहता। वह सिद्धपीठ चारों युगोंके लिये हितकर है और जो वहाँ रहते हैं, उन्हें युगके अनुसार शीघ्र सिद्धिकी प्राप्ति कराता है। द्विजश्रेष्ठ! जो जिस मन्त्रकी सिद्धि करना चाहता है, वह उसको पहले ही एक लाख जप ले। ऐसा करनेसे वह मनुष्य पवित्र, सिद्ध एवं मन्त्रसाधनका अधिकारी बन जाता है। तत्पश्चात् पुनः उसका चार लाख जप करे और प्रज्वलित अग्निमें दशांश आहुति