संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1120, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* नागरखण्ड-पूर्वार्ध * १०९१
शुनोमुखने कहा—जिसने इन मृणालोंको चुराया है, वह साम आदि वेदोंको पढ़े, अतिथिप्रेमी गृहस्थ हो तथा निरन्तर सत्य बोले।
ऋषि बोले—वाह! आपने जो शपथ किये हैं, वे तो द्विजातियोंको अभीष्ट ही हैं। अतः यह निश्चय हो गया कि इन मृणालोंकी चोरी श्रीमान्ने ही की है।
शुनोमुखने कहा—निश्चय मैंने ही आपलोगोंके मृणाल चुराये हैं। आप मुझे इन्द्र जानें। द्विजवरो! आपमें लोभका अभाव देखकर मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ। अतः आप मेरे साथ शीघ्र स्वर्गलोकमें पधारें।
ऋषि बोले—देवराज! हम तो मोक्षमार्गके पथिक हैं। हमारे मनमें स्वर्गकी लिप्सा नहीं है। अतः इस तीर्थमें मोक्षके लिये हम तपस्या करेंगे।
जमदग्निने कहा—सुरेश्वर! हमने मृणालोंसे ही जीवन निर्वाह करते हुए समुद्रपर्यन्त समूची पृथ्वीकी परिक्रमा की है। अब हमारे साथ आपका जो समागम हुआ है, इससे आपका ही कल्याण हो। आप यहाँसे स्वर्गलोकको पधारें।
इन्द्र बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वरो! मेरा दर्शन कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसलिये आपलोग अपनी कोई अभीष्ट वस्तु मुझसे ग्रहण करें।
ऋषियोंने कहा—इन्द्र! इस पृथ्वीपर हमारे नामसे यह आश्रम विख्यात हो और यहाँ आनेवाले मनुष्योंके सब पातकोंका नाश करनेवाला हो। हम सदा यहीं तपस्याके लिये तबतक निवास करेंगे, जबतक कि हमें सनातन-मोक्षकी प्राप्ति नहीं हो जाती।
इन्द्र बोले—सप्तर्षियो! आपलोगोंका यह आश्रम तीनों लोकोंमें विख्यात होगा। जो जिस कामनाको मनमें लेकर श्रावणकी पूर्णिमाको यहाँ श्राद्ध करेगा, वह उस मनोरथको अवश्य प्राप्त करेगा। जो मनुष्य निष्कामभावसे यहाँ श्राद्ध अथवा दान करेगा, वह निस्सन्देह मोक्ष प्राप्त कर लेगा। जो आपलोगोंके शुभ आश्रमपर देहत्याग करेंगे, वे पापी होनेपर भी परम गतिको प्राप्त होंगे। जो मनुष्य एकाग्रचित्त हो यहाँ इंगुदी, बेर अथवा बेल आदिसे भी पितरोंके लिये श्राद्ध करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त हो किन्नरगणोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ देवदुर्लभ परम सिद्धिको प्राप्त करेगा।
ऐसा कहकर इन्द्रदेव सब ऋषियोंसे प्रशंसित हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये तथा वे सप्तर्षि वहीं रहने लगे। तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत होनेपर उन्होंने भी भारी तपस्या करके जरा-मृत्युरहित परमपद प्राप्त कर लिया। सप्तर्षियोंने अपने आश्रमपर त्रिशूलधारी भगवान् शिवके लिंगमय स्वरूपकी जो स्थापना की है, उसके दर्शनमात्रसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। जो भक्तिपूर्वक पुष्प, धूप और चन्दन आदिसे उसका पूजन करता है, वह अवश्य मोक्षको प्राप्त होता है।
## अगस्त्य-आश्रममें शिव-पूजा आदिका माहात्म्य
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें एक दूसरा आश्रम महर्षि अगस्त्यका है। वहाँ साक्षात् विश्वात्मा भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। वहाँ चैत्रमासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी तिथिको स्वयं भगवान् सूर्य आकर देवताओंके स्वामी महादेवजीकी पूजा करते हैं। जो कोई भी मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह उत्तम लोकोंमें जाता है और जो वहाँ श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके पितर उसी प्रकार तृप्त होते हैं, जैसे पितृमेध यज्ञसे उन्हें तृप्ति होती है। जिस समय विन्ध्याचल पर्वतने बढ़कर सूर्यदेवका मार्ग रोक लिया, उस समय वे सूर्यदेव ब्राह्मणका रूप धारण करके चमत्कार नामक नगरके क्षेत्रमें महर्षि अगस्त्यके आश्रमपर गये और बोले—'मुनिश्रेष्ठ! आज मैं आपके यहाँ अतिथिके रूपमें आया हूँ।'
अगस्त्यजीने प्रसन्नतापूर्वक कहा—मुने! स्वागत