संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- नागरखण्ड-पूर्वार्ध * | १०८९ ---|---:
सप्तर्षि-आश्रमकी महिमा, सप्तर्षियोंका हाटकेश्वरक्षेत्रमें आगमन
सूतजी कहते हैं—द्विजवरो! हाटकेश्वरक्षेत्रमें सप्तर्षियोंका आश्रम हैं, जो समस्त कामनाओंको देनेवाला है। जो मनुष्य श्रावणमासकी पूर्णिमाको वहाँ स्नान करता है, वह मनोवांछित फलको पाता है। जो कन्द, मूल, फल और शाकद्वारा वहाँ श्राद्ध करता है, वह राजसूय तथा अश्वमेध दोनों यज्ञोंका फल पाता है। भाद्रपदमासके शुक्ल पक्षकी पंचमी तिथिमें वहाँ स्नान करके पुष्प, धूप और चन्दन आदिके द्वारा ऋषियोंका भक्तिपूर्वक पूजन करना चाहिये। पूजनका मन्त्र इस प्रकार है—
ॐ अत्रये नमः, ॐ वसिष्ठाय नमः, ॐ कश्यपाय नमः, ॐ भरद्वाजाय नमः, ॐ गौतमाय नमः, ॐ कौशिकाय नमः, ॐ जमदग्नये नमः, ॐ अरुन्धत्यै नमः।
इस प्रकार उच्चारण करके पूजन करना चाहिये।
ब्रह्मर्षियो! पूर्वकालकी बात है। एक समय संसारमें बारह वर्षोंतक वर्षा नहीं हुई। जीविकाकी साधनभूत समस्त ओषधियों (अन्न और फल आदि)-का नाश हो गया। इससे सब लोग भूखकी पीड़ासे व्याकुल हो गये। इस प्रकार अन्नका विनाश हो जानेसे जब सारा भूमण्डल भूखसे पीड़ित हो गया, तब सप्तर्षि लोग भी क्षुधासे व्याकुल होकर इधर-उधर भ्रमण करने लगे। घूमते-घूमते वे सब लोग वर्षार्दर्भि नामक राजाके राज्यमें गये। उनका आगमन सुनकर राजा वहाँ आये और इस प्रकार बोले—'मैं आपलोगोंको अन्न, ग्राम और धान-जौ आदि दूँगा।'
ऋषि बोले—राजन्! राजाका प्रतिग्रह बड़ा भयंकर होता है। वह स्वादमें मधुके समान है, किंतु परिणाममें विषके तुल्य होता है। अतः पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको उसे दूरसे ही त्याग देना चाहिये। इसलिये तुम्हारा कल्याण हो, तुम घर लौट जाओ, हम तुम्हारा धन कदापि नहीं लेंगे। ऐसा कहकर ऋषिलोग चमत्कारपुरकी ओर चल दिये। तब राजाने गूलरके फलोंमें सोना भरकर उन फलोंको सप्तर्षियोंके मार्गमें बहुत आगे रखवा दिया। तब वे मुनि पृथ्वीपर गिरे हुए गूलरके फलोंको देखकर बड़े प्रसन्न हुए और भूखसे पीड़ित होनेके कारण उन सबको उठाने लगे। उन्हें भारी देख अत्रिने एक फल तोड़कर देखा और उसमें सुवर्ण देखकर कहा—'हमलोगोंकी ज्ञानशक्ति मन्द नहीं हुई है, हमारी बुद्धि मूढ़ नहीं है, जो कि इन फलोंको सुवर्णसे भरे हुए जानकर भी हम ग्रहण कर लें। अतः इन सुवर्णपूरित फलोंको दूरसे ही त्यागकर चल देंगे। एक मनुष्य सम्पूर्ण पृथ्वीका स्वामी है और दूसरा केवल निष्कामभावसे रहनेवाला अकिंचन है। इन दोनोंमें जो निष्काम पुरुष है, वही सौभाग्यशाली एवं श्रेष्ठ है।'
जमदग्नि बोले—जो अधम ब्राह्मण धन पाकर शोक करनेकी जगह प्रसन्न होता है, वह मन्दबुद्धि उससे होनेवाले नरकको नहीं देखता। दान लेनेमें समर्थ होकर भी जो उससे निवृत्त हैं, उन्हें वही लोक मिलता है, जो दाताओंको मिलता है।
कश्यपने कहा—मुने! यह जो धनका संग्रह प्राप्त हुआ है, सो महान् अनर्थरूप है; क्योंकि ऐश्वर्यसे मोहित चित्तवाला मानव आत्मकल्याणसे वंचित हो जाता है। अर्थसम्पत्ति मोहमें डालनेवाली है और मोह नरकमें गिरानेवाला है। अतः कल्याणकी इच्छा रखनेवाला पुरुष धनको प्रयत्नपूर्वक त्याग दे। धनके द्वारा जिस धर्मका साधन किया जाता है, वह नाशवान् बताया गया है और तपस्याद्वारा जिस धर्मका साधन किया जाता है, वह मोक्ष देनेवाला होता है, ऐसा मेरा विचार है।
भरद्वाजजी बोले—बुढ़ापेसे जीर्ण होनेवाले पुरुषके दाँत और केश जीर्ण हो जाते हैं, आँख और कान भी जीर्ण हो जाते हैं, परंतु उसकी