भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1119, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1119

१०९० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तृष्णा तरुण होती जाती है। जैसे पूरे शरीरके बढ़नेके साथ-साथ प्रत्येक अंग भी वृद्धिको प्राप्त होता है, उसी प्रकार तृष्णा भी धनके बढ़नेके साथ-साथ बढ़ती रहती है। तृष्णाका कहीं अन्त नहीं है। उसे पूर्ण करना भी बहुत कठिन है, वह अपने साथ सैकड़ों दुःख लिये चलती है और उसके द्वारा प्रायः अधर्म ही होता है। अतः तृष्णाको सर्वथा त्याग देना चाहिये।^१

गौतमने कहा—जिसका मन सन्तुष्ट है, उसके लिये सर्वत्र सम्पत्तियाँ हैं। जिसने अपने पैरोंमें जूता पहन रखा है, उसके लिये सारी पृथ्वी ही चमड़ेसे आच्छादित है। सन्तोषरूपी अमृतसे तृप्त हुए शान्त चित्तवाले मनुष्योंको जो सुख प्राप्त होता है, वह धनके लोभमें पड़कर इधर-उधर दौड़ लगानेवाले लोगोंको कहाँसे मिल सकता है। असन्तोष सबसे महान् दुःख है और सन्तोष ही महान् सुख है। अतः सुखकी इच्छा रखनेवाले पुरुष सदैव सन्तुष्ट रहे।^२

विश्वामित्र बोले—किसी वस्तुकी इच्छा रखनेवाले पुरुषकी जब एक कामना पूरी हो जाती है, तब दूसरी वस्तुकी तृष्णा उसे बाणके समान बाँधने लगती है।

वसिष्ठजीने कहा—कामना रखनेवाला पुरुष सहस्रों कामनाएँ पाकर भी कभी सन्तुष्ट नहीं होता। जैसे घीकी आहुति देनेसे अग्नि प्रज्वलित होती है, उसी प्रकार उसकी इच्छा रखनेवाला पुरुष मोहग्रस्त होनेके कारण कभी सुख नहीं पाता।

अरुन्धती बोलीं—जैसे अनन्त मृणालतन्तुएँ कमलनालमें जाकर स्थित हैं, उसी प्रकार देहधारियोंकी देहमें विद्यमान तृष्णा अनेक अनर्थोंका आश्रय है, खोटी बुद्धिवालोंके लिये जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है, जो वृद्ध होनेपर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो प्राणान्तकारी रोगके समान है, उस तृष्णाका त्याग कर देनेवाले पुरुषको ही सुख मिलता है।^३

चण्डा बोली—मेरे ये स्वामीलोग जब इस धनसे सर्पकी भाँति डरते हैं, तो मुझे भी उस धनसे क्यों नहीं भय होगा।

पशुमुखने कहा—सदा धर्मपरायण विद्वान् पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अपने हितकी इच्छा रखनेवाले विज्ञपुरुषको भी वैसा ही आचरण करना चाहिये।

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर वे सप्तर्षिगण उन सुवर्णगर्भित फलोंको वहीं छोड़कर अन्यत्र चले गये। तत्पश्चात् उन्होंने चमत्कारपुरके क्षेत्रमें प्रवेश किया। वहाँ पहुँचते ही उन्हें सहसा अपने सामने आया हुआ शुनोमुख नामक संन्यासी दिखायी दिया। तब उसीके साथ वे किसी वनके भीतर गये। वहाँ जानेपर उन सबने कमलोंसे सुशोभित एक सुन्दर सरोवर देखा। तब भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन्होंने उस पोखरेसे बहुतेरे मृणाल निकाले और किनारेपर रखकर सन्ध्या-तर्पण आदि पुण्यकर्मोंमें लग गये। तदनन्तर वे सब लोग जलसे निकलकर एक-दूसरेसे मिले। तब वहाँ उन मृणालोंको देखकर इस प्रकार कहने लगे।

ऋषि बोले—अहो! हम भूखसे पीड़ित हैं। इस दशामें भी किस निर्दयीने हमारे समस्त मृणाल इस स्थानसे चुरा लिये हैं।


१- अनन्तपारा दुष्पूरा तृष्णा दुःखशतावहा। अधर्मबहुला चैव तस्मात्तां परिवर्जयेत्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।४५)
२- सर्वत्र सम्पदस्तस्य सन्तुष्टं यस्य मानसम्। उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः॥
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। कुतस्तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥
असन्तोषं परं दुःखं सन्तोषं परमं सुखम्। सुखार्थी पुरुषस्तस्मात् सन्तुष्टः सततं भवेत्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।४७-४९)
३- या दुस्त्यजा दुर्मतिभिर्या न जीर्यति जीर्यतः। याऽसौ प्राणान्तको रोगस्तां तृष्णां त्यजतः सुखम्॥ (स्क० पु०, ना० ३२।५७)